सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक उपेक्षाओं की कमी के बावजूद भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्व एकदिवसीय मैचों में कुछ सफलता जरूर हासिल की लेकिन आईसीसी विश्व महिला टी-20 चैंपियनशिप में वेस्टइंडीज से हार कर बाहर हो जाने से निराशा हुई. सुकून देने वाली बात यह है कि खिलाडि़यों का आत्मविश्वास बढ़ा है. बीसीसीआई ने महिला क्रिकेटरों के लिए वार्षिक अनुबंध की व्यवस्था शुरू कर दी. यह अलग बात है कि पुरुष खिलाडि़यों को जितना पैसा मिलता है उतना महिला खिलाडि़यों को नहीं मिलता.

अब तो महिला क्रिकेट मैचों का टीवी पर सीधा प्रसारण भी हो रहा है पर स्टेडियम में देखने के लिए दर्शक नहीं मिल रहे और न ही क्रिकेटप्रेमी महिलाओं के मैच को देखने के लिए चिपक कर बैठ पाते हैं. यदि यही मैच पुरुष वर्ग के होते हैं तो तमाम चैनलों में विशेषज्ञ बैठ कर डिसकस करते हैं, सटोरिए सट्टा लगाने की जुगत में माथापच्ची करते हैं. पर महिला वर्ग में ऐसा नहीं होता. महिला टीम की कप्तान मिताली राज कई बार यह स्वीकार कर चुकी हैं कि महिला क्रिकेट का ढांचा व्यवस्थित करने पर ध्यान देना चाहिए, पर ऐसा हो नहीं रहा. बीसीसीआई ने भी महिला टीम के साथ हमेशा उदासीन रवैया अपनाया. ऐसा इसलिए क्योंकि बीसीसीआई को लगता है कि महिला क्रिकेट के लिए न तो दर्शकों में रुचि है और न ही स्पौंसर मिलते हैं इसलिए घाटे के सौदे में वह क्यों अपना माथा खपाए. यदि बीसीसीआई चाहे तो प्रचार के बलबूते और महिला टीम को सुविधा दे कर टीम को मजबूत बना सकता है, नियमित मैच करा सकता है. इस के लिए बीसीसीआई को अपनी मानसिकता बदलनी होगी तभी महिला टीम को वह सम्मान मिल पाएगा जो पुरुष वर्ग की टीम को मिलता है.

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