Protest and Criticism: लेकिन हाल ही में जंतर मंतर पर हुए नीट पेपर लीक के विरोध प्रदर्शन के दौरान इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी को गालियां दी गई, उनके लिए गंदे और अश्लील शब्दों के प्रयोग किए गए, उस मेलोनी के लिए जिसका भारत या नीट से कोई लेना देना ही नही था. यह अस्वीकार्य और बहुत ही निंदनीय है. जार्जिया मेलोनी प्रदर्शनकारियों की रिश्तेदार नहीं जिसे वह कुछ भी बोले, वह एक राष्ट्र की राष्ट्राध्यक्ष हैं और आंदोलनकारियों को उनके पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए था.
इस प्रोटेस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करने के लिए उनकी तस्वीर को महिला के शरीर पर मॉर्फ करके प्रदर्शित किया गया.उन पर निहायती गंदे, भद्दे, और अश्लील स्लोगन लिखे गए. यह भीड़ के हाथों में तो था ही, साथ ही छात्र दल SFI के टेंट के नीचे भी दिखा जहां बड़े बड़े अक्षरो में लिखा था THIS TENT IS QUEER FRIENDLY यानी यहां किसी भी लैंगिक पहचान के व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और यह जगह उनके लिए पूरी तरह से सुरक्षित, सहज और सम्मानजनक है.
और उसी टेंट के नीचे एक युवक के हाथों में एक पोस्टर था जिसमें एक महिला के शरीर पर प्रधानमंत्री की फोटो लगी थी, जिसपर अश्लील स्लोगन लिखा था, जब उस युवक से पूछा गया तुम जिस टेंट के नीचे खड़े हो वह टेंट क्वीर फ्रेंडली है, उस टेंट के नीचे ऐसे डेरोगेटरी रिमार्क के पोस्टर क्यों? तो युवक कहता है, मोदी इसी लायक है. वह युवक आगे कहता है – यह राजस्थान की वह महिला है जो कुछ नहीं बोलती. तो क्या यह युवक क्या कहना चाहता है कि बोलने पर मर्दों का एकाधिकार है.
क्या चुप रहना, किसी विषय पर मुखरता से न बोलना महिला होनी की निशानी है, या कमजोर होने की निशानी है, किसी को अपमानित करने के लिए उसे महिला बोल देना, हमेशा पुरूषों को उनकी कायरता, उनकी नाकामी पर, गालीयों में महिला की तरह है, बोल देना, विरोध के नाम पर ऐसा रवैया न केवल आपत्तिजनक है बल्कि लैंगिक पूर्वाग्रह और समाज की गहरी स्त्री-विरोधी मानसिकता को उजागर करता है और यह विषय कोई नया नहीं, माहिला विरोधी ऐसी मानसिकता को समाज ने इतना सामान्य कर दिया है कि पुरूषों के साथ महिलाओं को भी इसमें कुछ गलत नहीं लगता,16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप के बाद पूरे देश में गुस्सा था.
उस समय केंद्र में कांग्रेस के प्रतिनिधित्व वाली (UPA) गठबंधन की सरकार थी और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. उस समय भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी और स्मृति ईरानी भाजपा की महिला मोर्चा की प्रमुख थीं. निर्भया कांड पर सरकार की निष्क्रियता और कानून-व्यवस्था पर आक्रोश जताते हुए स्मृति ईरानी ने महिला कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन किया था.
और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार की ‘कमजोरी’ और निष्क्रियता पर तंज कसते हुए कहा था कि अगर सरकार देश की बेटियों की सुरक्षा नहीं कर सकती, तो प्रधानमंत्री को चूड़ियां पहन लेनी चाहिए और उन्होनें प्रधानमंत्री को चूड़ियां भेजी थी. क्या चूड़ियां कमजोरी की निशानी है, किसी को अपमानित करने के लिए महिलाओं का ही इस्तेमाल क्यों?
जब भी देश में किसी बड़े मुद्दे को लेकर आक्रोश पनपता है, तो सवाल सत्ता, नीतियों और जवाबदेही पर उठने चाहिए लेकिन दुखद बात यह है कि हमारे राजनीतिक और सामाजिक विरोध का तरीका अक्सर अपनी गरिमा खो बैठता है. NEET पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर चल रहे विरोध प्रदर्शन में जब प्रधानमंत्री को अपमानित करने की नीयत से उनकी तस्वीर एक महिला के रूप में पेश की गई, तो यह सवाल उठना लाजिमी है: क्या किसी पुरुष नेता को नीचा दिखाने या ‘कमजोर’ साबित करने के लिए महिला रूप का सहारा लेना ही अंतिम रास्ता बचा है?
‘महिला होना’ कोई अपमान नहीं, बल्कि नीची मानसिकता का प्रतीक है
इस प्रकार के पोस्टरों या प्रतीकों के पीछे एक गहरी और रूढ़िवादी सोच काम करती है—महिला को ‘कमजोर’, ‘अक्षम’ या ‘दब्बू’ मानना. जब किसी पुरुष प्रतिद्वंद्वी या सत्ताधीश को लज्जित करना होता है, तो समाज उन्हें महिलाओं से जोड़कर या महिला के वस्त्रों/रूप में दिखाकर अपमानित करने की कोशिश करता है.
यह सोच सीधे तौर पर आधी आबादी (महिलाओं) की क्षमता और गरिमा पर चोट करती है। यह इस बात का सबूत है कि हमारी भाषा, विरोध के तरीके और प्रतीक आज भी इस धारणा से ग्रस्त हैं कि महिला होना अपने आप में एक ‘हीन’ स्थिति है.
NEET परीक्षा से लाखों छात्रों का भविष्य, उनकी मेहनत और उनके परिवारों की उम्मीदें जुड़ी हैं. पेपर लीक पर बात होनी चाहिए सिस्टम की नाकामी पर, जांच एजेंसियों की ढिलाई पर, और सख्त कानूनों के क्रियान्वयन पर.
लोकतंत्र में प्रधानमंत्री या सरकार की तीखी से तीखी आलोचना का अधिकार संविधान का भाग 2 के अनुच्छेद 19 देता है, लेकिन इन अधिकारों पर भी उचित प्रतिबंध लगाता है। नीतियां गलत हैं, तो उन पर सवाल उठाए जाने चाहिए; जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन आलोचना और व्यक्तिगत अपमान के बीच एक पतली रेखा होती है। जब विरोध का स्तर इस हद तक गिर जाता है कि उसमें लैंगिक विद्वेष का सहारा लिया जाने लगे, तो वह विरोध अपना नैतिक अधिकार खो देता है।
जो छात्र या युवा आज न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं, वे देश का भविष्य हैं। अगर वे ही किसी का विरोध करने के लिए महिलाओं को साधन की तरह इस्तेमाल करेंगे, तो हम एक न्यायपूर्ण और समतावादी समाज की नींव कैसे रख पाएंगे? आंदोलनों की ताकत तर्कों, तथ्यों और नैतिक अनुशासन में होती है, न कि किसी को व्यक्तिगत रूप से अमर्यादित तरीके से नीचा दिखाने में।
विरोध प्रदर्शन का यह तरीका—जहाँ किसी नेता की जवाबदेही तय करने के बजाय महिलाओं को अपमान के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाए—पूरी तरह निंदनीय है. समाज में सभी अविष्कारो को जन्म देने का दम्भ भरने वाले पुरूष अभी कुछ स्लोगन नही बना पाए है, जिसमें महिलाओं को अपमानित किए बिना, आप किसी व्यवस्था की आलोचना कर सके, उनकी जवाबदेही तय करने की बात कह सके.
जब गांधी और नेहरू की आलोचना के लिए महिलाओं का सहारा लिया जाता है, तो इससे केवल उनकी चरित्र-हनन नहीं होता, बल्कि उन महिलाओं की पहचान, स्वायत्तता और छवि को नुकसान होता है। महिलाओं को उनके अपने विचारों, योगदान को देखने के बजाय केवल पुरुषों के “मोहरे” कि तरह देखा जाता है।
मनु गांधी, आभा गांधी या एडविना माउंटबैटन का चारित्रिक हनन किया जाता है। बहसों में उन्हें केवल ‘चरित्र’ और ‘नैतिकता’ के पारंपरिक और रूढ़िवादी मापदंडों से नापा जाता है, ऐसी मानसिकता के लोग महिलाओं को वस्तु की तरह देखते है, पुरुषों की घेराबंदी के लिए महिलाओं के नाम का इस्तेमाल करना पितृसत्तात्मक मानसिकता को उजागर करता है।
अगर हम एक परिपक्व लोकतंत्र और सशक्त समाज बनना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा, अपने पोस्टरों और अपने विरोध के तरीकों से स्त्री-विरोधी सोच को बाहर निकालना होगा. नीतियों का विरोध तर्कों से होना चाहिए, न कि महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाकर. Protest and Criticism





