Social Stories: आज सोशल मीडिया दलित आवाजों के लिए एक बड़ा मंच बन चुका है. इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स जैसे प्लेटफौर्म्स पर कई दलित पेज लगातार जातिआधारित भेदभाव, हिंसा, इतिहास और अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं. m@dalitfeminist, @dalitfeminismarchive, @dalitcamera, @dalitdesk, @Ba_Bhima जैसे पेज जाति और जैंडर के इंटरसैक्शन, बाबासाहेब अंबेडकर के विचार, दलित महिलाओं की कहानियां, न्यूज अपडेट, ग्राफिक्स, कोट्स और अवेयरनैस पोस्ट शेयर करते हैं. ये पेज उस तबके की बात रखते हैं जिसे मेनस्ट्रीम मीडिया अकसर नजरअंदाज करता रहा है.

सच यह भी है कि इंटरनैट पर इन पेजों को उतना खुला भेदभाव नहीं  झेलना पड़ता जितना दलित समुदाय को रोजमर्रा की जिंदगी में  झेलना पड़ता है क्योंकि इन्हें फौलो करने वाले लोग भी इसी समुदाय के होते हैं और अगर कोई मजाक उड़ाने या कोई टिप्पणी करने की कोशिश करता है तो उसे कमैंट सैक्शन में ही धो दिया जाता है. इस के अलावा, औनलाइन स्पेस एक तरह की सुरक्षा देता है. यहां आवाज दबाना आसान नहीं होता. पोस्ट वायरल हो सकती है, समर्थन मिल सकता है. यही वजह है कि सोशल मीडिया पर कैंपेन, ट्रैंड और डिजिटल प्रोटैस्ट तेजी से होने लग जाते हैं.

लेकिन सवाल यह है, क्या केवल सोशल मीडिया पर एक्टिव होना ही काफी है?

क्या पोस्ट शेयर करना, स्टोरी लगाना और हैशटैग चलाना जमीनी सच्चाइयों को बदल देता है?

इन पेजों का काम महत्त्वपूर्ण है. ये शिक्षा का काम करते हैं. लोगों को बताते हैं कि हम कोई नीच लोग नहीं हैं, हम भी समाज का अहम हिस्सा हैं. जानें कि अपने पेज के माध्यम से ये क्या बताते हैं-

दलित डैस्क

दलित डैस्क एक मीडिया प्लेटफौर्म है. दलित डैस्क अपने बारे में बताता है कि वह समाज की मार्जिनलाइज्ड कम्यूनिटी की आवाज उठाता है, खासकर, दलित कम्यूनिटी जिसे अतीत में हजारों साल दबाया गया और यह कृत्य आज भी जारी है.mदलित डैस्क का मानना है कि हर कहानी सुनी जानी चाहिए, हर किसी को सुना जाना चाहिए. दलित डैस्क अपने काम को मिशन मान कर चलता है. उस का मिशन हाशिए पर मौजूद लोगों की आवाज को बढ़ाना, रूढि़यों को चुनौती देना है.

दलित डैस्क अपनी वैबसाइट चलाता है, जिस में दलितों से जुड़ी राजनीतिक व सामाजिक रिपोर्ट डाली जाती हैं. इस के अलावा इंस्टाग्राम पेज है जहां वह खुद को इंट्रोड्यूस करता है- ‘अनसुनी आवाजों के लिए तेज, हाशिए से मुख्यधारा तक.’

दलित हिस्ट्री

दलित हिस्ट्री एक तरह का कल्चरल ग्रुप है. इस का मुख्य फोकस दलितों के उस इतिहास पर है जिसे छुआ नहीं गया. अपने डिस्क्रिप्शन में दलित हिस्ट्री कहती है, ‘‘हजारों वर्षों तक दलित, बहुजन और आदिवासी समुदायों को अपना इतिहास व साहित्य रखने से दूर रखा गया.

‘‘दलित समुदाय ने अब अपनी हिस्ट्री और कल्चर के बारे में अधिक बात करना शुरू किया है. टैक्स्ट हिस्ट्री की कमी के कारण दलितों के इतिहास और संस्कृति किन्हीं खास और ताकतवर लोगों द्वारा बदल दिए गए ताकि दलितों को समाज के सब से निचले स्तर पर रखा जा सके.’’ दलित हिस्ट्री ग्रुप बताता है कि वह इतिहास में समुदाय से संबंधित अच्छी तरह से रिसर्च बेस्ड फैक्ट्स देता है.

दलित क्वीर प्रोजैक्ट

यह दलित क्वीर के इशू को ले कर बनाया गया गु्रप पेज है. इस पेज को बनाने वाले आरोह अंकुठ हैं. आरोह प्रोफैशन से आर्टिस्ट हैं. दलित क्वीर प्रोजैक्ट के इंस्टा पेज पर फिलहाल 101 पोस्ट किए गए हैं. इस के 8 हजार से ज्यादा फौलोअर्स हैं जिन में वर्कशौप, कास्ट एंड मीडिया पर बातचीत, पोएट्री सर्कल और इवैंट्स की डिटेल्स शेयर की गई हैं. अपने इंस्टा प्रोफाइल में दलित क्वीर प्रोजैक्ट कहता है कि वह हैट्रो नौर्म्स को तोड़ रहा है और यह पेज एक कोलैबोरेशन स्पेस है जहां दलित और क्वीर की बात होती है.

इस के अलावा @dalitfeminist जैसे पेज यह दिखाते हैं कि दलित महिलाओं का संघर्ष दोहरा होता है- जाति का भी और जैंडर का भी. @dalitcamera दलित मुद्दों को डौक्यूमैंट करते हैं, न्यूज और घटनाओं को सरल भाषा में सामने लाते हैं. @Ba Bhima जैसे पेज ग्राफिक्स और छोटे कंटैंट के जरिए युवाओं को जोड़ते हैं.

लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब एक्टिविज्म सिर्फ स्क्रीन तक सिमट कर रह जाता है. सोशल मीडिया पर गुस्सा, दुख और विरोध दिखता है लेकिन वही ऊर्जा अगर रियल लाइफ में न उतरे तो कोई फायदा नहीं.

ग्राउंड रिऐलिटी में दलित आज भी स्कूलों, नौकरियों, किराए के मकानों, शादीब्याह और मंदिरपानी जैसे मुद्दों पर भेदभाव  झेलते हैं. यहां लाइक और कमैंट काम नहीं आते. यहां कानूनी मदद, स्थानीय सपोर्ट, संगठित आवाज और लगातार मौजूदगी चाहिए.

केवल औनलाइन प्रोटैस्ट का एक खतरा यह भी है कि वह कम्फर्ट जोन एक्टिविज्म बन जाता है. पोस्ट डाली, गुस्सा निकाला, ट्रैंड चलाया और फिर सब नौर्मल. इस का मतलब यह नहीं कि सोशल मीडिया बेकार है, बल्कि सोशल मीडिया एक शुरुआत है, मंजिल नहीं.

इन दलित पेजों की ताकत तब कई गुना बढ़ सकती है जब वे जमीनी आंदोलनों से जुड़ें, लोकल स्तर पर मीट-अप, चर्चा और लीगल अवेयरनैस को बढ़ावा दें. सिर्फ घटनाओं पर पोस्ट न करें, बल्कि समाधान और ऐक्शन की दिशा भी कुछ करें. स्क्रीन पर लिखी बात अगर सड़क, स्कूल, दफ्तर और कोर्ट तक न पहुंचे तो वह सिर्फ कंटैंट बन कर रह जाती है.  \Social Stories

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