दूसरे दलों में तोड़फोड़ करना भाजपा के लिये सरल हो सकता है, पर दलबदल करने वाले नेताओं को संभालना भारी पड़ रहा है. उन्नाव के बहुचर्चित रेप और हत्या कांड में विधायक कुलदीप सेंगर की किरकिरी होने से विपक्ष भाजपा पर भारी पड़ गया है. पिछले कुछ सालों से भाजपा में अपने दल के ‘स्थापित नेताओं’ को दरकिनार किया जा रहा है. अपनी पार्टी के ‘स्थापित नेताओं’ की जगह दूसरे दलों के दलबदलू नेताओं को तरजीह दी जा रही है. यह भाजपा के गले की फांस बन रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में भाजपा के 2 उपचुनाव हारने और सपा-बसपा के गठबंधन को देखते हुये इन दलबदल कर आये नेताओं का भी भाजपा से मोह भंग हो रहा है. उपेक्षा का शिकार चल रहे अब भाजपा के स्थापित नेता भी पार्टी के लिये काम करने से कतरा रहे हैं.

राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने पार्टी में ‘स्थापित नेताओं’ को महत्व नहीं दिया. राज्यसभा चुनाव के बाद अब विधान परिषद के चुनाव में भी भाजपा अपने दल के ‘स्थापित नेताओं’ की जगह पर दूसरे दलबदलू नेताओं को महत्व दे रही है. भाजपा ने आधे से अधिक विधान परिषद के पदों पर दलबदलू नेताओं को टिकट देने की तैयार कर ली है. ऐसे में पार्टी के स्थापित नेताओं में असंतोष है. इसके बाद भी भाजपा तोड़फोड़ की राजनीति से बाज नहीं आ रही. इस बार भाजपा ने कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली में उनके करीबी नेताओं को भाजपा में शामिल करने का काम करने जा रही है.

जानकार लोग बताते हैं कि भाजपा में ‘योगीशाह’ की जोड़ी अपनी पार्टी के ‘स्थापित नेताओं’ को दरकिनार करना चाहती है. जिससे सभी उनकी हां में हां मिलाते रहे. दूसरी पार्टी से आने वाले दलबदलू नेता अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं. कई बदलबदलू नेता ऐसे हैं जो चुनाव जीतने की हालत में नहीं थे, पर भाजपा की हवा में चुनाव जीत गये. अब भाजपा के खिलाफ माहौल बनता देख यह नेता सबसे पहले पार्टी छोड़ने और विद्रोह पर उतर आये हैं. उत्तर प्रदेश के 2 उपचुनाव में भाजपा विपक्षी एकता से कम अपनी पार्टी के अंतरकलह से अधिक हारी है. अब पार्टी स्तर पर इस बात को स्वीकार किया जा रहा है.

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