क्या आप रणवीर सिंह को जानते हैं? माफ कीजिए, अगर आप फिल्म ‘गुंडे’ के बलशाली हीरो रणवीर सिंह की तसवीर को अपने मन में ला रहे हैं तो यह जहमत मत उठाइए. क्योंकि हम तो एमबीए के उस होनहार छात्र रणवीर सिंह की बात कर रहे हैं जिस को ‘गुंडा’ बताते हुए उत्तराखंड की पुलिस ने बड़ी बेरहमी से मार डाला था.

उस समय पुलिस ने अपने तथाकथित एनकाउंटर में ढेर किए गए रणवीर सिंह की मौत पर खूब वाहवाही बटोरी थी और तब की उत्तराखंड सरकार ने रणवीर सिंह के पिता रवींद्र सिंह की इस फरियाद को भी नकार दिया था कि पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर कर के उन के बेटे को महज अपना गुस्सा निकालने के लिए मौत के घाट उतार दिया था. इतना ही नहीं, सरकार ने एनकाउंटर करने वाले पुलिस वालों को तब सम्मानित भी किया था. लेकिन रणवीर सिंह के पिता और परिवार वालों ने हिम्मत नहीं हारी. नतीजतन, इस कांड के तकरीबन 5 साल बाद 9 जून को अदालत ने रणवीर सिंह एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए 18 पुलिस वालों को इस का कुसूरवार ठहराया, जिन में से 17 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

मामला कुछ यों था. 3 जुलाई, 2009 को तब की भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के काफिले को उत्तराखंड में जौलीग्रांट से मसूरी जाना था. लिहाजा, वहां पर पुलिस की जबरदस्त चैकिंग चल रही थी. रणवीर सिंह अपने एक दोस्त रामकुमार के साथ मोटरसाइकिल से मोहिनी रोड पर एक और दोस्त अशोक कुमार से मिलने गया था. जिस जगह वे दोनों अशोक का इंतजार कर रहे थे वहां पर आराघर चौकी इंचार्ज जी डी भट्ट गाडि़यों की चैकिंग कर रहे थे.

वहां से हटने का निर्देश देने के बावजूद जब रणवीर सिंह नहीं हटा, तो जी डी भट्ट ने पहले तो उसे गालियां दीं, फिर उस की मोटरसाइकिल पर डंडा मारा. तब तक अशोक भी वहां पहुंच गया था. उन्होंने जी डी भट्ट की पिटाई कर दी. मारपिटाई की सूचना मिलने पर तब के डालनवाला थाना इंचार्ज संतोष कुमार जायसवाल मौके पर पहुंचे. रणवीर सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि अशोक और रामकुमार वहां से भाग गए.

पुलिस ने रणवीर सिंह को ‘गुंडा’ बताते हुए देहरादून में डालनवाला थाना क्षेत्र के लाडपुर के जंगल में फर्जी एनकाउंटर कर के मार दिया. उस की लाश के पास से एक रिवौल्वर और देशी तमंचा भी बरामद हुआ था. रणवीर सिंह की लाश पर 29 गोलियों के निशान पाए गए थे, जिन में से 17 बेहद करीब से मारी गई थीं.

इस के बाद रणवीर सिंह के फौजी पिता रवींद्र सिंह की कोशिशों से अदालत में मामला चला और साबित हुआ कि पुलिस ने अपना गुस्सा निकालने के लिए यह एनकाउंटर किया था. आम लोगों को यह खबर पढ़ कर रणवीर सिंह की मौत का अफसोस होगा और पुलिस वालों को मिली सजा से उन्हें तसल्ली भी होगी कि चलो, इंसाफ तो मिला. लेकिन क्या हम उन मांबाप का दर्द भी कभी समझ सकेंगे जो अपनी औलाद को इस तरह खो देते हैं?

रणवीर सिंह की मां सुरेश देवी पुलिस वालों को मिली उम्रकैद की सजा से ज्यादा खुश नहीं हैं. उन का तो कहना है कि जब तक उन के बेटे के हत्यारों को फांसी की सजा नहीं मिलेगी, तब तक उन्हें सुकून नहीं मिलेगा. सोचिए, एक मां पर पिछले 5 सालों में क्या बीती होगी, जो अपने बेटे की हत्या करने वालों को फांसी पर चढ़ते देखना चाहती है, ताकि उस के दिल को ठंडक पहुंच सके.

रणवीर सिंह के भाई संदीप सिंह ने भरे मन से बताया कि उस के भाई ने कभी किसी को दुख नहीं पहुंचाया था. वह तो हमेशा दूसरों की मदद करता था. सच भी है कि जब किसी की मौत की वजह ऐसी हो, जिस में दूसरे पर उंगली उठाई जा सके, तो मरने वाले के परिवार वालों को ऐसी मौत जिंदगीभर सालती रहती है.

ब्यास का जानलेवा हादसा

मनाली में सैरसपाटा करने गए आंध्र प्रदेश के छात्रों का ही मामला ले लें. 8 जून को हिमाचल प्रदेश के मंडी से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर थालोट नामक जगह पर वीएनआर विज्ञान ज्योति इंस्टिट्यूट औफ इंजीनियरिंग ऐंड टैक्नोलौजी हैदराबाद के कई छात्र फोटो खिंचवाने व नहाने के लिए ब्यास नदी में उतरे थे कि लारजी हाइड्रो प्रोजैक्ट के बांध से अचानक पानी छोड़ने से तकरीबन 25 लोग बह गए. पानी का बहाव इतना तेज था कि उन्हें संभलने का मौका भी नहीं मिला.

इस हादसे के कुछ दिनों बाद जब एक वीडियो सामने आया तब पता चला कि छात्र किस तरह पानी के तेज बहाव में बहते गए, जबकि वहीं किनारे खड़े उन के साथियों के पास हाथ मलने के अलावा चारा नहीं था. उधर, जब बह गए छात्रों के मांबाप को इस बात की खबर लगी तो उन की तो मानो दुनिया ही उजड़ गई.

साल 2009 में फर्जी एनकाउंटर में मारा गया रणवीर सिंह महज 22 साल का था. एमबीए करने के बाद बढि़या नौकरी करने की चाहत उस के मन में रही होगी. मांबाप की भी उम्मीदें जागी होंगी कि अब बेटा कमाने लगेगा, बाद में उस की शादी होगी और वह सुखी जिंदगी बिताएगा. लेकिन उस की दर्दनाक मौत ने परिवार को तोड़ दिया, क्योंकि जिस खाकी वरदी पर लोगों की जान की हिफाजत करने की जिम्मेदारी होती है उसी ने उन के लाड़ले को ऐसी न भूलने वाली मौत दे दी.

ताउम्र सालती कमी

ऐसा ही कुछ ब्यास नदी में बहे छात्रों के परिवार वालों पर भी बीता होगा. सैरसपाटे को निकले बच्चों के अभिभावकों को किसी की लापरवाही की ऐसी सजा भुगतनी पड़ी कि वे उन की लाश पाने तक को तरस गए. इन मौतों का दर्द परिवार वालों का इसलिए भी जिंदगीभर पीछा नहीं छोड़ेगा क्योंकि मारे गए ज्यादातर नौजवान थे. वे किसी लाइलाज बीमारी के शिकार नहीं थे और पढ़ाईलिखाई के मामले में होनहार भी थे. मांबाप तो ऐसे बच्चों को अपने बुढ़ापे की लाठी समझते हैं. लिहाजा, जब तक वे जिंदा रहेंगे, अपने बच्चों की मौत को कभी भूल नहीं पाएंगे.

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