चुनाव का माहौल बनते ही हर दल व हर छोटेबड़े नेता को मुसलमानों की फिक्र सताने लगती है. बिहार विधानसभा के चुनाव जैसेजैसे नजदीक आते जा रहे हैं, वैसेवैसे मुसलमानों को रिझाने की कवायद भी परवान चढ़ने लगी है. बिहार में हर चुनाव की तरह इस बार भी मुसलमान कशमकश की हालत में हैं. इस बार लालू और नीतीश के एकसाथ होने से मुसलिम वोटरों की मजबूरी है कि इसी गठबंधन को वोट दें. मुसलमानों ने साल 1990 से ले कर 2005 तक लालू प्रसाद यादव का साथ दिया था. 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश ने लालू के मुसलिम वोटबैंक में सेंध लगाने की पुरजोर कोशिश की पर उस में वे खास कामयाबी नहीं पा सके. मुसलिम संगठनों की यही शिकायत है कि उन के नाम पर हर दल सियासत तो करता रहा है लेकिन आबादी के लिहाज से मुसलमानों को टिकट देने में हर दल कन्नी काटता रहा है. भारतीय जनता पार्टी पर मुसलमानों को टिकट न देने का आरोप लगाने वाले और खुद को मुसलमानों का सब से बड़ा रहनुमा बताने वाले कांगे्रस, राजद, जदयू, लोजपा जैसे दल उन्हें टिकट देने में कंजूसी करते रहे हैं.

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