भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने छठी बार एशिया कप अपने नाम किया लेकिन न ही अखबार की सुर्खी बनी और न ही खबरिया चैनलों ने तवज्जुह दी. क्रिकेट को धर्म की तरह मानने वाले इस देश में पुरुष और महिला खिलाडि़यों के बीच भेदभाव देखने को मिलता है तो चिंता होती है. भारतीय महिला क्रिकेट टीम की खिताबी जीत को जनसामान्य में उतनी जगह नहीं मिल पाती जितनी पुरुष टीम को मिलती है. महेंद्र सिंह धौनी कौन हैं, इस बात को तकरीबन सभी जानते होंगे मगर मिताली राज कौन हैं, हो सकता है कि बहुत से लोगों ने इस नाम को पहली बार ही सुना हो.

दरअसल, भेदभाव क्रिकेट का नहीं बल्कि लैंगिक का है. पुरुष खिलाडि़यों के मुकाबले महिला खिलाडि़यों को सारी सुविधाएं नहीं मिलतीं. एक मैच खेलने के लिए पुरुष खिलाड़ी को जितना पैसा दिया जाता है उतना पैसा एक महिला खिलाड़ी को नहीं मिलता. यहां तक कि महिला टीम जब मैच खेलती है तो दर्शकों को मामूली रेट पर टिकट मिलते हैं. बावजूद इस के, स्टेडियम में दर्शक नहीं जुटते. वहीं, जब पुरुष टीम खेलती है तो स्टेडियम खचाखच भर जाते हैं जबकि टिकटों के रेट भी अधिक होते हैं.

महिला टीम की मिताली राज इस मुद्दे को कई बार उठा चुकी हैं. महिला क्रिकेट के एक कोच ने भी एक बार गंभीर सवाल उठाए थे कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पुरुष क्रिकेट टीम पर पानी की तरह पैसा बहाता है जबकि महिला क्रिकेट को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी नहीं करता.

महिला क्रिकेट टीम में भी विराट कोहली और महेंद्र सिंह धौनी जैसे धुरंधरों की कमी नहीं है.

 

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