क्या याद कर के रोऊं कि कैसा शबाब था

कुछ भी न था हवा थी कहानी थी शबाब था.

अब इत्र भी मलो तो तकल्लुफ की बू कहां

वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था.

एक मशहूर शायर की गजल के ये 2 शुरुआती शेर एकसाथ कई बातें बताते हैं.

पहली, गुलाब की महक की पसीने से (जाहिर है माशूका के) तुलना और दूसरी, इत्र का इस्तेमाल है जो अब न के बराबर होता है.

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