पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में यह साफ किया था कि अगर कोई आरक्षित कोटे यानी दलित या आदिवासी मांबाप किसी सामान्य जाति के बच्चे को गोद लेते हैं, तो उस बच्चे से आरक्षण प्रमाणपत्र का फायदा छीना नहीं जा सकता. हाईकोर्ट की जज जयश्री ठाकुर ने साफ किया कि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि फरियादी ने अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र गलत तरीके से हासिल किया था. दरअसल, एक मामले में फरियादी रतेज भारती ने अदालत को बताया था कि उस का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में साल 1967 में हुआ था. उस के पैदा होने के तुरंत बाद उस की मां की मौत हो गई थी.

रतेज भारती जब 10 साल का था, तब उसे रामदासिया जाति के पतिपत्नी ने गोद ले लिया था. इस बाबत बाकायदा कानूनी गोदनामा तैयार कराया गया था. साल 1992 में आरक्षित समुदाय के मांबाप की औलाद होने की बिना पर रतेज भारती ने आरक्षण का प्रमाणपत्र बनवाया था. 2 साल बाद ही उस ने इस प्रमाणपत्र की बिना पर सरकारी नौकरी भी हासिल कर ली थी. लेकिन जनवरी, 2014 में सरकार ने यह कहते हुए रतेज भारती को नौकरी से निकाल दिया था कि चूंकि उस का गोद लिया जाना जायज नहीं है, इसलिए वह आरक्षित जाति के प्रमाणपत्र पर नौकरी करने का हकदार नहीं है.

रतेज भारती ने हिम्मत नहीं हारी और अदालत का दरवाजा खटखटाया. 2 दफा उस के जाति प्रमाणपत्र की जांच हुई और दोनों ही बार वह सही पाया गया. लिहाजा, हाईकोर्ट ने उस की नौकरी बहाली का हुक्म जारी कर दिया.

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