सरिता विशेष

निर्मल नदी सी सुलेखा चाची, जिन्हें न कोई तमन्ना थी न ही कोई आस, ने मिलीजुली मिट्टी के गीलेअधगीले लौंदे को आकार दे कर मूर्तरूप देने की कोशिश की. विजय के रूप में चाची को भी जीने का सहारा मिल गया था. लेकिन सहसा ऐसा क्या हो गया कि चाची को विजय से कड़वे शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा?

‘‘तुम्हारी भाषा में प्यार किसे कहते हैं? तुम इतने नासमझ तो नहीं हो जो तुम्हें समझ में ही न आए कि सामने वाला तुम से प्यार कर रहा है या नहीं. घर में पलता पालतू जानवर तक प्यारभरा हाथ पहचान जाता है और तुम्हें इंसान हो कर भी इस बात का पता नहीं चला. वाह, धन्य हो तुम और तुम्हारा फलसफा.’’

सुलेखा चाची का स्वर इतना तीखा और कानों को भेद जाने वाला होगा, मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. ‘‘तुम्हारा कोई दोष नहीं है, बेटा. मेरा ही दोष है जो तुम्हें अपना बच्चा समझ कर तुम पर अपनी ममता लुटाती रही. सोचती रही बिना मां के पले हो, लाख कमियां हो सकती हैं तुम में क्योंकि कुछ बातें बचपन से ही सिखाई जाती हैं जन्मघुट्टी में घोल कर. जन्मघुट्टी में तुम्हें मां का सम्मान करना पिलाया ही नहीं गया तो कैसे तुम आज मेरा सम्मान कर पाते.’’

‘‘बड़ी मां,’’ विजय कुछ कह पाता, अपनी सफाई में कुछ बोल पाता इस से पहले ही सुलेखा चाची ने उसे हाथ के इशारे से रोक दिया. स्तब्ध रह गया था मैं भी. सुलेखा चाची जिन के शांत स्वभाव का सिक्का हमारा सारा खानदान मानता है वही इस तरह कैसे और क्यों बोलने लगीं? अच्छा भला तो सब चल रहा है. सुलेखा चाची ने अपनी एक सहेली की अनाथ बच्ची सीमा से विजय का रिश्ता भी पक्का कर रखा है.

विजय के पिता मेरे चाचा थे और सुलेखा मेरी चाची. सुलेखा चाची विजय की जन्मदातृ नहीं हैं लेकिन विजय की बड़ी मां हैं, विजय के पिता की पहली पत्नी. चाचा शादी के बाद विदेश चले गए थे और लगभग 20 साल बाद हमेशा के लिए देश वापस लौटे थे. शांत सुलेखा चाची सामाजिक दायरे का सम्मान करतेकरते बंधी रहीं हमारे घर की दहलीज से.

चाचा 2-3 साल बाद आते. घर पर कुछ डौलरों की वर्षा करते, कुछ तरसी आंखों में जराजरा सी आस जगाते, एहसास जगा जाते कि वे जिंदा हैं अभी. हमारी दादी चाचा का इंतजार करतीकरती थक गईं. लगभग 20 साल, सालोंसाल चाचा का आनाजाना लगा रहा. चाची की गोद कभी नहीं भरी. घर में अकसर बात चलती, चाची के कोई औलाद ही होती तो चाचा को घर की तरफ खींचती.

मैं आज भी सोचता हूं कैसे चाचा को उस की औलाद अपनी ओर खींचती. जिस चाचा को उन की मां, उन की पत्नी न खींच पाईं उन्हें उन की औलाद कैसे खींच पाती. मैं सब से बड़ा था न घर में. बड़ों में मैं बच्चा था और बच्चों में मैं बड़ा. सब से कुछकुछ सुनता रहता था. मैं बीच का था न, सो सब की तरह सोच पाता था. चाचा जब आ कर जाते तब दादी और मां की नजरें बड़ी तमन्ना से देखतीं.

‘‘क्या पता इस बार तेरी गोद भर जाए. बस, वक्त का इंतजार कर.’’

चाची मुसकरा भर देती थीं. जैसे उन्हें ऐसी न कोई तमन्ना है और न आस ही. एक शांत सी, भीनीभीनी सी मुसकान. एक दर्प सा लगता मुझे उन के चेहरे पर, जैसे सब पर हंस रही हों. कह रही हों, क्या उम्रभर तुम्हारा ही चाहा होगा?

चाची पढ़ीलिखी हैं, स्थानीय कालेज में हिंदी की प्राध्यापिका हैं. बड़ी सुलझी और परिपक्व सी. चाची से मैं 10 साल छोटा हूं. फिर भी कभीकभी लगता था उन का हमउम्र हूं. उन के स्तर तक जा कर मैं तब भी सोच सकता था और आज भी सोच सकता हूं. तब भी मुझे समझ में आता था उन की जीत हो चुकी है. उन का चाहा ही होगा. शायद वे मां बनना चाहती ही नहीं थीं.

‘‘अच्छा है न, मैं अकेली जान. भूखी भी सो जाऊं तो किसी को पता नहीं चलेगा. बच्चा होगा तो किसकिस का मुंह देखूंगी. बच्चे को क्या नहीं चाहिए. क्या उसे पिता नहीं चाहिए? मेरी तरह लावारिस जिएगा क्या वह?’’

‘‘ऐसा क्यों सोचती है री, सुलेखा. बच्चे से तेरा भी तो मन लगेगा न.’’

‘‘यह सोमू है न बीजी. यह भी तो मेरा ही बच्चा है. मेरा मन इसी से लग जाता है.’’

चाची की बातों में एक बार ऐसा सुना था और उसी दिन से मैं ने चाची को छोटी मां कहना शुरू कर दिया था. मैं तब 22 साल का था. बीकौम का नतीजा आया था, पता नहीं क्यों सब से पहले चाची के पैर छू कर आशीर्वाद मांगा था.

‘‘आज से आप मेरी छोटी मां. आप का बच्चा हूं न मैं. आशीर्वाद दीजिए, छोटी मां.’’

तब एक प्यारीसी भावना जागी थी चाची की आंखों में. मैं चाची का अच्छा दोस्त तो पहले ही था तब वास्तव में उन की संतान भी बन गया था. चाची ने गले लगा कर जो मेरा माथा चूमा था वह भाव आज भी भूला नहीं हूं. मन ही मन ठान लिया था. पति के अभाव में भी जिस तरह चाची ने दहलीज का मान रखा है उसी तरह मैं भी पुत्र बन कर चाची की रक्षा करूंगा.

मेरी शादी हुई और अपनी पत्नी से भी मैं ने यही आश्वासन मांगा कि वह चाची को अपनी मां, अपनी सखी, अपनी मित्र मानेगी सदा और वैसा ही हुआ. मेरी पत्नी ने भी सदा चाची का मान रखा है. मैं अकसर सोचता हूं, रिश्ते निभाना इतना मुश्किल होता नहीं जितना हम उन्हें बना देते हैं. गरिमा और अनुशासन में रह कर भी जटिल रिश्ता निभाया जा सकता है बशर्ते उस में दोनों तरफ से समान मेहनत की जाए. इंसान शराफत की हद में रहे और अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न करे तो कोई भी संबंध आसान हो सकता है.

लगभग चाची और चाचा के विवाह के 20 साल बाद एक बार फिर चाचा के साथ एक नए रिश्ते का पदार्पण हमारी दहलीज पर हुआ था. काफी बीमार अवस्था में चाचा लौट आए थे और साथसाथ चला आया था उन का बेटा विजय. हमारा सारा परिवार हैरानपरेशान. बीजी ने बांहें खोल कर दोनों का स्वागत किया था. एक प्रश्नचिह्न था शेष सब के चेहरे पर. बस, एक चाची थीं जो तटस्थ थीं. न कोई खुशी, न कोई गम. खुशी भी मनातीं तो क्या सोच कर और दुखी भी होतीं तो क्यों. ऐसा क्या था जो उन्होंने खो दिया था और एक भी ऐसी कौन सी आशा थी जो अब इस उम्र में जागती.

बीमारी की हालत में ही रहे चाचा कुछ दिन. विजय सहमासहमा था शायद चाची से. पता चला 2 साल पहले चाचा ने विजय की मां को तलाक दे दिया था. वह बीमार थी, चाचा साथ रखना नहीं चाहते थे.

‘क्या? बीमार थी इसलिए चाचा ने तलाक दे दिया?’

अवाक् रह गया था मैं. 15-16 साल के बच्चे की मां को चाचा ने इसलिए तलाक दे दिया कि वह बीमार थी. तरस आया था मुझे उस औरत पर. दबेघुटे शब्दों में यह भी कानों में पड़ा कि वह चरित्रहीन भी थी. मैं हैरान था कि वह बीमार भी थी और चरित्रहीन भी. हाथ छोड़ना हो तो मनुष्य क्याक्या बहाने बना लेता है. और निभाना हो तो कोई सीमा ही नहीं. चाची बेचारी बिना साथ के ही निभाए जा रही हैं और चाचा ने हाथ छोड़ दिया क्योंकि वह बीमार थी. कैसा बेमेल रिश्ता है दो बेमेल इंसानों में. क्योंकि चाचा बीमार थे. कोई दयाभाव, कोई तरसभाव ही ले कर सब सेवा करते रहे और लगभग 2 महीने बाद चाचा भी चले गए उस पार. यह विजय रह गया था अकेला. चाची धीरेधीरे इस अनाथ बच्चे से प्यार करने लगीं. एक धोखेबाज पति की संतान से घुलनेमिलने लगी थीं. मां बन कर इसे सहेजने लगीं. भूल गई थीं वह सब. मात्र इंसान बन कर इंसान से प्यार करने लगी थीं.

‘लावारिस है न यह भी मेरी तरह. हम दोनों का प्यार और स्नेह का नहीं, मात्र दर्द का रिश्ता है. आज की तारीख में इस से बड़ा बदनसीब और कौन होगा, सोमू.’ समझ सकता था मैं. चाची को भी जीने का आसरा मिल गया था. मिलीजुली मिट्टी के गीलेअधगीले लौंदे को कोई आकार दे कर चाची मूर्त बनाने की कोशिश करने लगीं. चाची का भी मन लगने लगा. अपनी जमापूंजी लगा कर चाची उसे पढ़ानेलिखाने का प्रयास करने लगीं और विजय ने भी पूरी लगन से अपना जीवन संवारा.

धीरेधीरे समय बीता, विजय ने एमबीए कर लिया. चाची की एक मित्र बेंगलुरु में थीं. वे ही उस की एक तरह से लोकल गार्जियन भी थीं. चाची खुश थीं, पिता उस का नहीं हुआ पर बेटा तो उस का हुआ. अच्छी कंपनी में नौकरी भी मिल गई. चाची भी सुखी बुढ़ापे के सपने देखने लगी थीं.

मित्र की बेटी पसंद आ गई थी विजय को, चाची ने स्वीकार कर लिया था. सोच लिया था दोनों की शादी हो जाएगी. अभी एमबीए पूरी नहीं हुई थी तभी चाची की मित्र और उन के पति का कार दुर्घटना में देहांत हो गया था जिस वजह से यह रिश्ता और भी सहज हो गया था. मानो 3-3 बेसहारा लोग एक ही छत के नीचे मिल जाने वाले हों. मित्र की पुत्री बहू बन जाएगी तो सासबहू, मांबेटी की तरह जीवन गुजार लेंगी. लेकिन सहसा ऐसा क्या हो गया कि चाची को इतने कड़वे शब्दों का इस्तेमाल  करना पड़ा?

‘‘निकल जाओ मेरे घर से. आज के बाद मेरातुम्हारा कोई रिश्ता नहीं.’’

‘‘क्या हो गया, चाची?’’ लड़खड़ाती चाची को संभाला मैं ने.

‘‘कुछ नहीं हुआ, सोमू. सिर्फ मेरी ममता का इनाम मिला है मुझे. मैं ही भूल गई थी सांप का बच्चा संपोला ही निकलता है. अरे, जो लड़का अपनी जन्म देने वाली का सगा न हुआ वह मेरा सगा क्या होता. यह तो मौकापरस्त इंसान है जिसे सिर्फ अपना मतलब निकालना आता है. रिश्ते निभाना आता होता तो मरती मां का साथ कभी न छोड़ता.’’

चाची का हाथ पकड़ अपने कमरे में ले आया मैं और दरवाजा भीतर से बंद कर लिया.
‘‘क्या हो गया, छोटी मां?’’

‘‘मैं किसी की मां नहीं हूं. मैं ने कभी किसी संतान को जन्म नहीं दिया. तुम क्यों मांमां की रट लगाए जा रहे हो. छोड़ो मुझे.’’

पगलाई सी लगीं मुझे चाची. मेरी पत्नी ने चाची को संभाला.

‘‘इस घर में मेरा है क्या? जमीनजायदाद तो कानूनन विजय और सोमू की आधीआधी है. रहा सवाल मेरा. मुझे तो देखभाल के लिए चौकीदार बना कर लाया था न तुम्हारा चाचा. कल उस के मांबाप की आया थी, बाद में उस के बेटे की आया बनी. आज वह अपना हिस्सा बेच कर बेंगलुरु जा कर रहेगा अपनी पत्नी के साथ. मेरा न कल कोई घर था न ही आज. मेरा प्यार कभी किसी की समझ में ही नहीं आया.’’

‘‘बड़ी मां, दरवाजा खोलिए,’’ विजय बाहर से दरवाजा पीट रहा था, ‘‘सोमू भैया, दरवाजा खोलिए.’’

पगला सी गई थीं चाची. मैं ने दरवाजा खोल दिया. भीतर चला आया विजय. ‘‘इतनी सी बात पर आप इतना नाराज क्यों हो रही हैं. मैं ने गलत क्या कह दिया. पापा की और आप की कभी बनी नहीं तो उस में कुछ दोष तो आप का भी होगा न. आप का तो स्वभाव ही ऐसा है. कभी आप पापा पर दोष लगाती हैं, कभी मुझे बुरा कहती हैं. रिश्ते निभाना आप को आता कहां है. आप तो जरा भी समझदार नहीं हैं.’’

‘‘विजय,’’ मेरी पत्नी ने चीख कर उस का नाम लिया.

मानो तो जड़ हो गया मैं भी. जिस लड़के की अपनी चादर में हजार छेद वही मेरी चाची पर आरोप लगा रहा था. कीचड़ का ढेर निर्मल नदी पर आरोप लगा रहा था कि वह गंदी है. समझदार नहीं है चाची.

‘‘क्या बक रहे हो, विजय? क्या हो गया तुम्हें?’’ मैं उस का हाथ पकड़ कर बाहर ले आया.

‘‘ठीक ही तो कह रहा हूं. चाची होंगी आप की, सोचा जाए तो ये मेरी लगती भी क्या हैं, जो मैं बकवास सुनूं. आप मुझे मेरा हिस्सा दे दीजिए. बेंगलुरु में मेरा एक फ्लैट निकला है ‘लकी ड्रा’ में. मुझे

30 लाख रुपया अभी चाहिए. पापा ने सारी उम्र कमा कर इसी घर को तो भरा है. अपने बाप का कमाया ही तो मांग रहा हूं. खुद भी पैसे देना नहीं चाहतीं और उसे भी मना कर दिया है कि मुझे पैसे न दे. ये दोनों मिल कर मेरा जीना हराम कर रही हैं.’’

मेरी पत्नी भी बाहर चली आई थी.

‘‘यह दूसरी कौन है?’’

‘‘सीमा और कौन? न बड़ी मां खुद पैसे दे रही हैं और न ही सीमा को देने दे रही हैं.’’

‘‘सीमा, इतने पैसे कहां से लाएगी?’’

‘‘अपना घर बेच कर और कहां से?’’

बेशर्मी की पराकाष्ठा मेरे सामने थी. सच कहा चाची ने, सांप का बच्चा संपोला.

‘‘सीमा और छोटी मां को मेरे साथ रहना है तो मेरा कहना मानना पड़ेगा.’’

चाचा की हूबहू तसवीर मेरे सामने थी. चाचा का अंश सामने खड़ा वही सब कर रहा था जो चाचा ने 30 साल पहले किया था. छाती पर मूंग कैसे दली जाती है कोई इन महापुरुषों से सीखे.

‘‘इस का दिमाग तो खराब है ही, सीमा का दिमाग भी खराब कर दिया इस औरत ने.’’

एक झन्नाटेदार हाथ पड़ा विजय के गाल पर. मेरे पिता बीच में चले आए थे.

‘‘दिमाग तो हम सब का खराब था जो तुम दोनों को इस घर में पैर भी रखने दिया. भाई का खून था जो संभालना पड़ा, जहां तक हिस्से का सवाल है इस परिवार ने सदा दिया है तुम दोनों को, तुम से लिया कुछ नहीं. अपने बाप की तरह दूसरों के कंधों पर पैर रख कर चलना बंद करो. भूल जाओ, तुम्हारे सहारे कोई जीने वाला है. तुम अपना निर्वाह खुद कर लो, उतना ही बहुत है. निकल जाओ इस घर से. न सीमा अपना घर बेचेगी और न ही इस घर में अब तुम्हारा कुछ है,’’ पापा ने सचमुच विजय की अटैची उठा कर बाहर फेंक दी.

‘‘हम ही समझदार नहीं हैं जो बारबार भूल जाते हैं कि किस पर प्यार लुटाना है और किस पर नहीं. तभी निकाल दिया होता तो आज किसी ढाबे पर बरतन मांज रहे होते. लाखों लगा कर तुम्हें पढ़ालिखा दिया यही हमारी बेवकूफी हुई. सच कहा तुम ने बेटा. यह औरत तो जरा सी भी समझदार नहीं है. बेवकूफ है, एक बहुत बड़ी पागल है.’’

‘‘मैं अदालत में जाऊंगा.’’

‘‘तुम सुप्रीम कोर्ट चले जाओ. इस घर में तुम्हारा कुछ नहीं. सीमा को भी मैं ने यहीं बुला लिया है, अपने पास. उस को भी रुलारुला कर मार रहे हो न तुम. जाओ, निकल जाओ.’’

पापा इतना सब जानते हैं, मुझे नहीं पता था. मैं तो सोच रहा था अभीअभी आग धधकी है. नहीं जानता था काफी दिन से जराजरा आग सुलग रही है जो छोटी मां, पापा और सीमा को जला रही है. 10 साल से उसे पाल रही थीं छोटी मां, मेरी सुलेखा चाची. असहाय नजरों से बंद दरवाजा देखने लगीं. मानो बीच चौराहे पर किसी ने चाची को वस्त्रहीन कर दिया हो. विस्फारित नजरों से बारीबारी सब का चेहरा देखने लगीं.

‘‘चलो बेटा, अंदर चलो.’’

पापा ने चाची के कंधे पर हाथ रखा. पत्थर सी सन्न होती चाची चल पड़ीं पापा के साथ. पापा के इशारे पर हम दोनों चाची को उन के कमरे में ले गए. कोई किस से क्या पूछता, एक और रिश्ते का दाहसंस्कार जो अभीअभी हुआ था.

तो यह बात थी. विजय को अपने फ्लैट के लिए खूब सारा पैसा चाहिए.

वह उसे उस की मां दे या भावी पत्नी, उस की मर्दानगी को कोई फर्क नहीं पड़ता.

सुबह तक कोई नहीं सो पाया. तरस आ रहा था हमें चाची पर. रोना रुपए का नहीं था, रोना था ठगे जाने का. विजय के पिता ने विदेश जाने के लिए घर की जमीन तक बिकवा दी थी और बेटा अपना घर बनाने के लिए बचाखुचा रिश्ता भी नोच कर खाना चाहता था.

सुबह आई और अपने साथ एक और सत्य ले कर आई. सीमा का संदेश आया चाची को. उस ने विजय से अपना रिश्ता तोड़ दिया था.

‘‘सुलेखा मौसी. मैं विजय की नीयत समझ नहीं पा रही हूं. ऐसा इंसान जिस की अपनी कोई जड़ ही नहीं, वह कबकब बेल की तरह मुझ से लिपट कर सहारा ही तलाशता रहेगा, कौन जाने. उस के पास न रीढ़ की हड्डी है न रिश्तों की समझ. उस की सोच सिर्फ अपने मतलब तक है.

उस के पार उसे कुछ नजर नहीं आता. ऐसा इंसान जो आप का सम्मान नहीं कर पाया, वह मुझे कब चौराहे का मजाक बना दे, कौन जाने. मैं दूसरी सुलेखा नहीं बनना चाहती. मौसी, मैं यह शादी नहीं करना चाहती. मुझे माफ कर दीजिएगा.’’

‘‘यह तो होना ही था,’’ चाची के होंठों से निकला.

हम डर रहे थे, पता नहीं क्या होगा. सुबहसवेरे चाची उठ भी पाएंगी कि नहीं. मगर सामान्य लगीं मुझे, चाची. नहाधो कर कालेज जाने को तैयार मिलीं. मैं चाय का कप ले कर पास ही आ बैठा था. समझ नहीं पा रहा था कि कैसे चाची से बात शुरू करूं. सीमा का लंबाचौड़ा एसएमएस मेरे हाथ में था और मैं चाची को सुना चुका था.

‘‘तरस आ रहा था मुझे विजय पर. बाप को मरने के लिए यह घर तो नसीब हुआ था. सोच रही हूं रिश्तों के नाम पर इस के पास क्या होगा?’’

चाची के शब्द सदा साफ और सटीक होते हैं. विजय का भविष्य उन्हें साफसाफ दिखाई दे रहा था. चाची टूटी नहीं थीं, यह देख मुझे बड़ा चैन मिला. चाची कालेज के लिए निकल चुकीं और मेरी नजरें उन के कमजोर कंधों से ही चिपकी रहीं देर तक. चाची के शब्द कानों में बजते रहे, ‘रिश्तों के नाम पर विजय के पास कल क्या होगा?’ मैं भी सोचने लगा.

2 दिन बीत गए. शायद विजय ने कानूनी सलाह ले ली होगी. समझ गया होगा कि कानूनी तरीका उसे कुछ नहीं दे सकता. मेरे औफिस चला आया विजय. जरा सा नरम लगा मुझे. दोबारा घर आना चाहता था.

‘‘काठ की हांडी बारबार आग पर नहीं चढ़ाई जा सकती, विजय. जिस औरत ने तुम पर अपने जीवनभर की जमापूंजी लगा दी उसी का तुम ने अपमान कर दिया. सच कहा था तुम ने, वह तुम्हारी लगती भी क्या है. तुम्हारी बकवास इसीलिए सुन ली क्योंकि तुम से प्यार करती थीं वरना तुम ने और तुम्हारे पापा ने इस रिश्ते में कौन सी ईमानदारी रोपी है, जरा सोचो. किस रिश्ते से चाची ने तुम्हें पढ़ायालिखाया, जरा सोचो. चाचा के मरते ही तुम्हें भी धक्के दे कर निकाल देतीं तो आज तुम कहां होते, सोच लो. विश्वास खो दिया है तुम ने हम सब का. शुक्रगुजार होना चाहिए था तुम्हें चाची का जो आज इज्जत की रोटी कमा कर खा सकते हो. अब घर लौटने का सपना बिसार दो. माफ कर दो हमें.’’

सहसा मुझे कुछ याद आया, ‘‘तुम तो अदालत में जाने वाले थे न? क्या पता चला? तुम्हारे पिता के नाम कुछ भी नहीं है. दादाजी ने सब छोटी मां के नाम कर दिया था. समझदार थे न हमारे बुजुर्ग जो उन्हें सब नजर आ गया था. हम तो नासमझ हैं जो संपोले को ही पालते रहे. छोटी मां बेचारी प्यार की आस में ही मारी गईं.

‘‘आज सोचता हूं, वे सच में समझदार नहीं हैं. क्या मिला उन्हें? तुम्हारे पिता को छोड़ कहीं और घर बसा लेतीं तो आज उन की भी भरीपूरी गृहस्थी होती. तुम्हारे पापा ने कभी कुछ डौलर किसी पर बरसाए होंगे तो उस से कहीं ज्यादा उन्होंने हम से पाया भी होगा. तुम्हारे पापा ने भी सिर्फ लूटा है हमें जिस तरह तुम ने. चाची ने सदा अपना कमा कर खाया है.’’

‘‘सोमू भैया, आप मुझे समझने की कोशिश…’’

‘‘अब हम समझदार हो गए हैं, बेटा. तुम्हारी नीयत जान चुके हैं. अब और नहीं.’’

उठ खड़ा हुआ मैं, अब मेरे पास भी विजय को सुनने का समय नहीं था. सदा रिश्तों को भुनाता ही रहे जो इंसान उसे मैं क्यों सुनूं. क्यों भरोसा करूं उस का जो न जाने कब मुझे चौराहे का मजाक बना दे. हाथ के इशारे से चले जाने को कह दिया मैं ने. क्योंकि अब हम सब समझदार हो गए थे.