Serbia Elections: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विपक्ष के नेता राहुल गाँधी सहित टीम अभिजीत दिपके निश्चित रूप से 26 अक्तूबर की देर रात आने बाले सर्बिया के चुनाव नतीजे देख अपनी अपनी रणनीतियां तय करना पसंद करेंगे. सर्बिया हमारे मुकाबले बहुत छोटा सा देश है दक्षिण पूर्वी यूरोप के महत्वपूर्ण देशों में सर्बिया की गिनती होती है..

यह छोटा इतना है कि उसकी कुल आबादी दिल्ली की आधी आबादी जितनी भी नहीं है. अपने एतिहासिक किलों के अलावा सर्बिया की राजधानी बेलग्रेड यूरोप की `नाईटलाइफ केपिटल` के लिए भी मशहूर है. डैन्यूब और सावा नदियों के किनारे तैरते हुए क्लब्स जिन्हें स्प्लावोवी कहा जाता है, दुनिया भर के शौकीनों को आकर्षित करते हैं. यहाँ रात भर रंगीन पार्टियाँ चलती रहती हैं. सर्बिया की एक अंतर्राष्ट्रीय पहचान और उपलब्धी नामी लान टेनिस खिलाडी नोवाक जोकोविच भी हैं

खास किस्म की मेहमाननवाजी के लिए पहचाने जाने बाला सर्बिया बीते दो सालों से राजनितिक और सामाजिक उथलपुथल का शिकार है जिसके हालात काफी हद तक भारत से मिलते जुलते हैं. कैसे, इससे पहले स्वराज इंडिया के मुखिया योगेंद्र यादव के इस ताजे बयान पर गौर करना जरुरी है जिसमे उन्होंने सार रूप में यह कहा है कि लोगों की मंशा सिर्फ निष्पक्ष चुनाव की है. सत्ता परिवर्तन की नहीं.. कोई भी आंदोलन नेता की इच्छा पर नहीं बल्कि इसमें शामिल लोगों की इच्छा पर निर्भर करता है.

एक तरह से उन्होंने अपने ही साथी सहयोगी एडवोकेट प्रशांत भूषण की रिजीम चेंज की मांग और दावे को नकार दिया है. साफगोई इतनी कि उन्होंने यह भी मान लिया है कि इस बयान पर उन्हें गालियाँ पड़ेंगी. योगेन्द्र की बात में दम है लेकिन इसका दूसरा खतरनाक पहलू यह है कि क्या वाकई में ज्ञानेश कुमार सहित मोदी – शाह के अपने पदों पर रहते देश में अब कभी निष्पक्ष चुनाव हो पाएंगे. और क्या ये लोग इतनी आसानी से मान जाएंगे जो छाती फुलाकर पूरे दम से कह रहे हैं कि अगले तीस साल कांग्रेस सत्ता में नहीं आने बाली.

अमित शाह धन्य हैं, उन्होंने संजय को भी पछाड़ दिया है जिसने अंधे धृतराष्ट्र को महाभारत के युद्ध का आँखों देखा हाल भर सुनाया था. लेकिन शाह की दिव्य दृष्टि जो देख रही है वह कतई लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतो ( अगर कोई बचे हों तो ) से मेल खाती नहीं है. ऐसे में योगेंद्र यादव के टिपिकल साहित्यिक लहजे और घुमावदार अभिजात्य शब्दों में कहने का एक मतलब महाभारत के ही विद्वान विदुर जैसा ही है कि चीरहरण हो रहा है तो उसे सफलतापूर्वक होने दो. बस निंदा करो और कृष्ण के कारनामे का इंतजार करो जो चीर बढ़ाकर द्रोपदी की लाज बचा लेंगे.

इस आंदोलन का अंत या क्लाइमेक्स क्या होगा, इसका अंदाजा अच्छे अच्छे सियासी पंडित नहीं लगा पा रहे.. हाँ, लोगों के मन में मोदी सरकार के प्रति अविश्वास जरुर पैदा हो गया है यह सभी मान रहे हैं ( यही इस प्रोटेस्ट की अहम कामयाबी भी है ). भले ही इससे सार्वजनिक सहमति देने में कुछ लोगों की भक्ति आड़े आती हो..

अब बात सर्बिया की जहाँ वोटिंग हो चुकी है और हर कोई बैचेनी से नतीजों का इंतजार कर रहा है. वहां हुआ क्या था इसे छोटे से में इन पॉइंट्स से समझें –
साल 2024 के नवंबर महीने के पसले ही दिन वहां के नोवी साद रेलवे स्टेशन की कांक्रीट की छत गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई थी. लोगों ने सरकार की लापरवाही, भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण को इस हादसे का जिम्मेदार माना

1 – हादसे के तुरंत बाद पूरे सर्बिया में सरकार के इस्तीफे और उसके भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू हो गए जिन्हें ताकत मिली छात्रों के आंदोलन से जो लगातार दो साल तक चला.

2 – जब सरकार के अडियल रवैये में कोई बदलाव नहीं आया तो छात्रों ने स्टूडेंट लिस्ट नाम का राजनैतिक दल बना लिया. इस पार्टी के जरिए छात्रों ने सत्तारूढ़ पार्टी एसएनएस के मजबूत विकल्प के तौर पर खुद को न केवल पेश किया बल्कि स्थापित भी कर लिया.

3 – इस दौरान छात्रों के विरोध प्रदर्शन जारी रहे. लेकिन अडियल कट्टर दक्षिणपंथी नेता अलेक्जेंडर वुसिक तब जाकर माने जब उनके सामने छात्रों के दबाब के आगे झुकने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा ( टीम दिपके ध्यान दे ). गौरतलब है कि वुसिक भी 14 सालों से सर्बिया की सत्ता और सिस्टम के इकलौते शहंशाह बने बैठे थे. उन्हें कट्टरपंथी ईसाईयों का वैसा ही अँधा सपोर्ट मिला हुआ था जो अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प को मागा का और भारत में मोदी को आरएसएस और सवर्णों का मिला हुआ है.

4 – सर्बिया में शेड्यूल के मुताबिक आम चुनाव दिसम्बर 2027 में होना थे. लेकिन छात्र आंदोलन ने अलेक्जेंडर वुसिक को न केवल इस्तीफ़ा देने मजबूर कर दिया बल्कि उन्हें अक्तूबर 2026 में ही चुनाव कराने की घोषणा करना पड़ी जो कि हो चुके हैं. अब रोमांच इस बात का है कि जनता किसे चुनती है जिद्दी, अडियल और लगभग तानाशाह हो चुके अलेक्जेंडर वुसिक को या स्टूडेंट लिस्ट को जिसने बतौर प्रधानमन्त्री नामी कार्डियोलाजिस्ट इलिजा सर्ड्रानोविच को पेश किया है. लेकिन यह नाम फाइनल नहीं है. क्योंकि छात्रों ने किसी को भी अपना नेता नहीं चुना है बल्कि इलिजा को तगड़े दावेदार के तौर पर देखनेका इशारा किया है.

5 – चुनाव के बाद जो सर्वे आए हैं उनके मुताबिक एसएनएस अलाइंस और स्टूडेंट लिस्ट में कांटे की टक्कर होते बेहद नजदीकी मुकाबला है. 20 अक्तूबर 2026 के एक सर्वे एनएसपीएम की मानें तो स्टूडेंट लिस्ट को 44.4 फीसदी और एसएनएस अलाइंस को 42.7 फीसदी वोट मिल सकते हैं. 22 अक्तूबर को आए एक और सर्वे के मुताबिक एसएनएस अलाइंस को 47.4 और स्टूडेंट लिस्ट को 40 फीसदी वोट मिलने की संभावना है. इस लड़ाई में दिलचस्प बात यह भी है कि लगभग सभी पारम्परिक पार्टियाँ हाशिए पर आ गई हैं. इनमे प्रमुख विपक्षी दल सर्बिया अगेंस्ट वायलेंस शामिल है.

सर्बिया और भारत में अंतर भले ही बहुत हों लेकिन छात्र आंदोलन के मद्देनजर समानताएं ये हैं कि वहां भी सरकार और दक्षिणपंथियों ने छात्र आंदोलन की हर तरह की कोशिशें की उनकी हिम्मत तोड़ने उन्हें गिरफ्तार भी किया गया. लेकिन सर्बिया के वकील तो वकील जजों ने भी खुलेआम छात्रों का साथ दिया. यानी बुद्धिजीवी तबका भारत की तरह छात्रों के साथ रहा. केवल भक्त टाइप के लोग ही भारत की ही तरह अलेक्जेंडर वुसिक के साथ है.

कौन भारी पड़ा दक्षिणपंथी या उदारवादी यह 26 अक्तूबर को पता चलेगा नतीजा जो भी आए भारत के लिहाज से अहम रहेगा. जहाँ सरकार आंदोलन कुचलने साम, दाम, दंड, भेद चारों का सहारा ले रही है. प्रोटेस्टर्स को हर कभी गिरफ्तार किया जा रहा है, उन पर विदेशी फंडिंग और एजेंट होने के झूठे अप्रमाणित आरोप मढ़े जा रहे हैं. कुल जमा एक ज्ञानेश कुमार को बचाने युवाओं के साथ तानाशाही रवैया अपनाया जा चुका है. लेकिन युवा कहीं नहीं झुक रहे वे फ़्रांस का युवा भी नहीं झुका था और अल्बानिया का भी नहीं झुक रहा है फिर नेपाल और बांग्लादेश की तो बात ही क्या करना.

सोचना बेकार है कि मोदी अलेक्जेंडर वुसिक की राह चलेंगे कि प्रोटेस्ट से बचने या फिर उसकी गहराई देखने चुनाव ही करा लिए जाएँ. जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो. शायद योगेन्द्र यादव की भी मंशा यही है लेकिन यह उन्हें फिर से समझना होगा कि वे खुद भी ज्ञानेश कुमार हटाओ मुहिम में इसीलिए शामिल हुए हैं कि वोट चोरी हो रहे हैं. जिसके लिए यह जोक अक्सर चलन में रहता है कि बटन किसी का भी दबाओ वोट गिरेगा तो कमल के फूल पर. अब तो लोगों से बटन दबाने का ही हक छीन लिया गया है जिसे लेकर आक्रोशित छात्र सर्बिया की तरह सड़कों पर हैं. Serbia Elections

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