Gandhari Movie Review: महाभारत में गांधारी ने अपनी आंख पर पट्टी इसलिए बांध ली थी ताकि वह आजीवन अपने अंधे पति धृतराष्ट्र के समान पीड़ा महसूस कर सके. मगर गांधारी नाम की इस फिल्म में किसी महिला द्वारा अपने पति के लिए त्यागभाव नहीं बल्कि एक मां का अपनी बेटी को खोज निकालने का जज्बा दिखाया गया है. मगर अफ़सोस कि नाम का सहारा ले कर बनाई गई यह फिल्म बेपटरी और बेतुके मारधाड़ के तमाशे में बदल जाती है.

कहानी शुरुआत में थोड़ी सी उत्सुकता जगाती है. बनी (तापसी पन्नू) और उस का पति गोकुल (इशवाक सिंह) अपनी 5 साल की बेटी मिश्टी के साथ पश्चिम बंगाल के किसी काल्पनिक शहर ‘जोयपुरा’ के रेलवे स्टेशन पर उतरते हैं. अचानक उन की बच्ची किडनैप हो जाती है. किडनैपर का पीछा करते समय बनी की आंखों में चोट लग जाती है और उस की देखने की शक्ति टैंपरेरी चली जाती है.

दोनों शहर की लोकल पुलिस में मामला दर्ज कराते हैं मगर पुलिस इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाती. बनी ठान लेती है कि वह अपनी बेटी को ढूंढ़ निकालेगी. ठीक इसी समय थाने में इंस्पैक्टर कबीर (जतिन सरना) की नियुक्ति होती है जो ईमानदार अफसर है. इस के बाद गोकुल और इंस्पैक्टर कबीर अलगअलग इलाके में गम हुई मासूम बच्चियों की तलाश में जुट जाते हैं. वहीं बनी अंधेपन का ढोंग करते हुए वह खुद अपनी बेटी को ढूंढ़ने और चाइल्ड ट्रैफिकिंग चलाने वाले ब्लैक होल गैंग को ढूंढ़ निकालती है.

जितना अच्छा फिल्म का शुरुआती आधा घंटा दिखाई देता है, फिल्म बढ़तेबढ़ते उतनी ही बेपटरी होती जाती है. इस बीच फिल्म में कई बेतुके ट्विस्ट डालने की कोशिश की जाती है, जैसे जो औरत उस की मदद करती है वह भी इस रैकेट में शामिल होती है. और तो और, बनी बचपन में इसी गैंग से बच कर निकलती है.

सुनने में यह कहानी जितनी इंस्पायरिंग दिखाई देती है, स्क्रीन पर उतरते ही यह अपनी पटरी से पूरी तरह उतर जाती है. लेखक कनिष्का ढिल्लों और निर्देशक देवाशीष मखीजा ने थ्रिल पैदा करने के चक्कर में इतने सारे बेतुके ट्विस्ट ठूंस दिए हैं कि लौजिक का नामोनिशान नहीं रह जाता. आप खुद सोचिए बनी एक महीने के अंदर ही अचानक से सुपरफाइटर, जिम्नास्ट और जासूस बन जाती है. यहां तक कि वह आंखों पर पट्टी बांधे ही दुश्मनों से लड़ने लगती है. इस के अलावा कहानी में जोयपुरा के बहुरूपियों, नकाबपोशों और स्थानीय मान्यताओं का जो जाल बुना गया है, वह बेहद सतही और नकली लगता है.

फिल्म में सब से बड़ी समस्या यह है कि जो चीजें आसानी से पच नहीं सकतीं, वे दिखाई गई हैं. एक समय समझ नहीं आता कि यह इमोशनल स्टोरी है या ऐक्शन या सस्पैंस.

हालांकि ऐक्टिंग के मामले में भी यह फिल्म निराश करती है. तापसी पन्नू पूरी फिल्म में सिर्फ 2 ही मूड में दिखती है. या तो वह बिलख कर रो रही है या फिर किसी साउथ स्टाइल हीरो की तरह हवा में लातघूंसे चला रही है. एक लाचार और चोटिल मां के रूप में वह भावनात्मक जुड़ाव नहीं बना पाती.

इशवाक सिंह, जो एक लाचार पिता का किरदार निभा रहा है, कुछ सींस में बहुत शानदार लगता है. एक जगह जब बनी उसे कोस रही होती है कि उस ने मिष्टी को बचाया नहीं, वहां वह जिस तरह के एक्सप्रैशन दिखाता है वह कमाल का है लेकिन पटकथा का ढीलापन उस के किरदार की गहराई को भी खत्म कर देता है.

छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी, मीता वशिष्ठ और प्रशांत नारायणन जैसे बड़े और मंझे हुए कलाकारों की मौजूदगी भी इस डूबती नैया को नहीं बचा पाती. जतिन सरना एक पुलिस अधिकारी के रूप में सिर्फ चिल्लाते हुए नजर आता है, जिस का कहानी में कोई ठोस योगदान नहीं दिखता. यहां तक कि पटकथा इतनी बेसिरपैर की है कि अगर इंस्पैक्टर कबीर का किरदार न भी होता तो भी फिल्म पर कोई फर्क न पड़ता.

तकनीकी रूप से भी फिल्म काफी कमजोर है. वैसे तो फिल्म का सैटअप पश्चिम बंगाल के एक शहर पर आधारित है लेकिन पूरी फिल्म देख कर साफ पता चलता है कि इसे मुंबई के किसी स्टूडियो सैट पर शूट किया गया है. स्थानीय माहौल और उड़िया-बांग्ला बोली का जो मिश्रण पेश करने की कोशिश की गई है वह बहुत ही अजीब और अटपटी लगती है. डायलौग्स भी घिसेपिटे हैं. एडिटिंग भी औसत से नीचे है. फिल्म देख कर लगता है जैसे सीन्स बिना किसी फ्लो के एकदूसरे के ऊपर थपेड़े की तरह आते हैं.

बैकग्राउंड म्यूजिक सामान्य है, गाने हैं नहीं. फिल्म अंत में खिंची भी दिखती है. वहीं, मुख्य विलेन दादा की भूमिका में प्रशांत नारायण को मुश्किल से 5 मिनट का रोल दिया गया है, जिस में वह मार खाते दिखता है. एक लाइन में यही कहा जा सकता है कि समय बचाने के लिए फिल्म स्किप भी की जा सकती है. Gandhari Movie Review

 

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