महाभारत में ‘सर्प यज्ञ’ की एक कथा है. महाभारत में लिखा है, ‘‘सर्प यज्ञ के लिए मंत्र पढे़ जाने लगे तो सांपों के हृदय हिलाने वाली आहुतियां दी गईं. आह्वान करते ही सब सांप विवश हो कर तरहतरह के शब्द करते हुए आआ कर अग्निकुंड में गिरने लगे. ‘‘तक्षक नाम का एक नाग अग्निकुंड से बचने के लिए भाग कर इंद्र के पास जा कर छिप जाता है. इंद्र उसे शरण देता है. तक्षक डर कर इंद्र के पास गया. इंद्र ने कहा, नागराज, तुम को सर्प यज्ञ से कुछ भी डर नहीं है. मैं ने पहले ही तुम्हारी ओर से विधाता को प्रसन्न कर लिया है. तुम कुछ चिंता न करो. इस प्रकार के आश्वासन पा कर नागराज तक्षक इंद्र के लोक में सुख से रहने लगा.’’ कुछ समय बाद एक अद्भुत घटना हुई. डर से व्याकुल तक्षक को इंद्र ने छोड़ दिया था तो वह अग्नि में नहीं गिरा. आकाश में ही ठहरा रहा. आकाश में ही क्यों रुका रहा? सवाल उठे कि वह बच क्यों गया? क्या मंत्रज्ञ ब्राह्मणों के मंत्र शक्तिहीन हो गए थे? पता चला कि उसे आस्तीक नामक ऋषिकुमार, स्वयं राजा और ब्राह्मणों ने मिल कर बचा लिया.  

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