Fairshare: बेटी के जन्म पर खुशियां मनाने वाले माता-पिता उसके भविष्य के लिए बड़े-बड़े सपने देखते हैं. उसकी पढ़ाई, करियर, शादी और खुशहाल जीवन के लिए हर संभव कोशिश करते हैं. लेकिन जब बात माता-पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी की आती है, तो कई परिवारों की सोच बदल जाती है. ऐसा कहना है यूपी के सुल्तानपुर की साक्षी जायसवाल का.
वहीं बिहार की वर्किंग प्रोफेशनल रजनी प्रसाद बताती हैं कि बेटियों को शादी के समय पेरेंट्स जो कुछ भी देते हैं, वह ससुरालवाले अपने पास रख लेते हैं और बेटियों के हाथ में बुरे दिनों के लिए कुछ नहीं बचता. वीडियो एडिटिंग से जुड़े झारखंड के केशव का मानना है कि बेटियों को यह कहकर पीछे कर दिया जाता है कि उनकी शादी हो चुकी है, अब उनका घर ससुराल है और मायके की संपत्ति पर बेटे का अधिकार है, जो पूरी तरह से पितृसत्तात्मक सोच है और इसे बदलने की जरूरत है. ये तीनों युवा और जेन ज़ी से जब गृहशोभा की संपादकीय टीम ने बात की, तो पाया कि बेटियों के हक के समर्थन में सभी की सोच एक जैसी है.
खर्च तो बेटे की पढ़ाई पर भी होता है लेकिन बेटियों को क्यों सुनाया जाता है?
साक्षी ने यह भी कहा कि जमीन का एक टुकड़ा जो बेटी को हक में मिलता है वो लोगों के लिए प्रोपर्टी हो सकती है लेकिन बेटी के लिए सम्मान और स्वामिभान से मिला हक होता है. जेन ज़ी एज ग्रुप से आने वाली कंचन गुप्ता तो साफसाफ शब्दों में कहती है कि पेरेंट्स, बेटाबेटी दोनों को पढ़ाते हैं लेकिन जब बेटी को उनका हक देने की बारी आती है, तो घर की ओर से उनकी पढ़ाई पर हुए खर्च का हिसाबकिताब रिपीट कर सुनाया जाता है.
इसी सोच को बदलने और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए समाज में फेयर शेयर की बात करना जरूरी है, जो न केवल संपत्ति में हिस्सेदारी की बात नहीं करता, बल्कि परिवार में बेटियों के सम्मान, समानता और आर्थिक स्वतंत्रता का सवाल भी उठाता है.
कानून बराबरी की बात करता है, क्या परिवार भी करते हैं?
भारत में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में 2005 में किए गए संशोधन ने बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर सहदायिक अधिकार दिए. सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामले में स्पष्ट किया कि बेटी को यह अधिकार जन्म से मिलता है. यह अधिकार केवल इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि उसकी शादी हो गई है. यह कहना है सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट उमेश शर्मा का.
गंभीर दिखने वाले इस पारिवारिक और समाजिक इश्यू को नौर्मल बनाना जरूरी
हालांकि, कानूनी अधिकार मिलने और उसे वास्तव में हासिल करने के बीच आज भी एक बड़ा अंतर है. आईटी प्रोफेशनल पवन गुप्ता ने माना कि कई बेटियां परिवार में विवाद होने के डर से अपना हिस्सा नहीं मांगतीं. कुछ को अपने अधिकारों की जानकारी ही नहीं होती, तो कुछ को यह समझाया जाता है कि माता-पिता की संपत्ति मांगना रिश्तों में दरार डालने जैसा है. लेकिन सवाल यह है कि जब बेटा अपना हिस्सा मांगता है, तो उसे अधिकार माना जाता है, जबकि बेटी के हिस्से की बात आते ही उसे स्वार्थ क्यों समझा जाता है? इसलिए अच्छा होगा अगर ऐसे इश्यू पर बेटेबेटी के सामने माता-पिता शुरुआत से ही खुल कर बात करें, जो गंभीर दिखने वाले इस पारिवारिक और समाजिक इश्यू को नौर्मल बना देगा और धीरेधीरे समाज में इसका एक्सेप्टेंस बढ़ जाएगा.
बेटी का योगदान कम क्यों समझा जाता है?
बेटियां भी अपने माता-पिता की देखभाल करती हैं. वे बीमारी में उनका सहारा बनती हैं, मुश्किल समय में परिवार के साथ खड़ी रहती हैं और कई बार अपनी जरूरतों को पीछे रखकर मायके की जिम्मेदारियां तक निभाती हैं. शादी के बाद भी मायके से उनका इमोशनल रिश्ता बना रहता है. सीनियर जर्नलिस्ट नसीम अंसारी कोचर का कहना है कि केवल अपना हक मानने की वजह से बेटियों की इज्जत कम हो जाती है, परिवार के साथ रिश्ते खराब हो जाते हैं, समाज गलत तरीके से देखने लगता है जबकि वह उसका अधिकार है, बेटियों को उसी दृष्टि से देखने की जरूरत है जैसे बेटे को समाज और परिवार देखता है. बेटियों को लेकर परिवार की सोच बदलनी होगी. शादी के बाद भी उनको अपना समझना होगा.
बेटी को उपहार देना प्यार है, लेकिन उसका कानूनी अधिकार देना न्याय है
संपत्ति के बंटवारे के समय अक्सर बेटे को परिवार का वारिस और बेटी को मेहमान की तरह देखा जाता है. कई परिवारों में यह तर्क दिया जाता है कि बेटी की शादी पर खर्च किया गया पैसा ही उसका हिस्सा था लेकिन शादी का खर्च और संपत्ति में कानूनी अधिकार दो अलग-अलग बातें हैं. किसी बेटी की शादी पर खर्च करना उसके उत्तराधिकार के अधिकार का औप्शन नहीं है.
संपत्ति में हिस्सा केवल पैसे का मामला नहीं
मार्केटिंग प्रोफेशनल आकांक्षा कात्याल की सोच है कि आर्थिक रूप से मजबूत होना महिलाओं के आत्मसम्मान और स्वतंत्र फैसले लेने की क्षमता से जुड़ा है. संपत्ति में हिस्सेदारी महिला को मुश्किल परिस्थितियों में सुरक्षा दे सकती है. यह उसे आर्थिक निर्भरता से बाहर निकलने, अपने भविष्य की योजना बनाने और जरूरत पड़ने पर अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर देती है. महिलाओं के पास पैसे हो, तो ससुराल में उनकी राय पूछी जाती है. वहीं एचआर प्रोफेशनल कनिष्का सिंह का मानना है कि बेटी का प्रोपर्टी में हक उसे अपने सपनों को पूरा करने में मददगार हो सकता है, वह अपने फेयर शेयर का इस्तेमाल कैरियर बनाने अपना स्टार्टअप शुरू करने के लिए कर सकती है.
प्रोपर्टी में फेयर शेयर इस बात पर जोर देता है कि महिलाओं को केवल शिक्षा, नौकरी और सामाजिक सम्मान में ही नहीं, बल्कि संपत्ति और आर्थिक संसाधनों में भी समान अवसर मिलने चाहिए. यह किसी बेटे के अधिकार छीनने की बात नहीं है. यह बेटियों को भी वही अधिकार देने की बात है, जो बेटों को मिलते हैं. Fairshare




