लोग आशंकाओं और दुश्चिंताओं के बीच साल 2017 का स्वागत कर रहे हैं. उन के उत्साह पर एक ग्रहण है और यह अनिश्चितता भी, कि अब क्या होगा. नया साल अच्छे से बीते, आप स्वस्थ रहें, धन और वैभव आप के पास रहें, आप खुश रहें जैसी शुभकामनाएं अगर बेमन से दी और ली जा रही हैं तो यकीन मानें, सबकुछ ठीकठाक नहीं है, कोई बड़ी गड़बड़ जरूर है. यह गड़बड़, दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के साथ ही शुरू हो गई थी जब लोग यह भूल गए थे कि लोकतंत्र में केवल सत्तारूढ़ दल चुन लेने से ही वोट देने की सार्थकता सिद्ध नहीं हो जाती. इस में एक मजबूत विपक्ष की भी जरूरत होती है जो सत्तारूढ़ दल या गठबंधन पर नियंत्रण रखे. उस चुनाव में लोगों ने अब तक का सब से कमजोर विपक्ष चुन कर संसद में भेजा. उस के दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं.

2001-2002 या उस के बाद के सालों की तो बात करना ही बेमानी है. शायद ही कोई 2015 की किसी उल्लेखनीय घटना को बता पाए जिस ने सीधे सामाजिक जीवन पर सकारात्मक असर छोड़ा हो. लेकिन 8 नवंबर, 2016 लोगों को जिंदगीभर याद रहेगी, ठीक वैसे ही जैसे 25 जून, 1975 याद है. नोटबंदी पर बहस जारी है. सत्तारूढ़ दल कह रहा है, धैर्य रखते इस के दूरगामी चीजों का इंतजार करो और उलट इस के, बिखरा विपक्ष चिल्ला रहा है कि यह घोटाला है, अदूरदर्शिता है, मनमानी है. इस से किसी को कोई फायदा नहीं होने वाला वगैरावगैरा. कौन सच्चा, कौन झूठा है, यह कोई तय नहीं कर पा रहा. नवंबर 2016 में नोट बदली के लिए लगी लाइनें इतिहास में दर्ज हो चुकी हैं. नोट बदलने में हुई परेशानियां इस दौर के लोग चाह कर भी भुला नहीं सकते. एक समृद्ध, संपन्न विकासशील देश की जनता पास में पैसे होते हुए भी जरूरी चीजों की मुहताज हो गई. देश का गरीब और किसान फिर कुदरत के भरोसे हो गया. आम मध्यवर्गीयों से भी खुश होने के मौके छिन गए. 2016 की यही कुछ इकलौती उपलब्धियां रहीं. 30 दिसंबर का इंतजार करते लोगों को बगैर किसी जानकार या विशेषज्ञ के समझाए समझ आ गया है कि पैसा वाकई किसी का सगा नहीं होता. कड़कड़ाती ठंड में देररात जेब में एटीएम कार्ड लिए यहां से वहां भटकते लोगों की बेचारगी और मुंह चिढ़ाती एटीएम मशीनें, कैसे जनजीवन अस्तव्यस्त कर गईं और क्यों लोगों ने इस से समझौता कर लिया, इन सवालों के जवाब अब कभी कहीं मिलेंगे, ऐसा लग नहीं रहा. नोटबंदी ने कैसेकैसे लोगों की खुशियां और उल्लास छीने, यह अब किसी से छिपा नहीं रह गया है. लेकिन इस का जिम्मेदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ लोग ठहराने से कतरा रहे हैं तो इस की वजह समझनी जरूरी है. कहीं यह डर तो नहीं और अगर यह डर ही है, तो बात देश और समाज के लिहाज से चिंता की है. कुछ लोग मोदी की भक्ति करें, यह बात उतनी नुकसानदेह नहीं है जितनी यह, कि लोग मारे डर के अवसाद में जीने लगें.

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