लेखक: अशोक गौतम

मैं ने उन की फाइल निकालने के सौ सगर्व ले माया के कीटाणुओं से तुरंत छुटकारा पाने के लिए सेनिटाइजर से हाथ धोते उन से पूछा, ‘‘बरखुरदार, तुम ने अपने मोबाइल से वीडियो वगैरह तो नहीं बनाई न?’’ तो वे सहजता से बिना किसी हड़बड़ाहट के दोनों हाथ जोड़ बोले, ‘‘साहब, वीडियो बना कर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारनी है क्या? मैं ने भोलाराम की जीवनी पढ़ी है. बेचारे को आज तक पैंशन की दमड़ी नहीं मिली है. और जो चालीस में आप ये बाल देख रहे हो न, ये ऐसे ही सफेद नहीं हुए हैं. दफ्तरदफ्तर में रिश्वत बांट कर ही सफेद हुए हैं. उन के बहकावे में आ सदियों से चली आ रही परंपरा को मैं खत्म करने वालों में से नहीं हूं.’’ यह कह वे सादर बाहर निकले ही थे कि एकाएक वे आ धमके और आते ही मुझ से पूछा, ‘‘यार, यह क्या कर रहे हो?’’

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