Hindi Stories: वैसे तो सबइंस्पैक्टर श्रीराम सिंह बुरारी थाने पर तैनात था पर कल शाम उस को पार्लियामैंट स्ट्रीट बुला लिया गया था. पूरी दिल्ली की पुलिस बुलाई गई थी. जंतरमंतर पर आंदोलनकारी एक महीने से बैठे थे, जाने का नाम नहीं ले रहे थे. उस पर ये अनशन करने वाले. अनशनकारियों की हालत तो अब काफी नाजुक हो चुकी, फिर भी वे हौस्पिटल जाने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे. कल संसद मार्च का एलान था अलग. प्रशासन चुप तो नहीं बैठ सकता. कुछ तो अब करना होगा. सरकार ने रातोंरात अनशनकारियों को उठा कर हौस्पिटल ले जाने का फैसला किया. हिदायत दी गई कि कोई हंगामा बरदाश्त न किया जाए. पूरी तैयारी थी.
श्रीराम सिंह ने पुलिस महकमे में अच्छा नाम कमाया था. सिपाही में भरती हुआ था. आज मेहनत से सबइंस्पैक्टर बन चुका था. सारी जिंदगी ईमानदारी से काम किया. जो भी ड्यूटी मिली, पूरी तत्परता से निभाई थी. भीड़ नियंत्रण के लिए उसे हमेशा बुलाया जाता था. श्रीराम सिंह का मानना था कि पुलिस में होने के नाते उस का कर्तव्य है सरकार की हर बात मानना.
श्रीराम सिंह को तो कल घर जाने की भी फुरसत नहीं मिली. आज से वह 2 दिनों की छुट्टी लेने वाला था. बड़ी बेटी का आज जन्मदिन था. 2 बेटियां थीं उस की. बड़ी बेटी आरजू कक्षा 11१ में थी. श्रीराम सिंह उसे आईपीएस औफिसर बनाना चाहता था. बेटी को ऊंचे पद पर देखना चाहता था. पर बेटी डाक्टर बनना चाहती थी. छोटी बेटी संजू अभी स्कूल में थी. जन्मदिन के अवसर पर श्रीराम सिंह की हमेशा कोशिश रहती थी कि वह घर पर रहे. आरजू भी तब तक केक नहीं काटती थी जब तक पापा घर पर न आ जाएं.
आरजू बहुत मेहनती थी. हमेशा अपने क्लास में अव्वल आती थी. श्रीराम सिंह का कलेजा चौड़ा हो जाता था उस का रिजल्ट देख कर. क्यों हो भी न. जब आरजू ने डाक्टर बनने की इच्छा व्यक्त की तो मां ने उस की वकालत की थी. “सब को पुलिस में जाना जरूरी तो नहीं है. फिर डाक्टर तो बड़ी चीज होती है. क्यों आईपीएस के पीछे पड़े हो?”
“ठीक कहती हो, रज्जो. डाक्टर का काम बड़े परोपकार का है. बनने दे डाक्टर.“
आरजू आकाश कोचिंग इंस्टिट्यूट में कोचिंग की पढाई करना चाहती थी. श्रीराम सिंह ने दौड़धूप कर दाखिला कराया. जब समय मिलता था खुद छोड़ने और लेने जाता था. कोचिंग से वापस आने में रात हो जाती थी. लगातार मोबाइल पर संपर्क में रहता. थाने पर सब चिढ़ाते थे. पता नहीं किस से लगा रहता है रात में. हंस कर रह जाता था श्रीराम सिंह. पर उसे चैन तभी मिलता था जब आरज़ू घर पहुंच जाती थी.
आरजू का 16वां जन्मदिन आ गया था.
“क्या चाहिए आरजू बेटी इस बार जन्म दिन पर. सोच समझ कर बता.”
“पापा, इस बार तुम सारे दिन घर पर रहो, बस. कुछ नहीं चाहिए. इतना कोचिंग पर खर्च हो रहा है. अब ज्यादा खर्च नहीं करना.”
खुश हो जाता था श्रीराम सिंह. कितनी समझदार है बेटी.
पर अब कहां छुट्टी. पुलिस ने अनशनकारियों को तड़के सुबह उठा लिया था. ज्यादा हंगामा भी नहीं हुआ और पुलिस को उम्मीद थी कि संसद मार्च में ज्यादा लोग नहीं आएंगे. यह तय हुआ था कि भीड़ पार्लियामैंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के बैरियर को किसी हालत में तोड़ न सके. चाहे जो भी करना पड़े.
इस बार आरजू का दिल टूट जाएगा. वह तो बस सिर्फ इतना चाहती थी कि पापा जन्मदिन पर छुट्टी ले कर घर पर रहें. पुलिस ड्यूटी का क्या भरोसा. बेटी के जन्मदिन के दिन भी लाठी पकड़नी पड़ रही है.
सुबह होते ही हर कोने से युवा लोगों का हुजूम चला आ रहा था. रुकने का नाम ही नहीं. 12 बजे तक तो जंतरमंतर जाने वाले सारे रास्ते भर चुके थे. कहीं रील बन रही थीं. कहीं ढोलमजीरे बज रहे थे. कहीं नाचगाने हो रहे थे. स्टेज पर कोई सुर में गा रही थी- “देश की तबाही का हिसाब दीजिए. युवा सारे देश के सड़क पर आ गए. नीट पेपर लीक पर तुम चुप्पी खा गए…”
पता नहीं कैसे लोग हैं ये? इन को समझना मुश्किल है. यह कोई हंसीमजाक का दिन है? डर भी नहीं लग रहा इन्हें. श्रीराम सिंह को बड़ी खीझ आ रही थी. इतनी पुलिस है और ये रील बना रहे हैं. बेखौफ चले जा रहे हैं जैसे कि हम लोग इन्हें जाने देंगे संसद. कोई डफली बजा रहा है तो कोई ढोलक. ऐसा लग रहा है किसी जलसे में आए हों.
संसद मार्ग पर भीड़ आगे बढ़ती जा रही थी. आदेश आया रोकने का. डीसीपी साहेब हांफते हुए आए थे. “नेम टैग हटा लो सब. प्रोटैक्टिव गियर में बिलकुल तैयार हो जाओ. एक भी लोग आगे नहीं जाने चाहिए.” कल रात में ही सब की ब्रीफिंग कर दी गई थी. लाठी वालों को आगे रखा गया था. श्रीराम सिंह को उन्हें लीड करना था. भीड़ नियंत्रण का पुराना अनुभव था उसे.
बैरियर के ऊपर चढ़ गए थे लोग. कुछ तो उस पार चले भी गए. पुलिस उन को पकड़पकड़ कर वापस भेज रही थी. पर फिर वहीं पहुंच जा रहे थे. आ गए वाटर कैनन वाले. अब ये भागेंगे. पानी की बौछार. सब भीग रहे हैं. फिर भी नहीं जा रहे. उस बौछार में भी गाना चलने लगा. रील भी बन रही है. अब तो टीयर गैस छूटने लगे. सांस लेना भी मुश्किल है. श्रीराम सिंह ने भी मास्क लगा लिया. टीयर गैस से उसे बहुत एलर्जी है. आरजू को तो हर चीज से एलर्जी है. श्रीराम सिंह उस के लिए हमेशा मास्क ला कर देता था, “बेटे, मास्क हमेशा साथ रखा करो. जब कहीं जरूरत हो, लगा लो. इतना पौल्युशन है दिल्ली में.” आरजू हंस कर टाल देती थी. “पापा, इतना भी क्या बचबच के जीना.”
अरे यह क्या हुआ. ये लोग तो बैरियर ही ले कर भाग रहे हैं. सब आगे निकल गए. “क्या कर रहे तुम लोग श्रीराम सिंह? अब क्या इन को संसद जा कर रोकोगे?” डीसीपी साहब एकदम ग़ुस्से में थे. श्रीराम सिंह पुलिस वालों के साथ आगे बढ़ा. टीयर गैस के कारण कुछ साफ दिख नहीं रहा था. जय सिंह रोड से लड़केलड़कियां अचानक आ गए. “रोको, लाठीचार्ज.”
श्रीराम सिंह का डंडा तेजी से घूम रहा था. बड़े जिद्दी लोग थे. रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. 2 लड़कियों ने डंडा भी पकड़ने की कोशिश की. श्रीराम सिंह ने जोर से डंडा घुमाया. सीधे सिर पर. “ओह, पापा, मम्मी.” गिर पड़ी वह. यह किस की आवाज है.
“अरे, कौन, आरजू बेटा?” श्रीराम सिंह के हाथ से डंडा छूट गया.
“पापा, तुम?”
श्रीराम सिंह की आंखों के सामने बिलकुल अंधेरा छा गया था. पूरा शरीर कांपने लगा. हाथों में बेटी को उठा रहा था मगर जैसे बिलकुल ताकत नहीं थी. दोनों हाथों में उसे लिए बेतहाशा भागा जा रहा था थाने की तरफ.
जो भी पहली पुलिस जीप दिखी, उस में उस ने बड़ी सावधानी से बेटी को पीछे की सीट पर लिटाया और ड्राइवर को मिन्नत करते हुए बोला, “जल्दी चल भाई लोहिया हौस्पिटल.” वहां पहले से ही भीड़ थी. कितने लोगों को चोट आई थी. कोई स्ट्रेचर खाली नहीं दिखा. दोनों हाथों पर बेटी को लिए श्रीराम सिंह पहुंचा इमरजैंसी में. बड़ी मुश्किल से एक बेड पर लिटाया. सिर से खून रुक नहीं रहा था.
“अभी डाक्टर आ रहा है, बेटी. बस, एक मिनट.”
“पापा, डंडे में लगता है कील लगी थी क्या?”
श्रीराम सिंह के मुंह में मानो जबान ही नहीं थी.
बेटी की नब्ज धीमी हो रही थी. “जल्दी चलिए डाक्टर साहब. वह बेहोश हो रही है.”
“सब तो यहां सीरियस मरीज ही हैं, आज. आप लोग मारते भी हैं और फिर हौस्पिटल भी लाते हैं.”
डाक्टर ने देखा. “अरे यह तो बहुत गंभीर चोट है. इसे आईसीयू ले चलो. एकदम जल्दी.” डाक्टर नर्स पर चिल्ला रहे थे.
रातभर श्रीराम सिंह आईसीयू के बाहर बैठा रहा था. रज्जो और छोटी बेटी भी आ गई थीं.
“मेरी बेटी के साथ आप के पुलिस वालों ने क्या कर दिया?”
श्रीराम सिंह की आंखें झुकी थीं. रोतेरोते आंखें जवाब दे गई थीं.
सुबह के 4 बज रहे थे.
“मैं थोड़ी देर थाने हो कर आता हूं. एक हफ्ते की छुट्टी की अर्जी डाल दूं.”
“जल्दी आना. हमें बहुत घबराहट हो रही है.”
पार्लियामैंट स्ट्रीट थाना नजदीक ही था. श्रीराम सिंह के पैर जल्दीजल्दी उठ नहीं रहे थे. जंतरमंतर पर अभी भी गीतसंगीत की आवाज आ रही थी. आज तो भीड़ और भी ज्यादा थी. सीपी जाने वाले हर रोड लड़केलड़कियों से भरे हुए थे. लगता था रातभर सब यहीं थे. जैसेजैसे जंतरमंतर नजदीक आ रहा था, सुर व बीट और तेज हो रहे थे.
पुलिस वाले अभी भी लाठी लिए खड़े थे और वो भी यह तमाशा देख रहे थे. श्रीराम सिंह को अब उन की लाठी भयावह लगने लगी थी. वही लाठी जिसे वह बरसों तक शान से लिए फिरता था, आज सांप बन कर मानो डंस रही थी. इसी लाठी की वजह से उस की बेटी आज जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थी.
“पुलिस वाले बाबू, एक डंडा लगा दो” नाचनेगाने की आवाज. “दिल से आवाज उठी है, उस को कैसे दबा दो?” सुर में गा रहे थे सब. झूम रही थी पूरी भीड़.
श्रीराम सिंह के मन में सवाल उठ रहे थे, “क्या चाहते हैं ये लोग? मंत्री का इस्तीफ मांग रहे हैं. ये लोग तो सरकार पर दबाव डाल रहे हैं. यह काम इन का नहीं है. क्या यह ठीक है?”
‘क्यों नहीं ठीक है? अरे भाई, जिम्मेदारी ही तो मांग रहे हैं. इस में क्या गलत है,’ दिल की आवाज आई.
3 लड़के श्रीराम सिंह के पास आए और चिढ़ाने लगे, “सर, कल हम नहीं आए थे. आज एक डंडा लगा दो न, प्लीज़. हम ने डंडे नहीं खाए हैं न. बड़ी बेइज्जती हो रही है हमारी.”
श्रीराम सिंह को अपनी ही वरदी से चिढ़ हो रही थी. “उफ, यह वरदी भी तो उतारने का समय नहीं मिला. काश, मैं सादे कपड़ों में रहता.” अपने हाथ में डंडे की कल्पना भी उसे डरा रही थी. मन विचलित था.
“क्या कल फिर मेरी ड्यूटी भीड़ नियंत्रण के लिए लगी तो वह इनकार कर सकेगा? फिर लाठीचार्ज का आदेश हुआ तो?”
‘श्रीराम सिंह, अब तुम ऐसा इसलिए सोच हो रहे हो क्योंकि लाठी तुम्हारी बेटी को लगी है. अगर किसी दूसरे का सिर फटता तो?’ दिल की आवाज भी असमंजस में थी.
गाना और तेज हो चुका था, “यूनिफौर्म के पीछे इंसान को जगा दो, पुलिस वाले बाबू, मुझे डंडा लगा दो…” Hindi Stories
लेखक – अमरेन्द्र तिवारी




