लेखिका-ज्योति मिश्रा 

रागिनी ने अम्मा का हाथ पकड़ कर कहा, ‘हां अम्मा, हम जानते हैं. तुम चिंता न करो. तुम लोग जो कहोगे, हम वही करेंगे.’

अगले महीने सुगंधा दीदी की शादी थी. रागिनी की खुशियों को जैसे पंख लग गए. दिनरात वहां जाने की तैयारी में लग गई. भइयू के साथ जा कर उस ने न केवल  अपने लिए शादी में पहनने के लिए  खूबसूरत सा लंहगा लिया बल्कि अपनी सुगंधा दीदी और नंदा के लिए ढेर सारे गिफ्ट्स भी खरीदे. अम्मा,  बाऊजी सब के लिए कपड़े खरीदते हुए उस का उत्साह देखते ही बन रहा था. आखिर मुंबई जाना था. वहां के हिसाब से पहनावा होना चाहिए. उस ने अच्छे से पार्लर में अपना हेयरकट करवाया.

पहली बार फेशियल,  ब्लीच करवा कर जब वह सामने आई तो उस की सुंदरता किसी फिल्मी हीरोइन से कम नजर नहीं आ रही थी. बातबात पर रागिनी की खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी. पूरे होस्टल में रागिनी के मुंबई जाने का शोर मच गया.  टिकटें भी बन गईं. लेकिन  ऐन शादी के समय डाक्टर ने अम्मा के मोतियाबिंद के औपरेशन का समय दे दिया  और  अम्मा व बाऊजी ने अपनी टिकटें कैंसिल करवा दीं. नतीजा रागिनी चाह कर भी मुंबई सुगंधा दीदी की शादी में नहीं जा पाई. मुझे बहुत दुख हुआ. महीनों की तैयारी पर मिनटों में पानी फिर गया. मुंबई की जगह  रागिनी को अम्मा की देखभाल के लिए  घर जाना पड़ा.

अम्मा की आंखों के औपरेशन के बाद रागिनी जब होस्टल वापस  आई तो  जब भी मुंबई की बात निकलती, वह फूटफूट कर रो पड़ती. मैं ने समझाया, ‘जाने दो रागिनी, अब रोने से क्या फायदा. तुम्हारी अम्मा औपरेशन की डेट नहीं बढ़वा पाई होंगी. उन की  बहन की बेटी की शादी,   जाना तो उन्हें भी था. अफसोस तो  उन्हें भी हुआ होगा और तुम्हारी कजिन बहनों को भी.’

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