लोग आशंकाओं और दुश्चिंताओं के बीच साल 2017 का स्वागत कर रहे हैं. उन के उत्साह पर एक ग्रहण है और यह अनिश्चितता भी, कि अब क्या होगा. नया साल अच्छे से बीते, आप स्वस्थ रहें, धन और वैभव आप के पास रहें, आप खुश रहें जैसी शुभकामनाएं अगर बेमन से दी और ली जा रही हैं तो यकीन मानें, सबकुछ ठीकठाक नहीं है, कोई बड़ी गड़बड़ जरूर है. यह गड़बड़, दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के साथ ही शुरू हो गई थी जब लोग यह भूल गए थे कि लोकतंत्र में केवल सत्तारूढ़ दल चुन लेने से ही वोट देने की सार्थकता सिद्ध नहीं हो जाती. इस में एक मजबूत विपक्ष की भी जरूरत होती है जो सत्तारूढ़ दल या गठबंधन पर नियंत्रण रखे. उस चुनाव में लोगों ने अब तक का सब से कमजोर विपक्ष चुन कर संसद में भेजा. उस के दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं.

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