प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एकलौती बड़ी ताकत उनका वाकचातुर्य है, वे शब्दों को पिरोना जानते हैं और उनका कारोबार भी कर लेते हैं, उनके इसी हुनर को विपक्षी जुमलेबाजी कहते हैं. बोलना बिलाशक एक कला है जो किसी भी राजनेता को आना अनिवार्य है लेकिन ज्यादा और अनावश्यक बोलने बालों के प्रति आम राय अच्छी नहीं होती. नरेंद्र मोदी का कुछ भी बोलना इसलिए भी खास होता है कि वे शीर्ष संवैधानिक पद पर हैं, लेकिन उनकी खूबी यह है कि वे भाषा और विचारों में एक ऐसा तालमेल बैठालते हैं कि सुनने वालों के पास कोई तर्क नहीं रह जाता.

मोदी कितने और कहां से शिक्षित हैं, यह तो वही जाने पर उनके भाषणों में फिलासफी भी होती है और विकट का आत्मविश्वास भी होता है.  वे अपने आप को वैचारिक रूप से समृद्ध दिखाने की भरपूर कोशिश करते हैं और इसी वक्त में वे बेहद अपरिपक्व भी लगते हैं. यह और बात है कि उनके प्रशंसक यानि भक्त गण उनकी इन्हीं अदाओं पर बलैयां लिए जाते हैं. अभी तक के अधिकांश प्रधानमंत्री आमतौर पर जरूरत के मुताबिक ही बोलते रहे हैं, लेकिन मनमोहन सिंह जरूरत के मुताबिक भी नहीं बोलते थे और नरेंद्र मोदी जरूरत हो न हो बोलने से खुद को रोक नहीं पाते.

मनमोहन सिंह का कम बोलना अगर कमी या कमजोरी थी तो आनुपातिक और संख्यकीय लिहाज से नरेंद्र मोदी का बड़बोलापन कोई खूबी नहीं, बल्कि और बड़ी कमजोरी है, जिससे कभी कभी हीनता की बू भी आती है. यह क्या मानसिकता है और क्या असर लोगों पर डाल रही है इसे समझा जाना बेहद जरूरी है.

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