आम चुनाव से पहले सरकार खुद के दामन में लगे महंगाई व  भ्रष्टाचार के दागों को धोने के लिए भले ही भूमि अर्जन विधेयक का सहारा ले रही हो, लेकिन इस प्रस्तावित कानून के प्रावधानों से भूमिहीनों और गरीब किसानों को जमीन व संपत्ति वितरण व्यवस्था के मामले में बड़ी राहत मिलेगी, बशर्ते नौकरशाही और कानूनी दांवपेंच  अड़ंगा न डालें. पढि़ए जगदीश पंवार का लेख.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी संप्रग सरकार ने संसद के मौजूदा मानसून सत्र में नए भूमि अधिग्रहण विधेयक को पारित कराने के लिए कमर कस ली है, हालांकि तमाम दलों को मनाने के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी व द्रमुक जैसे दल अभी भी नाखुश हैं. सरकार अपने सब से बड़े प्रतिद्वंद्वी विपक्ष भाजपा की कुछ शर्तों के आगे ?ाक कर उसे मनाने में कामयाब रही. इधर कौर्पोरेट जगत समेत भूमि अधिकार आंदोलन के कार्यकर्ता बिल के मौजूदा स्वरूप से नाराज हैं. कौर्पोरेट जगत को तो ऐसा लग रहा है मानो उस से उस का जन्मसिद्ध अधिकार छीना जा रहा है.

उद्योग जगत पहले इस बात से हैरान था कि भूमि अधिग्रहण बिल पर संसदीय समिति ने अपनी सिफारिश सरकार के सामने रखी तो निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण के अवसर सीमित करने वाले इस बिल को ले कर सरकार ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया? कौर्पोरेट सैक्टर का मानना है कि बिल के प्रावधान इंडस्ट्री के लिए अच्छे नहीं हैं. उधर, आदिवासियों, दलितों, भूमिहीनों और विस्थापितों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन इन लोगों के पुनर्वास संबंधित प्रावधानों को ले कर संतुष्ट नहीं हैं. किसान आंदोलन के अगुआ नेताओं का मानना है कि इस कानून से किसानों को ज्यादा लाभ नहीं होगा.

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