लेखिका – साक्षी जायसवाल

Mol Ki Bahu: खैर शुरू शुरू में सब सामान्य शादियों जैसा रहा लेकिन सालों बाद उसे समझ आ रहा है कि वह पति के समाज के लोगों के लिए आज भी बाहरी है. यहां तक कि उसके बच्चों को भी स्थानीय मां से पैदा हुए बच्चों की तरह नहीं देखा जाता. बड़े होने के बाद इन्हें पिता के परिवारवाले घर की संपत्ति में हिस्सा देना नहीं चाहते. बबली चूंकि पैसे देकर ब्याही गई इसलिए शादी के बाद उसे ‘मोल की बहू’ की कैटेगरी में रखा गया, इस श्रेणी में बबली की तरह वे महिलाएं आती हैं, जो दूसरे राज्यों से मोलभाव कर लाई जातीइ. लेकिन अब इनके बच्चों के साथ पहचान का संकट पैदा हो रहा है.

‘मोल की बहू’ जैसे अपमानजनक शब्द

हरियाणा पिछले दो दशकों से गंभीर सेक्स रेश्यो के संकट से जूझ रहा है. यहां के गांवों में हज़ारों ऐसे पुरुष हैं जिन्हें स्थानीय स्तर पर जीवनसाथी नहीं मिल सका. इस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड जैसे दूर-दराज के राज्यों की महिलाओं से शादियां कीं. स्थानीय भाषा में इन महिलाओं को आज भी ‘मोल की बहू’ या ‘खरीदकर लाई गई दुल्हन’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है.

अब तक चर्चा सिर्फ इन महिलाओं के संघर्षों पर होती थी, लेकिन एक नई पीयर-रिव्यू रिसर्च में यह सामने आया है कि इन महिलाओं के साथ होने वाला सामाजिक भेदभाव अब उनके बच्चों तक भी पहुंच रहा है. हरियाणा में ही जन्म लेने और पले-बढ़े होने के बावजूद, इनके बच्चे समाज में अपनी पहचान और सम्मान के संकट से जूझ रहे हैं.
पोलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ व्रोकला की एक स्टडी को स्कोपस-इंडेक्स्ड जर्नल एशियन एथनिसिटी में पब्लिश किया गया है. “लेफ्ट बिहाइंड ऑर लेफ्ट आउट? माइग्रेंट ब्राइड्स वरीज़ फॉर देयर चिल्ड्रन्स फ्यूचर इन क्रॉस-रीजनल मैरिजिस इन रूरल हरियाणा” नाम से यह रिपोर्ट तैयार की गई.
‘बिहारी’ और ‘चीनी’ कहकर मानसिक उत्पीड़न

स्कूलों से लेकर गांव की गलियों तक, इन बच्चों को अक्सर अपमानजनक नामों से चिढ़ाया जाता है, जो ताने और गालियां उनकी मां को दी जाती थीं, अब वही उनके बच्चों को विरासत में मिल रही हैं. इनकी माओं का कहना है कि वे खुद का अपमान तो सह लेती हैं, लेकिन जब उनके बच्चों को बाहरी बताकर प्रताड़ित किया जाता है, तो उनका भविष्य अंधकारमय लगने लगता है.

संपत्ति पर अधिकार और पहचान का संकट

पिता की मौत के बाद इन मोल की बहुओं के बच्चों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा लेने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ता है। झारखंड की रहने वाली मीनू (नाम परिवर्तित), जो अकेले अपने दो बच्चों को पाल रही हैं, बताती हैं कि उनकी सास ने उन्हें ज़मीन का हिस्सा देने से साफ मना कर दिया, जबकि उनके बच्चों का हक भी स्थानीय बहुओं के बच्चों के बराबर ही है.

अगली पीढ़ी की शादी में रुकावट

लिंगानुपात की कमी के कारण बाहरी राज्यों से आई दुल्हनों की बेटियों की शादी तो किसी तरह स्थानीय परिवारों में हो जाती है, लेकिन बेटों के लिए दुल्हन ढूंढना बेहद मुश्किल हो जाता है. कोई भी स्थानीय परिवार अपनी बेटी की शादी ऐसे घर में नहीं करना चाहता जिनकी मां को ‘बाहरी’ माना जाता है. इस समस्या से निपटने के लिए कई परिवार ‘अट्टा-सट्टा’ (आटा-साटा) प्रथा का सहारा लेते हैं, जिसमें एक परिवार अपनी बेटी को जिस घर में ब्याहता है, उस परिवार की बेटी को वह अपने घर की बहू बना कर लाता है.

जिंद और महेंद्रगढ़ में की गई इस स्टडी से साफ है कि हरियाणा के बिगड़े हुए लिंगानुपात का सबसे भारी और दर्दनाक कीमत अब ‘प्रवासी दुल्हनों’ की अगली पीढ़ी को चुकानी पड़ रही है, जो पूरी तरह से हरियाणवी होने के बाद भी सामाजिक सम्मान के लिए तरस रहे हैं.

मोल की बहुओं के बच्चे होते हैं इंटेलीजेंट

• दो अलग-अलग राज्यों या जातियों के माता-पिता से जन्मे बच्चे कई मायनों में बहुत तेज दिमाग होते हैं.
साइंटफिक और प्रैक्टिकल दोनों नजरिए से देखा जाए, तो ऐसे संकर बच्चे, स्थानीय या एक ही भौगोलिक, समाजिक सीमाओं में रहने वाले बच्चों की तुलना में अधिक जानकारी रखने वाले और वर्सटाइल होते हैं.

• साइंस के अनुसार, जब दो पूरी तरह से अलग-अलग भौगोलिक प्रदेशों या जींस के लोगों की शादी होती है, तो उनके बच्चों को ‘हाइब्रिड विगर’ यानी संकर शक्ति का फायदा मिलता है. यहां हाइब्रिड विगर (संकर शक्ति) का मतलब यह है कि अलग-अलग जेनेटिक बैकग्राउंड वाले पुरुष और महिला की संतान सामान्य संतान की तुलना में अधिक हेल्दी होते हैं और इनमें बीमारियों से लड़ने की बेहतर शक्ति होती है.

• कई रिसर्च यह भी साबित करते हैं कि जेनेटिकल डाइवर्स पेरेंट्स के बच्चे अक्सर शारीरिक अपने बौडी फीचर्स और इंटेलीजेंस के मामले में भी बेहतर होते हैं. यह एक से अधिक लैंग्वेज की जानकारी रखते हैं.अपनी मां के क्षेत्र की भाषा और अपने पिता के क्षेत्र की भाषा को सुनते समझते हुए बड़े होने का फायदा मिलता है.

• न्यूरोसाइंस के अनुसार, जो बच्चे बचपन से एक से अधिक भाषाएं बोलते हैं, उनका दिमाग कोग्नेटिव फैल्क्सिबल होता है। वे समस्याओं को सुलझाने और नई चीजें सीखने में दूसरों से आगे रहते हैं.

• ये बच्चे किसी एक दायरे में सिमटकर नहीं रहते. वे दो अलग-अलग राज्यों के त्योहारों, खान-पान, रीति-रिवाजों और कला को करीब से देखते हैं. इससे उनका व्यक्तित्व बहुत क्रिएटिव बनता है. बचपन से ही डाईवर्सिटि को देखने के कारण इन बच्चों में दूसरों के प्रति एक्सेप्टबिलिटि और सम्मान की भावना अधिक होती है. वे रूढ़िवादी सोच से दूर रहते हैं और नए विचारों का स्वागत करने वाले होते हैं.

• ऐसे बच्चों का ननिहाल एक राज्य में होता है और ददिहाल दूसरे राज्य में. अलग-अलग माहौल और शहरों में आने-जाने के कारण वे किसी भी नए वातावरण, नए लोगों या नई परिस्थितियों में बहुत जल्दी और आसानी से ढल जाते हैं.

• आज वर्ल्ड ग्लोबल विलेज बन चुका है, ऐसे में कंपनियों और बड़े संस्थानों को ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो अलग अलग कल्चर्स के लोगों के साथ काम कर सकें. ये बच्चे स्वभाव से ही ‘ग्लोबल’ सोच वाले होते हैं. दो अलग-अलग संस्कृतियों या जातियों के बीच पलने के कारण ये बच्चे समाज के विभिन्न दृष्टिकोणों को बहुत कम उम्र में समझने लगते हैं. वे दूसरों के दर्द, संघर्ष और भावनाओं को बेहतर तरीके से महसूस कर सकते हैं, जिससे उनका इमोशनल कोशेंट बहुत मजबूत होता है. .

• ऐसे बच्चों का सामाजिक दायरा बहुत बड़ा होता है। उनके पास दो अलग-अलग राज्यों या समुदायों के रिश्तेदारों और दोस्तों का साथ होता है। यह विविधता भविष्य में करियर, बिजनेस या नौकरियों के मामले में उनके लिए एक बेहतरीन नेटवर्किंग टूल साबित होती है.

• समाज चाहे जो भी कहे, लेकिन नेचर और विज्ञान का नियम यही है कि ‘विविधता ही ताकत है’ . दो अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आने वाले बच्चे मेंटली अधिक मैच्योर और फिजिकली अधिक स्ट्रान्ग होते हैं. आज के जमाने के हिसाब से हर मायने में ‘सुपर-चाइल्ड’ होते हैं.

“भले ही समाज की छोटी सोच इस बदलाव को तुरंत न माने, पर सच तो यही है कि दो अलग-अलग बैकग्राउंड से आने वाले बच्चे दिमागी, शारीरिक और सामाजिक तौर पर सामान्य से कहीं ज्यादा मजबूत और समझदार होते हैं. वे आज की इस नई दुनिया के हर चैलेंज के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं.” Mol Ki Bahu

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