आशीष बेतरह उदास था. मां की तस्वीर के आगे चुपचाप सिर झुकाए बैठा था. बार-बार आंखें आंसुओं से छलछला उठती थीं. बाइस साल के इकलौते बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना पाले मां ने अचानक ही आंखें मूंद ली थीं. उनके जाने का किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था. न आशीष को, न उसके पापा संजीव को और न ही परिवार के अन्य सदस्यों को. आज मां की तेरहवीं थी. बैठक के कमरे में सोफे हटा कर जमीन पर गद्दे डाल सफेद चांदनी बिछा दी गयी थी. सामने एक छोटी मेज पर मां फोटो में मुस्कुरा रही थी. पापा बार-बार उसके आसपास अगरबत्तियां लगा रहे थे. दरअसल इस बहाने से वो अपने आंसुओं को दूसरों की नजरों से छिपा रहे थे. अभी कल तक तो भली-चंगी थी. कभी ब्लडप्रेशर तक चेक कराने की जरूरत नहीं पड़ी, और अचानक ही ऐसा कार्डिएक अटैक पड़ा कि डॉक्टर तक बुलाने की फुर्सत नहीं दी उसने. खड़े-खड़े अचानक ही संजीव की बाहों में झूल गयी. संजीव चीखते रह गये, ‘रागिनी, रागिनी... आंखें खोलो... क्या हुआ... आंखें खोलो रागिनी...’ मगर रागिनी होती तब तो आंखें खोलती... वह तो एक झटके में अनन्त यात्रा के लिए प्रस्थान कर चुकी थी. पापा की चीखें सुन कर आशीष अपने कमरे से बदहवास सा भागा आया... पापा मां को तब तक जमीन पर लिटा चुके थे. आशीष ने भी मां को झकझोरा, मगर मां जा चुकी थी. जिसने भी सुना आश्चर्यचकित रह गया. कितनी भली महिला थी. हर वक्त हंसती-मुस्कुराती रहती थी. कभी किसी ने रागिनी को ऊंची आवाज में बात करते नहीं सुना था. मधुर वाणी, शालीन व्यवहार वाली रागिनी हरेक की मदद के लिए हर वक्त तैयार रहती थी. घर को तो उसने स्वर्ग बना कर रखा था. पति संजीव और बेटे आशीष पर उसका स्नेह हर वक्त बरसता था. दोनों ही उसके प्रेम की डोर में बंधे जीवन-आनन्द में डूबे थे कि अचानक ही यह डोर टूट गयी.

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