कहने को तो हैं कलाकार और साहित्यकार, लेकिन इन का कम्बख्त पापी पेट कलासाहित्य से नहीं, सरकारी पुरस्कारों से भरता है. तभी तो ये कामधाम, लिखनापढ़ना छोड़ कर रुपए, सांठगांठ, नेतागीरी और दलाली के रास्ते पद्मश्री का जुगाड़ लगाने से गुरेज नहीं करते. लेकिन तमाम कोशिशें फेल हुईं और महाशय अस्पताल में भरती हैं. भला क्यों?

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