History of Europe: यूरोप आज समृद्ध और साफसुथरा है तो ऐसे ही नहीं है, 15वीं सदी तक वह पिछड़ा इलाका था जैसे दुनिया के दूसरे थे. लगभग सभी देशों में राजाओं और पुजारियों की खूब चलती थी और लोगों को पूरी तरह नियंत्रित करने में राजा की तलवार और धर्मों की झूठी मनगढ़ंत कहानियां खूब इस्तेमाल की जाती थीं. 16वीं सदी में प्रिंटिंग प्रैस के आने के बाद नए विचार, नई सोच, नए तर्क आए.

1748 में फ्रांसीसी विचारक बैरन डी मौन्टेस्क्यू ने अपनी किताब ‘द स्प्रिट औफ लाज’ (कानूनों की आत्मा) में कहा था कि राजनीतिक शक्ति 3 हिस्सों में विभाजित होनी चाहिए. पहली ब्यूरोक्रेसी जिस में राजा प्रमुख हो, दूसरी कानून बनाने वाली संस्था जो राजा से अलग हो और तीसरी न्यायपालिका. और तीनों एकदूसरे से स्वतंत्र हों.

यूरोप ने 15वीं सदी के बाद बेहद उन्नति की थी. उसी कारण यूरोप के ज्यादातर देशों ने इस सिद्धांत को कुछ कमतीबढ़ती के साथ मान लिया था. एडौल्फ हिटलर ने इस शक्ति का विभाजन कर दिया था और नतीजा था जरमनी समेत पूरे यूरोप का 1940 से 1945 के बीच तहसनहस हो जाना.

1950 में जो संविधान भारत में लागू हुआ उस में इन तीनों जिन के साथ चौथे संबंध के रूप में स्वतंत्र प्रैस भी था, को अलगअलग रखा गया. तभी 1947 के बाद भारत में उन्नति हुई चाहे काफी धीमी रही. आर्थिक बदलाव से ज्यादा यहां सामाजिक व पारिवारिक बदलाव हुए हैं. एक तरफ ऊंची जातियों की औरतों को काफी नए हक मिले वहीं दूसरी ओर निचली जातियों को सम्मान और बराबरी के अवसर मिलने शुरू हुए.

यह पौराणिक युग की हिंदू पद्धति के ही विरुद्ध नहीं था, ईसाई और इसलामी शासन पद्धतियों के भी खिलाफ था. यूरोप ने उन्नति की तो इसी मूल विचार के कारण कि वहां देशों में आमतौर पर इस का आदर किया जाने लगा. लोगों में चेतना जागी हालांकि पुरातनवादी चर्च लगातार इस विचार को बाइबिल विरोधी मानता रहा. सत्ता के चौथे स्तंभ प्रैस व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने फ्रैंच फिलौसफर के जैसे विचारों को घरघर पहुंचाया.

भारत में संविधान न केवल ब्यूरोक्रेसी, लेजिसलेचर और ज्यूडिशियरी अलगअलग हुए बल्कि इन सब के साथ प्रैस को स्वतंत्रता भी मिली. और 1947 से ही जवाहरलाल नेहरू की कटु आलोचना करने वाले खुलेआम निडर हो कर घूमते रहे और समाज में उन का दबदबा बना रहा. लेकिन आज सब उलट गया है.

सुप्रीम कोर्ट की एक बैंच जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस कोटिशनर सिंह ने स्टेट औफ वैस्ट बंगाल वर्सेस जय हिंद प्राइवेट लिमिटेड मामले में अपने 6 फरवरी, 2026 के निर्णय में इस सिद्धांत को भारत की शासन पद्धति की मूल जड़ बताते हुए दोहराया तो जरूर लेकिन आज जनता में यह भावना फैल चुकी है कि देश में आज न केवल चौथा स्तंभ प्रैस, मीडिया सरकार की बंदूक के नीचे है, शासन के 3 हिस्से भी प्रधानमंत्री की लोहे की मुट्ठी में बंद हैं.

सुप्रीम कोर्ट की कथनी और करनी में बहुत अंतर है. पश्चिम बंगाल में ही चुनाव आयोग ने सरकार के इशारे पर जो चुनाव सूचियां बनाने के साथ वहां का शासन अपने हाथ में ले कर भाजपा को जीत दिलाई और जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने इस की अनदेखी की, यह साफ हो गया कि शक्ति का केंद्रीयकरण हो चुका है और न केवल विधानसभा मंडल, न्यायपालिका बल्कि चुनावपालिका और मीडिया बुरी तरह सरकार की जयजयकार में लगे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का एक याचिका दायर करने वाले को परजीवी कौकरोच कहना लोगों को इतना बेचैन कर गया कि एक कौकरोच जनता पार्टी बन गई जो जुलाई माह में जंतरमंतर पर धरनेप्रदर्शनों में लग गई. सोशल मीडिया पर बनी यह पार्टी जनता का समर्थन तो पा ही रही है लेकिन इस के जमीनी कार्यकर्ता उस तरह के नहीं हैं जिस तरह के मौजूदा सत्ताधारी पार्टी भाजपा और उस के संरक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हैं.

भारत में आज न केवल सरकार विधानमंडल, न्यायपालिका और प्रैस को निगल गई बल्कि खुद भी धर्म के फौलादी जंजीरों में बंधी है.

नतीजा यह है कि हम धीरेधीरे 15वीं सदी की ओर लौट रहे हैं. राममंदिर में चढ़ावा व चंदा असल में उन्हीं मंदिर मालिकों की निजी संपत्ति है जिन्हें आज चंदाचोर कहा जा रहा है. पौराणिक परंपरा इस बारे में स्पष्ट है कि धर्म किसी का भी धन ले सकता है और राज करने वाला राजा उस का गुलाम है, काम करने वाला उस का सेवक और पढऩेपढ़ाने का एकाधिकार उसी का है. History of Europe

 

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