दिनरात मेरे जैसे जिस भी लिच्चड़ को जहां भी देखो, जब भी देखो, कोई सपने से लड़ रहा है तो कोई अपने से लड़ रहा है. कोई धर्म से लड़ रहा है तो कोई सत्कर्म से लड़ रहा है. कोई प्रेम के चलते खाप से लड़ रहा है तो कोईकोई जेबखर्च के लिए बाप से लड़ रहा है. फौजी बौर्डर पर लड़ रहा है तो मौजी संसद में लड़ रहा है. कोई ईमानदारी से लड़ रहा है तो कोई अपनी लाचारी से लड़ रहा है. कोई बीमारी से लड़ रहा है तो कोई अपनी ही खुमारी से लड़ रहा है. आप जैसा हाथ में फटा नोट लिए महंगाई से लड़ रहा है तो मोटा आदमी अपनी बीजी फसल की कटाई से लड़ रहा है. कुंआरा पराई लुगाई से लड़ रहा है तो शादीशुदा उस की वफाई से लड़ रहा है. मतलब हरेक अपने को लड़ कर व्यस्त रखे हुए है. जिस की बाजुओं में दम है वह बाजुओं से लड़ रहा है. जिस की बाजुओं में दम नहीं वह नकली बट्टेतराजुओं से लड़ रहा है.

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