Social Media Trends: एक सुबह श्वेता ने यूट्यूब पर एक वायरल डांस स्टैप क्या देख लिया, कई दिनों तक उसी डांस स्टैप का वीडियो उस के सोशल मीडिया पर बिन बुलाए बादल की तरह छाया रहा. वह जब यूट्यूब खोले तब उस डांस स्टैप को करता कोई नया डांसर उस के सामने आ जाता. कभी लड़की, कभी बच्चा तो कभी कोई बूढ़ा उस डांस को पेश करने लगता, जिसे देख श्वेता को यह अफसोस होता कि आखिर उस ने वह पहली वीडियो देखी ही क्यों.
आज जिस तरह से सोशल मीडिया पर कंटैंट दिखाया जा रहा है उसे देखते हुए इसे सोशल मीडिया नहीं बल्कि रिपीटेशन मीडिया कहना चाहिए. सोशल मीडिया पर समाचारों, वीडियो और रीलों का बारबार आने का कारण है एल्गोरिदम. जो दुनियाजहान के कंटैंट और इन्फौर्मेशन में उस चीज को ज्यादा दिखातासुनाता है जिसे सोशल मीडिया पर अधिक देखा, सुना और सर्च किया जा रहा है. भले आप की उस कंटैंट में रुचि हो या न. अगर वह उस समय ट्रैंडिंग है तो कुछ समय तक जब तक कि उस की चर्चा दुनिया कर रही है, वह आप के अकाउंट या पेज पर घूमताफिरता आता ही रहेगा.
इस समय आप की अपनी पर्सनल चौइस के कंटैंट से ज्यादा सोशल ट्रैंडिंग कंटैंट आप को दिखता रहेगा. यहां एल्गोरिदम डिजाइन ही कुछ ऐसा है कि वह इंस्टाग्राम, टिकटौक और फेसबुक जैसे प्लेटफौर्म पर ज्यादा देखे जाने वाली न्यूज या रील को बढ़ावा देता है जो तेजी से हर किसी का ध्यान आकर्षित करती है. परिणामस्वरूप, लाखों फीड्स में एक ही तरह के वायरल ट्रैंड या समाचार क्लिप दिखाई देते हैं.
लेकिन क्या सिर्फ एल्गोरिदम ही कारण है इस रिपीटेशन का
एल्गोरिदम तो वह दिखाता है जो ट्रैंडिंग बना हुआ है लेकिन उसे ट्रैंडिंग बनाने के पीछे तो उसे बनाने वाले क्रिएटर ही हैं जो एकजैसा कंटैंट बनाते ही रहते हैं. जब एकजैसा कंटैंट ही बनाया और पोस्ट किया जाएगा तो एल्गोरिदम भी उसी कंटैंट को बारबार सामने रखेगा.
जैसे गणेश चतुर्थी पर वायरल हो रही जयपुर मोती डूंगरी के मंदिर की रील, जो 2 दिन तक सोशल मीडिया पर छाई रही. आप जब इंस्टाग्राम खोलते, इस मंदिर की रील सामने आ जाती क्योंकि इस रील को बनाने वाले क्रिएटर बहुत हैं. इंस्टाग्राम अकाउंट @jaipur.bindaas के इस मंदिर की मेहंदी वाली रील पर 1.7 मिलियंस व्यूज हो चुके हैं, वहीं @jaipur_pink_city की रील पर 2 दिनों में 16 मिलियन व्यूज, @manmohakjaipur की रील पर 25.2 मिलियन व्यूज हो चुके हैं. इन्हीं की तरह हजारों लोगों ने उस दिन सिर्फ एकजैसी यानी मोती डूंगरी मंदिर की मेहंदी पर रील बनाई है और फिर सोशल मीडिया पर वही दिनरात चला भी था. तो जब सब कंटैंट क्रिएटर एक ही जैसा कंटैंट बनाएंगे तो एल्गोरिदम दिखाएगा भी वही.
यहां क्रिएटर एकजैसा कंटैंट बनाता भी इसलिए है कि वह ट्रैंड के साथ चल सके, जो औडियंस दूसरे क्रिएटर का कंटैंट देख रही है वह उन्हें भी देखे, उन्हें लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे.
यहां अपनी औडियंस बढ़ाने के लिए एक क्रिएटर कौपीकैट की तरह काम करता है यानी वह दूसरे का कंटैंट कौपी कर अपना कंटैंट बनाता है या उसी के कंटैंट में कुछ फेरबदल कर, एडिटिंग कर उसे अपना नाम देता है. यहां देखने की बात तो यह है कि कौपी किए बहुत से कंटैंट एक बहुत बड़ा जोखिम लिए रहते हैं, जो है झूठ फैलाने का. ये कंटैंट कौपी किए होते हैं, जहां विश्वसनीयता शून्य ही है क्योंकि यहां कौपी क्रिएटर ने उस कंटैंट की सच्चाई का न पता लगाया होता है, न उस इन्फौर्मेशन पर रिसर्च की होती है, न उसे तथ्यों से नापापरखा होता है.
यह सिर्फ एक गौसिप की तरह सोशल मीडिया पर चलता रहता है. इस तरह यह कंटैंट गलत और झूठी इन्फौर्मेशन फैलाने में भी पीछे नहीं होता. यहां कोई भी कंटैंट या न्यूज जिस का सत्यापन न हो, सनसनीखेज अफवाहें या कोई ट्रैंडिंग कंटैंट पुख्ता तथ्यों की तुलना में छहगुना तेजी से फैलते हैं, चाहे वह कोई लव अफेयर हो, सोशल झगड़ा हो या कोई भी ऊलजलूल रील हो. इन कंटैंट के लिए लोगों का प्यार, गुस्सा, या आश्चर्य भावना इतनी तीव्र होती है, ठोस होती है कि इन्हें वायरल होने में या समाज में फैलने में देर नहीं लगती, जिस का लोगों पर कई तरह से असर पड़ता है.
औडियंस पर प्रभाव
• आक्रोश और खेद: किसी भी तरह की गलत न्यूज, फेक कंटैंट या झूठ लोगों की मानसिकता को प्रभावित करता है. यदि कंटैंट किसी प्रोडक्ट को ले कर झूठा रिव्यू पेश कर रहा तो उस कंटैंट से प्रभावित हो उसे खरीदने वाले के पैसे बरबाद होंगे. यदि न्यूज़ में ऐसी बात कही गई जो एक समुदाय के खिलाफ हो या उसे बुरा दिखा रही है तो यह समाज में आक्रोश पैदा कर देती है. इस तरह किसी भी गलत कंटैंट या न्यूज का औडियंस पर सीधा असर होता है.
• सही अपडेट छुट जाना: एक ही तरह की खबरों या बारबार दोहराई जाने वाली खबरों की अधिकता औडियंस को उबा देती है, जिस से वे महत्त्वपूर्ण अपडेट्स को अनदेखा करते हुए स्क्रौल करते चले जाते हैं.
• मानसिक थकान: इस में कोई शक नहीं कि इस तरह का रिपीटेशन या दोहराव देख औडियंस को मानसिक थकान, स्ट्रेस और गुस्सा भी आता होगा.
आखिर एक ही खबर को रिपीट किया जा रहा है. यूटूयूब, न्यूजएजेंसी, इंस्टा सब वही दिखा रहे हैं. हर जगह रिपीटेशन चल रहा है. तो भला आप उसे कितना ही देखेंगे. इस तरह का रिपीटेशन सिर्फ आप का टाइम ही नहीं बल्कि एनर्जी भी वेस्ट करता है. एक स्क्रौलिंग पूरा दिन खा जाता है. एंकर या क्रिएटर भी भूमिका बांध एक ही न्यूज या कंटैंट परोस रहा है. आप स्वयं ही सोचिए क्या इस तरह का कंटैंट या न्यूज सिर्फ अज्ञान नहीं बढ़ा रहा क्योंकि यहां कोई तथ्य या सच्चाई तो परखी ही नहीं गई, न ही कोई अच्छी स्किल दिखाई या सिखाई गई और न ही किसी ठोस मुद्दे पर चर्चा हुई या उसे सामने रखा गया.
आज समाज में बहुत गंभीर इश्यूज हैं- एजुकेशन सिस्टम, इक्वैलिटी, हैल्थकेयर, बेरोजगारी. लेकिन हमारे सोशल मीडिया पर हमारे वायरल टौपिक्स क्या उठा रहे हैं कि मोमो मैदा फ्री है या नहीं, किस मंदिर में रील बन रही है, ट्रैंडिंग डांस स्टैप कौन सा है, नेटफ्लिक्स पर क्या नया आया है, किस इंफ्लुएंसर के पास महंगी गाड़ी है, आईफोन पर डिस्काउंट कैसे लें, मैट्रो और सड़कों पर रील्स कैसे बनाएं. अगर हम इसी तरह की और एकजैसी न्यूज के पीछे पड़े रहेंगे तो क्या मिलेगा? इस तरह की इन्फौर्मेशन और कंटैंट से सोशल मीडिया सिर्फ आप को बहका रहा है, सच्चाई से भटका रहा है.
दिखाई जाने वाली कोई खबर यदि सही भी है, सच्ची भी है तो आप उस को कितना देखोगे. क्या पूरे दिन या आठों पहर एक ही न्यूज, एक ही रील, एक ही पोस्ट देखते रहोगे. नहीं न. क्या आप को नहीं लगता कि इस तरह के क्रिएटर, इस तरह का एल्गोरिदम और ये टैक कंपनीज और इन के सोशल प्लेटफौर्म्स आप को सच्चाई से दूर रखने का काम कर रहे हैं और आप को अपनी ट्रैंडिंग और वायरल कंटैंट की दुनिया में ही जकड़े हुए हैं.
नकलची बंदर
सोशल मीडिया पर खुद को क्रिएटर कहने वाली अधिकांश संख्या सिर्फ एक एकदूसरे का कंटैंट कौपी कर रही है या कहें नकलची बंदर का काम कर रही है. Social Media Trends
लेखिका – रजनी प्रसाद





