Sydney Terror Attack : सिडनी में यहूदियों पर हुआ आतंकी हमला हमें एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम धर्म को इंसानियत से ऊपर रख रहे हैं? अगर ऐसा नहीं, तो हार हमारी है, चाहे पीड़ित कोई भी समुदाय क्यों न हो.

ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में बोंडी बीच पर हुए आतंकी हमले में 16 लोगों की मौत हुई है और 40 से ज्यादा लोग घायल हैं. यह हमला उस वक्त हुआ जब वहां यहूदी समुदाय का “हनुक्का” त्योहार मनाया जा रहा था. हनुक्का एक पारंपरिक यहूदी प्रकाश उत्सव है. जिसे बोंडी बीच पर “हनुका बाय द सी” नाम से मनाया जा रहा था. तभी यहां दो या शायद तीन हमलावरों ने आम लोगों पर गोलीबारी करनी शुरू कर दी. महिलाएं, बूढ़े, जवान और मासूम बच्चे उन की गोलियों का शिकार हो कर मौत की गोद में सो गए. हमला करने वाले दो आतंकी जिनमें से एक मारा गया और दूसरा घायल अवस्था में कस्टडी में है, आपस में बाप-बेटे थे.

साजिद (50 साल) और नवीद अकरम (24 साल) दोनों पाकिस्तानी मूल के थे और लम्बे समय से आस्ट्रेलिया में रह रहे थे. दोनों के पास ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता थी. एक आतंकी जो भागने में सफल हुआ उसके बारे में अभी कोई खबर नहीं है. ऑस्ट्रेलियाई पुलिस के मुताबिक साजिद के पास 6 बंदूकों के वैध लाइसेंस थे. ये सभी हथियार वह साथ ले कर आया था.

गौरतलब है कि पिछले कई महीने से ऑस्ट्रेलिया के यहूदी समुदाय के लोग यह शिकायत कर रहे थे कि वहां यहूदी-विरोधी घटनाएं तेज़ी से बढ़ रही हैं. इजरायल पर हमास के हमले के बाद से ही आस्ट्रेलिया में यहूदियों को अपने लिए खतरे का अहसास होना शुरू हो गया था. बीते एक साल में ऑस्ट्रेलिया में 1,600 से ज्यादा यहूदी-विरोधी घटनाएं दर्ज हुई हैं, जिनमें दर्जनों हमले और तोड़फोड़ की घटनाएं और सैकड़ों अपमानजनक या धमकी भरे मामले शामिल हैं.

7 अक्तूबर 2023 को इजराइल पर हमास के हमले के बाद जिस तरह निर्दोष फिलिस्तीनियों का खात्मा करने की नीयत से इजरायल सरकार ने फिलिस्तीन में खून की नदियां बहाईं, उस से अनेक देशों में यहूदियों के खिलाफ हमले, तोड़फोड़ और डरानेधमकाने जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. आस्ट्रेलिया में तो ऐसी घटनाएं तीन गुना बढ़ी हैं. पिछले साल सिडनी और मेलबर्न में यहूदियों के खिलाफ हमलों ने देश को हिला दिया था. इन शहरों में आस्ट्रेलिया की 85 फीसदी यहूदी आबादी रहती है. आम यहूदी नागरिकों पर इन हमलों ने ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक और क़ानून-प्रधान देश को झकझोर दिया है. ये घटनाएं किसी एक समुदाय के विरुद्ध अपराध भर नहीं हैं, बल्कि यह इंसानियत और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा आघात हैं. सवाल यह भी है कि आखिर यहूदियों के प्रति इतनी नफरत क्यों है? और इस के लिए खुद यहूदी किसी हद तक ज़िम्मेदार हैं?

यहूदियों के ख़िलाफ़ नफ़रत कोई नई परिघटना नहीं है. यूरोप में मध्ययुग से ले कर आधुनिक काल तक यहूदियों को कभी “ईसा-विरोधी”, कभी “सूदख़ोर”, तो कभी “षड्यंत्रकारी” बताकर निशाना बनाया गया. प्लेग जैसी महामारियों से ले कर आर्थिक संकटों तक, हर असहजता का दोष यहूदियों पर मढ़ दिया गया. इस ऐतिहासिक अन्याय की चरम परिणति नाजी जर्मनी का होलोकास्ट था, जिसमें साठ लाख से अधिक यहूदियों की हत्या हुई. और इस सब के पीछे हर धर्म की संकीर्ण सोच जिम्मेदार है.

आज के दौर में यह नफ़रत नए रूप में सामने आती है. इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष, विशेष कर गाजा में होने वाली हिंसा ने दुनिया भर में भावनाएं भड़काई हैं. इजराइल सरकार की नीतियों के प्रति रोष कई जगहों पर यहूदियों के खिलाफ नफरत में बदल गया है, जबकि इजरायल की सरकार और दुनिया भर के यहूदी एक नहीं हैं. सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को और तेज किया है तो वहीं आधे-अधूरे वीडियो, भड़काऊ पोस्ट बिना किसी संदर्भ के फैलते रहते हैं. नतीजा यह कि कट्टरपंथी समूह, चाहे वे अति दक्षिणपंथी हों या धार्मिक उग्रवादी, इस माहौल का लाभ उठा कर यहूदियों को सामूहिक अपराधी के रूप में चित्रित करते हैं और अपने धर्म के ‘असुरी ज्ञान’ के प्रकाश में खून की होली खेलते हैं.

सिडनी की घटना यह उजागर करती है कि आधुनिक समाजों में धार्मिक पहचान को ले कर असहिष्णुता किस हद तक बढ़ चुकी है. सोशल मीडिया और उग्र राजनीतिक भाषणों ने नफरत को वैधता दी है. धार्मिक अफवाहों, आधे-अधूरे सच और षड्यंत्र सिद्धांत ने कम समझदार लोगों के मन में, जो संख्या में कहीं अधिक हैं, डर और गुस्सा भर दिया है, जो अंततः हिंसा के रूप में सामने आता है. सिडनी जैसे बहुसांस्कृतिक और शांत माने जाने वाले शहर में यहूदियों को निशाना बना कर किया गया आतंकी हमला पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है. ये बेहद खतरनाक है कि एक पिता इस्लामिक जिहाद के नाम पर अपने 24 साल के बेटे के साथ आतंकी हमला करने निकलता है. बोंडी बीच की तस्वीरें हमें इसी साल 22 अप्रैल को भारत में हुए पहलगाम आतंकी हमले की याद दिलाती हैं. उस हमले में भी आतंकियों ने धर्म पूछकर हिंदुओं को बेरहमी से मारा था. भारत के भीतरी क्षेत्रों में धर्म पूछ कर होने वाली मुसलमानों की मॉब लिंचिंग भी धर्म की ‘असुरी शक्तियों’ का तांडव है.

आतंकवाद का इतिहास बताता है कि उस का कोई एक धर्म नहीं है, बल्कि वह सभी धर्मों में निवास करता है. वह कभी इसलाम के नाम पर सामने आता है, कभी ईसाई पहचान के साथ, कभी यहूदी विरोध के रूप में और कभी किसी और धार्मिक या वैचारिक आवरण में. सिडनी की घटना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है, जहां यहूदियों को केवल उन की धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया. यह नफ़रत किसी एक देश या समाज तक सीमित नहीं है; यह वैश्विक स्तर पर फैलती  बीमारी है, जो असुरक्षा, डर और अफवाहों के सहारे पनपती है.

हालांकि दुनिया भर के यहूदी न तो एक जैसी राजनीति रखते हैं, न एक जैसे विचार. आस्ट्रेलिया, अमेरिका या भारत में रहने वाला आम यहूदी नागरिक न गाजा पर बम गिराता है, न वैश्विक नीतियों तय करता है. हां, परन्तु यह भी सच है कि कुछ यहूदी संगठन या प्रभावशाली लौबी समूह, विशेष कर पश्चिमी देशों में, इजराइली सरकार की हर कार्रवाई का बिना शर्त बचाव करते दिखाई देते हैं. इस से आलोचना और नफरत के बीच की रेखा धुंधली होती है. आलोचना का जवाब संवाद से दिया जाना चाहिए, दमन से नहीं. और कुछ संगठनों या व्यक्तियों के रुख़ के कारण पूरे यहूदी समाज को निशाने पर लेना सरासर अन्याय है.

यहूदियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा सिर्फ यहूदियों की समस्या नहीं है. इतिहास गवाह है कि नफरत की आग एक बार भड़की तो वह किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती है. आज यहूदी निशाने पर हैं, कल कोई और हो सकता है. लोकतंत्र की परीक्षा यहीं होती है कि वह अल्पसंख्यकों को कितना सुरक्षित रख पाता है.

सिडनी में यहूदियों पर हुआ आतंकी हमला हमें एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम धर्म को इंसानियत से ऊपर रख रहे हैं. अगर ऐसा नहीं, तो हार हमारी है, चाहे पीड़ित कोई भी समुदाय क्यों न हो. आतंक का जवाब इंसानी मूल्यों की मज़बूत पुनर्स्थापना है. यही एकमात्र रास्ता है जिस से भविष्य में ऐसे हमलों की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है.

आस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह घटनाएं चेतावनी है कि बहुसंस्कृतिवाद सिर्फ़ नारा नहीं, रोजमर्रा की जिम्मेदारी है. कानून का सख्त पालन, घृणा अपराधों पर त्वरित कार्रवाई और शिक्षा के जरिये इतिहास की सही समझ पैदा करना ही सही रास्ता है. Sydney Terror Attack :

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