लेखिका- प्रतिभा अग्निहोत्री

मौडर्न समय में रिश्ते जोरजबरदस्ती से नहीं बल्कि आपसी तालमेल से बनाने पड़ते हैं. तालमेल ऐसा जिस में दबनेदबाने की भावना न हो और एकदूसरे के प्रति सम्मान हो. सासबहू को ले कर समाज में परसैप्शन है कि इन का नेचर आपस में लड़ने?ागड़ने का है पर आज के बदले समय में सासबहू में तालमेल दिखाई देने लगा है. इवनिंग वाक से वापस आते हुए लिफ्ट में मेरे सामने रहने वाली मिसेज मौली अपने बेटे की पत्नी के साथ मिल गईं. अकसर सासबहू की यह जोड़ी मु?ो आतेजाते मिल ही जाती है. उन्हें यों एकसाथ देख कर मैं ने कहा, ‘‘कहां चली यह सासबहू की खूबसूरत जोड़ी?’’ ‘‘मेला, मूवी और बाहर ही डिनर ले कर घर आने का प्लान है आंटी,’’ बहू आरती ने अपनी सास की ओर मुसकरा कर देखते हुए कहा.

‘‘वाह, आदर्श सासबहू हो आप दोनों,’’ मैं ने कहा तो बहू खिलखिलाते हुए बोली, ‘‘बाय द वे आंटी, क्या हम सासबहू लगती हैं?’’ ‘‘रियली नहीं, मु?ो तो हमेशा आप दोनों मांबेटी ही लगती हो. अभी ही देख लो, दोनों ही जींसटौप में हो. मांबेटी भी नहीं, बहनें ही अधिक लग रही हो,’’ मैं ने हंस कर कहा तो वे दोनों खुश होते हुए चली गईं. सच में आज सासबहू की परिभाषा पूरी तरह से उलट गई है. मु?ो अपनी मां का बहू रूप आज भी याद है जब उन के मुख पर घूंघट हुआ करता था. उसी घूंघट में वे घर के समस्त कार्यों को निबटाती थीं. घरबाहर सभी जगह पर मजाल है कि उन का घूंघट जरा सा भी ऊंचा हो जाए. उन की अपनी कोई मरजी न थी. बस, दादी के निर्देशों का पालन भर करना होता था. जब मैं बहू बन कर अपनी ससुराल आई तो घूंघट का स्थान सिर के पल्ले ने ले लिया और हमें घरबाहर के विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय सासुमां के सामने रखने का अधिकार तो था परंतु अंतिम निर्णय सासुमां का ही होता था जो अप्रत्यक्ष रूप से घर के मर्दों का ही हुआ करता था.

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