Work From Home: वर्क फ्रौम होम व्यवस्था महामारी के समय एक आवश्यकता थी. कोविड 19 के दौरान इस ने अर्थव्यवस्था और संस्थानों को चलाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यदि उस समय लाखों कर्मचारी घर से काम न करते, तो अनेक सरकारी और निजी संस्थान पूरी तरह ठप हो सकते थे. लेकिन जो व्यवस्था आपातकालीन परिस्थितियों में उपयोगी साबित हुई, वह हर परिस्थिति में सर्वोत्तम हो, यह जरूरी नहीं है.
कोविड 19 का दौर शायद ही कोई भूल सकता है. एक अनजान से वायरस ने आ कर न केवल भारत को बल्कि पूरी दुनिया को थमने के लिए मजबूर कर दिया था. इस महामारी ने लोगों को घरों में कैद कर दिया था. बच्चों को उन के स्कूल और खेल के मैदान से जुदा कर दिया था. क्योंकि इस वायरस से अगर जान बचानी थी तो शर्त यह थी कि घर के बाहर कदम नहीं रखना है. लेकिन सर्वाइवल के लिए लोगों का काम करना भी जरूरी था. ऐसे में कंपनियों ने ऐसा तरीका ढूंढा, जिस से उन का बिजनैस भी ठप न हो और कर्मचारियों की नौकरी भी बची रहे.
उस समय कंपनीज वर्क फ्रौम होम की सुविधा ले कर आईं. लोगों को घर बैठे नौकरी करने का मौका मिला. स्कूलों ने बच्चों को औनलाइन शिक्षा देनी शुरू की. 2 साल बाद जब सब कुछ पहले की तरह सामान्य हो गया तो दफ्तर, फैक्ट्रियां, स्कूल सब खुल गए. तमाम लोग कोविड से पहली वाली अपनी रूटीन में आ गए. मगर फिर भी बहुतेरे लोग दफ्तरों को नहीं लौटे. महामारी के दिनों में लोगों की जिंदगी में आया वर्क फ्रौम होम उस के बाद भी लाखों लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना रहा.
बहुतेरे लोग आज भी वर्क फ्रौम होम के औप्शन को ही अपनाए हुए हैं. उन का कहना है कि औफिस आनेजाने की झंझट न होने से समय बचता है और काम में फ्लैक्सिबिलिटी भी मिलती है. घर पर रह कर अपनी सुविधानुसार जब भी समय हो, काम पूरा कर लेते हैं, जबकि औफिस में काम के घंटे निश्चित होते हैं और अगर घर आ कर औफिस की फाइल खोलो तो बीवीबच्चे चिढ़ जाते हैं कि दिन भर तो औफिस में रहते हो और घर को भी औफिस बना देते हो. वर्क फ्रौम होम होने से बीवीबच्चों को भी समय दिया जा सकता है और औफिस के काम के लिए भी अधिक घंटे मिल जाते हैं.
यही वजह है कि आज भी बहुत से लोग घर से काम करने का औप्शन छोड़ना नहीं चाहते हैं. यहां तक कि लोग इस सुविधा के लिए अपनी सैलरी में भी थोड़ा बहुत कंप्रोमाइज करने के लिए तैयार हैं. मगर वर्क फ्रौम होम ने कुछ लोगों के लिए और उन के परिवारजनों के लिए भी बड़ी असुविधाएं पैदा कर दी हैं.
आजाद नगर दिल्ली में रहने वाली शालिनी सिन्हा कहती हैं, ”जब ये औफिस जाते थे और बच्चे स्कूल चले जाते थे तो खाना वगैरह बनाने के बाद मेरे पास काफी समय बचता था. मैं अपनी सहेलियों को घर बुलाती थी. हम गपशप करते थे. मेरी ब्यूटिशन भी घर आ कर मेरा फेशियल, मैनीक्योर, पेडीक्योर वगैरह कर देती थी. दिन के समय मैं अपनी पड़ोसन के साथ शौपिंग आदि भी कर आती थी. मगर जब से मेरे पति ने वर्क फ्रौम होम लिया है, मेरी जिंदगी दूभर हो गई है. दिन भर ये घर पर होते हैं तो न तो मैं अपनी सहेलियों को बुला सकती हूं और न ब्यूटिशन को. ड्राइंग रूम के सोफे पर ये दिन भर अपने लैपटौप के साथ पसरे रहते हैं.
और हर दो घंटे पर चायकौफी की फरमाइश अलग झाड़ते हैं. दोपहर का खाना भी गर्मगर्म चाहिए. पहले सुबह का पैक कर के दिया खाना दोपहर में औफिस में ठंडा खाने में कोई तकलीफ नहीं थी. अब बिलकुल चूल्हे से उतरा हुआ चाहिए. फिर ये दिन भर जब घर में रहते हैं तो आएदिन इन के दोस्त भी भरी दोपहरी में यहीं डेरा डालने चले आते हैं. उन की आवभगत करते रहो. मेरी तो जिंदगी नर्क हो गई है. मैं कहती हूं मर्दों को दिन के समय तो बाहर ही रहना चाहिए ताकि औरतों को कुछ समय अपने लिए भी मिले.”
मोहम्मद असद 9वीं का छात्र है. उस के पिता मोहम्मद शहजाद सौफ्टवेयर डैवलपिंग कंपनी में कार्यरत हैं. उन्होंने भी कोविड के समय जो वर्क फ्रौम होम शुरू किया तो वह आजतक चल रहा है. इस की वजह से असद काफी तनाव में रहने लगा है. उस के पिता हर समय उस को पढ़ने के लिए डांटते रहते हैं. वह न तो टीवी के अपने प्रोग्राम देख सकता है और न ही स्कूल के बाद अपने दोस्तों के घर जा पाता है. स्कूल से घर लौटने में जरा सी देर हुई नहीं कि शहजाद अपनी पत्नी को ही डांटना शुरू कर देते हैं – ”तुम ने ही बिगाड़ रखा है लड़के को. पता नहीं कहांकहां किस के किस के साथ घूमता रहता है.” मां का मुरझाया चेहरा असद को परेशान करता है. वह चाहता है कि उस के पिता पहले की तरह सुबह औफिस जाएं और देर शाम ही घर लौटें, ताकि उसे और उस की मां को कुछ समय आजादी का अहसास हो.
दिल्ली के साकेत में 2 कमरों के मकान में रहने वाले मनोज के परिवार को भी मनोज के वर्क फ्रौम होम से बड़ी शिकायत है. मनोज के छोटे भाई संतोष की शिकायत है कि भैया ने एक कमरे को अपना औफिस बना रखा है. घर में पांच सदस्य हैं. भैया, भाभी, मां, भतीजा और मैं. ऐसे में बाकी के चारों लोग पिछले 7 साल से एक ही कमरे में एडजस्ट कर रहे हैं. भैया जब औनलाइन मीटिंग में होते हैं तो बाकी लोग तेज स्वर में बात भी नहीं कर सकते. उस कमरे में जा भी नहीं सकते. मैं अपने दोस्तों को नहीं बुला सकता. कोई रिश्तेदार अचानक आ जाए तो बैठाने की जगह नहीं होती है.
यह परेशानियां तो वर्क फ्रौम होम लेने वाले कर्मचारियों के परिजनों की हैं, मगर खुद उन कर्मचारियों की सेहत को इस व्यवस्था से कितना नुकसान हो रहा है, एक नई रिसर्च में यह खुलासा चौंकाने वाला है. जर्नल साइंस में पब्लिश हुई एक नई रिसर्च के मुताबिक, घर से काम करने वाले लोगों में अकेलापन 58% तक बढ़ गया है, जिस से वे डिप्रैशन, एंग्जायटी और मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं. उन की सामाजिक गतिविधियां भी कम हो रही हैं और वे पहले की तुलना में ज्यादा अलगथलग महसूस कर रहे हैं.
उन का सैल्फ कान्फिडैंस घट रहा है. नए कपड़े खरीदने का शौक, नए गैजेट्स लेने की चाह और पार्लर व सैलोन जा कर खुद को सुंदर दिखाने की ख्वाहिश बहुत घट गई है. जब सारा दिन घर में ही पड़े रहना है तो नए कपड़ों की जरूरत ही क्या है? खुद को सजाने संवारने की इच्छा तो तब होती है जब आप घर से बाहर निकलते हैं, लोगों से मिलते हैं, औफिस में लंबा समय बिताते हैं. इस से लोगों का काफी पैसा तो बच रहा है मगर इस से बाजार को भी बड़ा नुकसान हो रहा है.
न्यूयौर्क फेडरल रिजर्व बैंक की इकोनौमिस्ट नतालिया इमैनुएल और उन की टीम द्वारा की गई रिसर्च के मुताबिक लोग घर से काम करने की फैसिलिटी पाने के लिए अपनी कमाई का 4% से 10% तक हिस्सा छोड़ने को भी तैयार रहते हैं. इस से साफ है कि वर्क फ्रौम होम की मांग लोगों के बीच बहुत ज्यादा है. मगर रिसर्च में ये बात सामने आई है कि घर से काम करने वाले लोग काम करने के दौरान ज्यादा समय अकेले बिताते हैं, साइकेट्रिस्ट के पास ज्यादा जाते हैं और अपनी मानसिक स्थिति को नकारात्मक तरीके से आंकते हैं.
‘यूनिवर्सिटी औफ शिकागो’ के ‘बूथ स्कूल औफ बिजनेस’ में बिहेवियरल साइंस के प्रोफेसर निकोलस एप्ली का कहना है कि लोग वर्क फ्रौम होम चुन कर शायद अपने ही हित के खिलाफ फैसला ले रहे हैं. उन के मुताबिक, लोगों को रोज का ट्रैफिक, लंबा सफर और औफिस पहुंचने की परेशानी तो साफ दिखाई देती है, लेकिन वो ये नहीं समझ पाते कि रोजाना औफिस जाना, लोगों से मिलनाजुलना भविष्य में उन के मानसिक स्वास्थ्य को कितना प्रभावित कर सकता है. एप्ली का कहना है कि इंसान अक्सर दूसरों से जुड़ने और बातचीत करने के फायदे को कम आंकता है.
स्टडी में ये भी पाया गया कि वर्क फ्रौम होम करने वाले लोगों में चिंता और डिप्रैशन के लक्षण ज्यादा दिखाई दे रहे हैं. इस के साथ ही साइकैट्रिस्ट के पास जाने वाले लोगों की संख्या काफी बढ़ गई है. मनोरोग संबंधी दवाओं का इस्तेमाल भी बहुत बढ़ गया है. ऐसे में ज्यादातर लोग इमोशनल रूप से बहुत स्ट्रैस में रहने लगे हैं. अकेलापन और लोगों से कम मिलनेजुलने के कारण मानसिक और शारीरिक हैल्थ दोनों को नुकसान पहुंच रहा है. अकेले रहने की वजह से इम्यून सिस्टम कमजोर हो रहा है, दिल और नर्वस सिस्टम के काम करने की क्षमता पर भी असर पड़ रहा है, तनाव और उदासी भी बढ़ रही है. स्टडी में ये भी पाया गया है कि खुशहाल और संतुष्ट जीवन का सब से बड़ा आधार अच्छे सामाजिक रिश्ते होते हैं. इंसानों के लिए मिलनाजुलना और अपनापन महसूस करना बहुत जरूरी है. अगर ये जरूरत पूरी न हो तो लोग मानसिक रूप से परेशान होने लगते हैं.
बाहरी देशों में बहुतेरे लोग जो वर्क फ्रौम होम कर रहे हैं, खुद को फिट रखने के लिए लोगों से कनेक्शन बनाए रखते हैं. वे रोज कुछ समय के लिए घर से बाहर निकलते हैं, पार्क में टहलने जाते हैं, लोगों से बातचीत करते हैं, अपने पड़ोसियों से मिलतेजुलते हैं या स्पोर्ट्स अथवा ऐसे शौक अपनाते हैं जिन से दूसरे लोगों से मुलाकात होती रहे. कुछ लोग पुस्तक क्लब, संगीत समूह, योग कक्षाओं, साइकलिंग क्लब या स्वयंसेवी संगठनों से भी जुड़ते हैं ताकि सामाजिक संपर्क बना रहे.
दरअसल, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. उस का मानसिक संतुलन केवल भोजन, आवास और आर्थिक सुरक्षा से ही नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों, संवाद और अपनत्व की भावना से भी जुड़ा होता है. जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक घर के भीतर रह कर काम करता है और उस के सहकर्मियों, मित्रों या समाज के अन्य लोगों से प्रत्यक्ष संपर्क कम हो जाता है, तो धीरेधीरे उस के जीवन में सामाजिक अलगाव बढ़ने लगता है. वीडियो कौल और औनलाइन मीटिंग्स कामकाज की जरूरतें तो पूरी कर सकती हैं, लेकिन वे आमनेसामने की बातचीत, भावनात्मक जुड़ाव और मानवीय स्पर्श का पूरी तरह विकल्प नहीं बन सकती हैं.
खुशहाल और संतुष्ट जीवन का सब से महत्वपूर्ण आधार अच्छे सामाजिक रिश्ते होते हैं. परिवार, मित्र, पड़ोसी और सहकर्मी हमारे जीवन में भावनात्मक सहारा प्रदान करते हैं. किसी से खुल कर बात कर पाना, अपनी परेशानियां साझा करना, हंसीमजाक करना और किसी समुदाय का हिस्सा महसूस करना मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है. इस के विपरीत, जब व्यक्ति खुद को अकेला और दूसरों से कटा हुआ महसूस करने लगता है, तो मानसिक तनाव बढ़ने की संभावना भी बढ़ जाती है.
वर्क फ्रौम होम महामारी के समय ठीक था. कोविड 19 के दौरान इस ने अर्थव्यवस्था और संस्थानों को चलाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यदि उस समय लाखों कर्मचारी घर से काम न करते, तो अनेक सरकारी और निजी संस्थान पूरी तरह ठप हो सकते थे. लेकिन जो व्यवस्था आपातकालीन परिस्थितियों में उपयोगी साबित हुई, वह हर परिस्थिति में सर्वोत्तम हो, यह जरूरी नहीं है. अब जबकि सामान्य परिस्थितियां लौट चुकी हैं, सरकारों और कंपनियों को कर्मचारियों को कार्यालयों में वापस लाने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए.
कई नियोक्ता यह तर्क देते हैं कि यदि कर्मचारी घर से बैठ कर पूरा काम कर रहा है तो उसे कार्यालय बुलाने का क्या औचित्य है? कार्यालय में कर्मचारियों के आने से बिजली, पानी, इंटरनेट, एयर कंडीशनिंग, हीटिंग, सफाई, सुरक्षा, कैंटीन और अन्य सुविधाओं पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है. कंपनियों की दृष्टि से यह एक सीधा आर्थिक लाभ है कि कर्मचारी घर से ही काम करें और उत्पादन या सेवा का स्तर भी बना रहे. मगर यह नजरिया ठीक नहीं है.
कार्यालय केवल काम करने की जगह नहीं होता, बल्कि वह सहयोग, संवाद और सामूहिक सीखने का केंद्र भी होता है. जब कर्मचारी एकदूसरे के साथ बैठ कर काम करते हैं तो विचारों का आदानप्रदान अधिक स्वाभाविक रूप से होता है. किसी समस्या का समाधान कई बार औपचारिक बैठकों में नहीं, बल्कि चाय की मेज, गलियारों या अनौपचारिक चर्चाओं के दौरान निकल आता है. घर से काम करने की व्यवस्था में यह स्वाभाविक मानवीय संपर्क काफी हद तक समाप्त हो जाता है.
इस के अलावा नए कर्मचारियों के प्रशिक्षण और पेशेवर विकास पर भी इस का असर पड़ता है. किसी अनुभवी सहकर्मी को काम करते हुए देखना, वरिष्ठ अधिकारियों से प्रत्यक्ष मार्गदर्शन प्राप्त करना और कार्यालय की कार्य संस्कृति को समझना, ये सभी चीजें औनलाइन माध्यम से संभव नहीं हैं. इस से संस्थानों में ज्ञान का हस्तांतरण धीमा पड़ सकता है और कर्मचारियों का अपनी संस्था से जुड़ाव कमजोर हो सकता है.
आर्थिक दृष्टि से भी व्यापक स्तर पर वर्क फ्रौम होम के कुछ नकारात्मक प्रभाव दिखाई देते हैं. जब लाखों लोग कार्यालय जाना कम कर देते हैं तो सार्वजनिक परिवहन, रेस्तरां, चाय की दुकानें, छोटे होटल, स्टेशनरी विक्रेता, टैक्सी चालक और कार्यालय परिसरों के आसपास के अनेक छोटे व्यवसाय प्रभावित होते हैं. शहरों की आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा कार्यालय संस्कृति पर निर्भर करता है. इसलिए यह केवल कंपनी और कर्मचारी का मामला नहीं है, बल्कि शहरी अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है.
निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि वर्क फ्रौम होम का कोई स्थान नहीं होना चाहिए. कई क्षेत्रों में हाइब्रिड मौडल अर्थात कुछ दिन कार्यालय और कुछ दिन घर से काम, एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है. लेकिन यदि केवल खर्च बचाने के उद्देश्य से कर्मचारियों को स्थायी रूप से घर से काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, तो यह संस्थागत संस्कृति, कर्मचारी विकास, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक संपर्क जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी होगी, जो भविष्य में कई खतरों को जन्म देगी.





