लेखक-राघवेंद्र सैनी

पुराने सालते क्षण जीवनभर के लिए रह जाते हैं, खासकर तब, जब ऐसे पारिवारिक रिश्ते हों जो उन क्षणों को घटाने की जगह एक ऐसा क्षण और जोड़ दें जो ताउम्र कचोटता रहे. ऐसे ही सड़ेगले रिश्तों के पसोपेश की उधेड़बुन है यह कहानी 5 वर्षों के निर्वासन के बाद मैं फिर यहां आया हूं. सोचा था, यहां कभी नहीं आऊंगा लेकिन प्राचीन सालते क्षणों को नए परिवेश में देखने के मोह का मैं संवरण न कर पाया था. जीवन के हर निर्वासित क्षण में भी इस मोह की स्मृति मेरे मन के भीतर बनी रही थी और मैं इसी के उतारचढ़ाव संग घटताबढ़ता रहा था. फिर भी आज तक मैं यह न जान पाया कि यह मोह क्यों और किस के प्रति है? हां, एक नन्ही सी अनुभूति मेरे मन के भीतर अवश्य है जो मु झे बारबार यहां आने के लिए बाध्य करती रही है. यह अनुभूति मां के प्रति भी हो सकती है और अमृतसर की इस धरती के प्रति भी जिस की मिट्टी में लोटपोट कर मैं बढ़ा हुआ.

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