Tech Companies: इस के मुकाबले 1989 में 20 सब से अमीर घरों की संपत्ति 88.6 बिलियन डौलर  थी जो 2026 में बढ़ कर 9 ट्रिलियन डौलर हो गई है. बिलियन और ट्रिलियन का खेल समझना आसान नहीं है. 1 बिलियन में 1 अरब होते हैं और 1 बिलियन डौलर का अर्थ है 9,500 करोड़ रुपए. वहीं, 1 ट्रिलियन डौलर का मतलब है 95,00,000 करोड़ रुपए.

यह अंतर कैसे आया है. आम जनता को अमेरिका में बंदूक के बल पर लूटा नहीं गया है. वहां कोई ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं आई, वहां आईं टैक कंपनियां. टैक कंपनियों ने इंटरनैट, जो पहले ही ईजाद हो चुका था, पर तरहतरह के सुधार करने शुरू किए. नतीजतन, 35-36 सालों में वहां हरेक इंटरनैट का गुलाम हो गया.

जब आदमी गुलाम बन जाता है तो वह अपनी छाप को खुदबखुद खो बैठता है. भारत में मुसलिम आए थे तो उन्होंने सही शासन कर सड़कें, टैक्स व्यवस्था बनाई मगर उसी के बलबूते उन्होंने अपनी ऐयाशी के साधन जुटा लिए. उन के आने से पहले भारत में पैसा था लेकिन वह मंदिरों में जमा हो जाता, आर्थिक सुधार के काम नहीं आता था. जो संस्कृति हमें विरासत में मिली है उस से यह साफ है कि मुसलिम लुटेरों के राज से पहले हम कच्चे मकानों में रहते थे. राजाओं के कहने पर एकदूसरे से लड़तेमरते रहते थे. आम जनता गरीब थी पर शायद मंदिर अमीर थे क्योंकि उन्होंने उसी तरह जनता को बहका रखा था जैसा आज की टैक कंपनियां जनता को बहकाए हुए हैं.

एक समाज सुखी तब समझा जाता है जब हरेक नागरिक के पास बेसिक सुविधाएं तो हों. अमेरिका सब से अमीर देश है, भारत की 2,800 डौलर प्रति व्यक्ति सालाना आय के मुकाबले वहां 85,000 डौलर प्रति व्यक्ति आय है. लेकिन वहां 50 फीसदी जनता त्रस्त है. वह दो वक्त खाना तो खा सकती है पर तकरीबन सड़ने लगे मकानों में रहने को मजबूर है. नौकरियों का भरोसा नहीं है. घर टूट रहे हैं. घर्म का प्रचार जोरों पर है.

असल में नीचे के 50 फीसदी लोगों ने अपना मस्तिष्क टैक कंपनियों के हवाले कर दिया है. वे उन के मानसिक गुलाम हैं. टैक कंपनियों को चर्चों का बड़ा साथ मिला हुआ है. हर ईसाई संप्रदाय के लोग टैक कंपनियों के मालिकों की हर बात मानते हैं और वे जनता को बहकाते हैं. हालत यह है कि आज वहां का मीडिया भी टैक कंपनियों और चर्चों का मानसिक गुलाम बना हुआ लग रहा है.

50 फीसदी जनता अगर बदहाल है तो खुद ही की बांधी मानसिक जंजीरों के कारण. ये जंजीरें मोबाइल के जरिए घरघर पहुंच रही हैं. मिस्टर बीस्ट जैसे इन्फ्लुएंसर्स के करोड़ों में फौलोअर्स है जो सिवा बकवास के कुछ नहीं कहतेदिखाते. डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी भी इसी के शिकार हैं. यही बढ़ते भेद का कारण है. यह भेदभाव बंदूक के बल पर नहीं थोपा गया है. यह सिर्फ गुलामों के हाथों में लोहे व प्लास्टिक के पुरजों से बना मोबाइल पकड़ा कर किया गया है.

क्या आप को इस में भारत की छवि भी दिखती है? यदि नहीं, तो मान लें कि आप भी टैक कंपनियों के गुलाम हैं. Tech Companies

 

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