फिल्म इंडस्ट्री में जो हैसियत जानी लीवर की है वही हैसियत कविता और साहित्य में कुमार विश्वास की है. बिलाशक काका हाथरसी और सुरेन्द्र शर्मा के बाद उन्होंने मंचीय कविता को जिंदा रखा है पर इसका मतलब यह नहीं कि कुमार विश्वास कोई नई बात कहते हैं या श्रीलाल शुक्ल सरीखा करारा और तीखा व्यंग व्यवस्था पर कर पाते हैं. दरअसल में वे भी तुकबंदी के विशेषज्ञ हैं और चलताऊ और हंसोड़ बातें कर मंच लूट ले जाते हैं जो आज की मांग भी है, इस नाते वे निसंदेह एक कामयाब कवि हैं जो श्रोताओं की नब्ज पकड़कर बात कहता है.

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