सरिता विशेष

हर रोज की तरह जब शेखर औफिस से घर आए तो लतिका का मुंह फिर फूला हुआ था. उन्होंने अपने मांपिताजी को ड्राइंगरूम में उदास बैठे देखा तो उन्हें तुरंत अंदाजा हो गया कि क्या हुआ होगा. पिता सोमेश, मां राधिका ने उन्हें आता देख दीर्घ निश्वास ले कर फीकी सी मुसकराहट लिए देखा. शेखर ने पूछा, ‘‘तबीयत तो ठीक है न?’’

दोनों ने  ‘हां’ में बस गरदन हिला दी. लतिका वहीं खड़ी सब को घूर रही थी. शेखर को देख उस ने त्योरियां चढ़ा लीं, पानीचाय कुछ नहीं पूछा. शेखर के छोटे भाई अजय की पत्नी नीता किचन से निकल कर आदरपूर्वक बोली,  ‘‘भैया, आप फ्रैश हो जाएं, मैं चाय लाती हूं.’’ शेखर  ‘ठीक है’ कह कर फ्रैश होने चले गए. वे समझ गए थे आज लतिका ने कुछ हंगामा किया होगा. मां, पिता अजय, नीता सब को बेकार के ताने दिए होंगे. अपनी मुंहफट झगड़ालू पत्नी के व्यवहार से वे मन ही मन दुखी ही रहते थे. शेखर एक एमएनसी में अच्छे पद पर थे. कोई आर्थिक तंगी नहीं थी. घर में फुलटाइम मेड नैना थी. तब भी लतिका किसी को सुनाने का मौका नहीं छोड़ती थी. उसे हमेशा इस बात पर चिढ़ होती थी कि शेखर अपने परिवार पर अच्छाखासा खर्च करते हैं. शेखर का कहना था कि उन की जिम्मेदारी है. वे उस से मुंह नहीं मोड़ सकते. लतिका का मायका भी उसी शहर बनारस में ही था जहां से उसे यही सीख मिलती थी कि अलग रहने पर वह दोनों बच्चों सौरभ और तन्वी के साथ ज्यादा आराम से रह सकती है. सोमेश रिटायर हो चुके थे. उन की पैंशन पर लतिका की नजरें रहतीं तो शेखर को गुस्सा आ जाता, कहते, ‘तुम्हें किस बात की कमी है. वे पिताजी के पैसे हैं. उन्हें वे जहां चाहें खर्च करेंगे कोई भी त्योहार, कोई मौका हो, वे कभी हम सब को कुछ न कुछ देने का मौका नहीं छोड़ते.’

इस पर लतिका हमेशा यही कहती, ‘तो उन्हें देना भी चाहिए, सारा खर्च हम ही तो उठा रहे हैं.’ ये सब बातें सोचतेसोचते ही शेखर फ्रैश हो व कपड़े बदल कर आए. बच्चे भी आ गए थे. अजय भी आ चुका था. नीता ने सब के लिए चायनाश्ता लगाया. लतिका मुंह फुलाए बैठी रही. किसी से कुछ नहीं बोली. नीता फिर किचन में जा कर नैना के साथ मिल कर डिनर की तैयारी में जुट गई. रात को सोते समय लतिका ने पुराना राग छेड़ दिया, ‘‘शेखर, आप मेरी बात क्यों नहीं सुनते? आगे बच्चों के खर्चे बढें़गे. हमें वह सब भी तो सोचना है. मैं यही तो कह रही हूं कि हम कहीं एक घर ले लेते हैं. अब अजय को संभालने दो यहां के खर्चे. क्या हमेशा हम ही संभालते रहेंगे सब कुछ?’’

‘‘मैं थक गया हूं रोजरोज की तुम्हारी इन बातों से, लतिका. अब मैं सोना चाहता हूं,’’ कह कर शेखर ने करवट ले ली. लतिका थोड़ी देर गुस्से में बुदबुदाती रही, फिर वह भी सोने की कोशिश करने लगी. लतिका शेखर को अलग रहने के लिए मजबूर करती है, यह बात सब ने महसूस की थी. एक दिन सोमेश ने ही कहा, ‘‘शेखर, बहू जो कह रही है, मान जाओ. तुम अलग…’’ शेखर ने पिता की बात पूरी नहीं होने दी, ‘‘नहीं, पिताजी. यह असंभव है. मैं अपने परिवार से अलग नहीं हो सकता.’’

‘‘बेटा, बड़ी बहू सब से नाराज ही रहती है. अलग रह कर वह खुश रह ले तो क्या बुरा है. हम सब दूर थोड़े ही हो जाएंगे. बस, यही आसपास कोई घर देख लो.’’ फिर सब के बहुत जोर देने पर, बहुत विचारविमर्श के बाद शेखर मजबूर हो गए और उन्होंने बहुत पास ही में एक घर खरीद लिया. लतिका की मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई. सौरभ और तन्वी नहीं जाना चाहते थे नए घर में. वे भी शेखर की तरह उदास थे. अब घर तो 2 थे पर शेखर और बच्चों का अधिकतर समय मां, पिताजी के साथ ही बीतता था. लतिका अकेले ही खुश थी.

एक दिन शेखर ने औफिस से आ कर बताया, ‘‘मुझे प्रमोशन मिल रहा है नैशनल मैनेजर के पद पर, पर मुंबई पोस्ंिटग होगी.’’ सुन कर लतिका और बच्चे बहुत खुश हुए. शेखर ने आगे कहा, ‘‘पर एक प्रौब्लम है, तन्वी का नयानया जौब है, सौरभ का कालेज है. बच्चों को इस समय शहर बदलना मुश्किल हो सकता है. मेरे रिटायरमैंट में 3 साल ही बचे हैं, वापस यहीं आना है फिर.’’ सौरभ, तन्वी समझदार बच्चे थे. तन्वी ने कहा, ‘‘पापा, आप अकेले कैसे रहेंगे वहां. आप मम्मी को ले जाओ हम दादादादी के पास रह लेंगे. कोई प्रौब्लम नहीं है, पापा.’’ लतिका नहीं चाहती थी बच्चों को उस घर में किसी से ज्यादा लगाव हो, फौरन बोली, ‘‘ऐसा करते हैं, आप ही चले जाओ, हम लोग आतेजाते रहेंगे और आप का तो टूर चलता रहेगा न?’’

‘‘हां, अब तो पूरा इंडिया कवर करना है.’’

‘‘तो ठीक है, उत्तर प्रदेश टूर रहेगा तो घर आना होता ही रहेगा. हां, यह ठीक है, आप ही शिफ्ट करना.’’

शेखर पत्नी का मुंह देखते रह गए, लतिका के साथ न जाने का कारण वे अच्छी तरह समझते थे. पत्नी की नसनस से वे वाकिफ थे. उन्हें दुख हुआ. वे नए शहर में हर चीज का प्रबंध कैसे करेंगे, इस बात की लतिका को जरा भी चिंता नहीं हुई. शेखर ने मातापिता के घर जा कर होने वाले प्रमोशन के बारे में बताया, आगे की प्लानिंग के बारे में भी बात की. उन्होंने शुभकामनाओं की झड़ी लगा दी. राधिका ने उदास स्वर में कहा, ‘‘पर बेटा, प्रबंध करना मुश्किल होगा अकेले, लतिका को ले जाओ, बच्चों को हम देख लेंगे.’’ शेखर ने दुखी होते हुए कहा, ‘‘मां, लतिका को यहीं रहना है.’’

यह सुन कर सब चुप हो गए. सोमेश ने पूछा, ‘‘जाना कब है?’’

‘‘अगले महीने.’’

सब उदास तो थे लेकिन शेखर एक बड़े प्रमोशन पर जा रहे थे, इस बात की खुशी भी थी. मुंबई जाने के दिन करीब आ रहे थे. लतिका के दिमाग में फिर एक फितूर आया, ‘‘शेखर, आप के मातापिता का जो घर है, मैं सोच रही हूं आप उस में से अपना हिस्सा पिताजी से मांग लें.’’

शेखर बुरी तरह नाराज हुए, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? यह बात करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’’

‘‘क्यों, तुम्हारा हिस्सा तो बनता है उस घर में. अपना हक लेने की तो बात कर रही हूं.’’

‘‘आगे से कभी यह बात छेड़ने की कोशिश करना भी मत.’’

‘‘नहीं, मैं ने सोच लिया है, हम अपना हिस्सा लेंगे उस घर में.’’

‘‘लतिका, मैं तुम्हें आखिरी बार कह रहा हूं, इस तरह की बात सोचना भी मत. यह कभी नहीं होगा.’’

‘‘नहीं, तुम्हें करना पडे़गा.’’

शेखर ने लतिका को डांटा, ‘‘बकवास बंद करो, लतिका.’’

लतिका ने क्रोधभरी नजरों से उन्हें घूरते हुए कहा, ‘‘आप को मेरी बात नहीं माननी है तो मुझे भी नहीं करनी आप से बात.’’

‘‘तो ठीक है, मत करो, शांति से जीने दो मुझे.’’

सौरभ और तन्वी अपने कमरे में सारी बात सुन रहे थे. तन्वी ने बाहर आ कर कहा, ‘‘मां, आप कैसी बातें करती हैं, पापा बिलकुल ठीक कह रहे हैं.’’

लतिका चिल्लाई, ‘‘चुप रहो तुम और जाओ यहां से.’’ तन्वी चुपचाप दुखी हो कर अपने कमरे में चली गई. लतिका के गुस्सैल और लालची स्वभाव से तीनों दुखी ही तो रहते थे. जिस दिन शेखर को जाना था उस दिन भी लतिका ने उन से ठीक से बात नहीं की. वह मुंह फुलाए इधरउधर घूमती रही. शेखर सब से मिल कर मुंबई के लिए रवाना हो गए. मुंबई पहुंच कर शेखर को ठाणे में एक अच्छी सोसायटी में कंपनी की तरफ से टू बैडरूम फ्लैट रहने के लिए मिला जो पूरी तरह से फर्निश था. उन का औफिस मुंबई इलाके में था. उन की बराबर की बिल्ंिडग में उसी कंपनी के एक मैनेजर प्रणव, उन की पत्नी वल्लरी और 2 युवा बच्चे रिया और तन्मय रहते थे. प्रणव के परिवार से मिल कर शेखर खुश हुए. प्रणव की कार से ही शेखर औफिस जाने लगे. शेखर ने किचन के सामान की पूरी जानकारी वल्लरी से ले ली थी. वल्लरी ने अपनी मेड संध्या को शेखर के यहां भी काम पर लगा दिया था. शेखर का पूरा परिवार शेखर से फोन पर संपर्क में रहता था. उन के रहने, खानेपीने के प्रबंध के बारे में पूछता रहता था.

लतिका ने जब भी बात की बहुत ही रूखे ढंग से की. उस की अब भी वही जिद थी. कई बार वह फोन पर ही घर में हिस्से की बात पर लड़ पड़ती. लतिका की छोटी बहन वन्या मुंबई के अंधेरी इलाके में रहती थी. शेखर की शनिवार की छुट्टी होती थी. वन्या अपने पति आकाश और बेटे विशाल के साथ अकसर मिलने आ जाती थी. कई बार उन्हें गाड़ी और ड्राइवर भेज कर शनिवार को बुलवा लेती थी और रविवार की शाम को पहुंचा देती थी. शेखर को उन सब से मिल कर बहुत अच्छा लगता था. उन्हें मुंबई आए 2 महीने हो रहे थे. प्रणव अकसर शेखर को खाने पर बुला लेते थे. शेखर एक शांत और सभ्य व्यक्ति थे. सब उन का दिल से आदर करते थे. एक दिन प्रणव को पूछते संकोच तो हो रहा था पर पूछ ही लिया, ‘‘शेखरजी, भाभीजी कब आ रही हैं?’’

‘‘अभी तो नहीं.’’

‘‘क्यों, आप को अकेले दिक्कत तो होती होगी?’’

‘‘नहीं, कोई दिक्कत नहीं है. सब ठीक है,’’ शेखर ने गंभीरतापूर्वक कहा तो प्रणव ने यह बात यहीं खत्म कर दी. कुछ दिनों बाद एक दिन शेखर नहाने गए तो बाथरूम से निकलते हुए उन का पैर फिसल गया और वे बहुत जोर से फर्श पर गिर पड़े. दर्द की एक तेज लहर उन की कमर में दौड़ गई. वे बिना हिलेडुले ही पड़े रहे. दर्द काबू से बाहर था. बहुत देर बाद किसी तरह जा कर बैड पर लेटे.

शेखर रोज तैयार हो कर प्रणव की बिल्ंिडग के गेट पर औफिस जाने के लिए खड़े होते थे. आज वे नहीं दिखे तो प्रणव ने उन्हें फोन किया. फोन की घंटी बहुत देर तक बजती रही. प्रणव को चिंता हुई. फिर फोन मिलाया. बहुत देर बाद शेखर ने इतना ही कहा, ‘‘प्रणव, मैं गिर गया हूं और उठ नहीं पा रहा हूं. तुम्हारे यहां मेरे घर की जो दूसरी चाबी रहती है उस से दरवाजा खोल कर आ जाओ.’’ प्रणव ने वल्लरी को सब बता कर चाबी ली और शेखर के बैडरूम में पहुंच गए. शेखर दर्द से बेहाल थे, हिला नहीं जा रहा था. कैसे गिरे, सब बताया. प्रणव ने वल्लरी को फोन किया, ‘‘कुछ नाश्ता ले कर और पेनकिलर ले कर जल्दी आओ.’’

वल्लरी तुरंत एक सैंडविच, चाय, पेनकिलर और एक ट्यूब ले कर पहुंची. शेखर के लेटेलेटे ही प्रणव ने उन्हें नाश्ता करवाया. चाय पीने के लिए वे उठ नहीं पाए. वल्लरी को उन की हालत देख कर बहुत दुख हुआ. ट्यूब प्रणव को देती हुई बोली, ‘‘यह भाई साहब को लगा देना, मैं चलती हूं. बच्चों को निकलना है. अभी चादर डलवा दी थी क्योंकि शेखर टौवल में ही थे जब गिरे थे. शेखर की कपड़े पहनने में मदद कर के प्रणव ने उन्हें दवा लगा दी. प्रणव ने औफिस में अपने और शेखर की छुट्टी के लिए फोन कर दिया था. प्रणव शेखर के पास ही बैठे थे. शेखर ने कहा, ‘‘तुम औफिस चले जाते, आज तो शायद मुझे लेटे ही रहना पड़ेगा.’’

‘‘नहीं, शेखरजी, छुट्टी ले ली है. यहीं हूं आप के पास.’’

शेखर मन ही मन प्रणव के प्रति बहुत कृतज्ञ थे. कहने लगे, ‘‘अच्छा ठीक है, घर जा कर आराम ही कर लो. अभी मेरा दर्द कम हो जाएगा. कुछ जरूरत होगी तो फोन कर ही लूंगा.’’ शेखर के बहुत जोर देने पर प्रणव घर चले गए. शेखर का खाना शाम को ही बनाती थी संध्या, नाश्ता और लंच शेखर औफिस की कैंटीन में करते थे. वल्लरी संध्या को निर्देश दे रही थी, ‘‘अब जब तक भाईसाहब घर पर हैं, तीनों समय उन का नाश्ता, खाना ठीक से बनाना.’’ ‘‘हां दीदी, ध्यान रखूंगी,’’ संध्या एक अच्छे स्वभाव की महिला थी. वह ईमानदार और मृदुभाषी थी. शेखर के घर जा कर उस ने सब काम किया. लंच भी बना कर उन के पास ही रख गई. दोपहर को प्रणव फिर आया. शेखर ने बताया, ‘‘दर्द सुबह जितना तो नहीं है लेकिन अब भी है.’’

‘‘चलिए, शाम को डाक्टर को दिखा कर आते हैं.’’

‘‘ठीक है, लगता है जाना ही पड़ेगा.’’

कार में मुश्किल से ही बैठ पाए शेखर. एक अच्छे हौस्पिटल के मशहूर और्थोपेडिक डा. राघव ने सारी जांचपड़ताल की, बैडरैस्ट बताया और कुछ दवाएं लिख दीं. शेखर घर आ गए. एक हफ्ता बीत रहा था. शेखर ने लतिका और बच्चों को अपनी तकलीफ बता दी थी. बच्चे परेशान हो उठे, ‘‘पापा, हम लोग आ रहे हैं, आप को परेशानी हो रही होगी.’’

शेखर ने कहा, ‘‘नहीं बेटा, तुम लोग परेशान मत हो. यहां सब बहुत ध्यान रख रहे हैं मेरा. औफिस से तो रोज ही कोई न कोई आता रहता है और प्रणव तो बहुत ही देखभाल कर रहा है.’’ शेखर हैरान रह गए जब लतिका ने कहा, ‘‘मैं तो आप से बहुत नाराज हूं. आप मेरी बात ही नहीं सुनते. आप को मेरी कोई बात ठीक नहीं लगती.’’ शेखर ने आगे बिना कुछ कहेसुने फोन रख दिया. आज शेखर का मन बुरी तरह आहत हुआ था. पति के दर्द की कोई चिंता नहीं. बस, संपत्ति, पैसा, हिस्से की बातें? कैसी पत्नी मिली है उन्हें? दूसरे शहर में अकेले रह रहे हैं, उन के सुखदुख की उसे कोई चिंता नहीं, यहां रातदिन पराए लोग उन के दुख में हर पल उन के साथ हैं. बिना किसी स्वार्थ के वन्या, आकाश उन्हें देखने कई बार आ चुके थे. फोन पर वन्या ने लतिका को समझाया भी, ‘‘दीदी, जीजाजी की तबीयत ठीक नहीं है. एक हफ्ते बाद भी उन का दर्द ठीक नहीं हुआ है. तुम बच्चों क मांपिताजी के पास छोड़ कर कुछ दिनों के लिए आ जाओ.’’

लतिका ने चिढ़ कर कहा, ‘‘जो इंसान मेरी बात नहीं मानता, मैं उस की चिंता क्यों करूं, तुम ही बताओ? क्या मैं गलत कहती हूं? क्या हमारा हिस्सा नहीं है पिताजी के मकान में?’’

‘‘लेकिन जीजाजी ऐसी बातें करने वाले इंसान नहीं हैं दीदी, अपने परिवार से प्यार करना बुरी बात तो नहीं.’’

‘‘वन्या, तुम छोटी हो, मुझे उपदेश देने की जरूरत नहीं है,’’ कह कर लतिका ने फोन रख दिया. 10-15 दिन बाद भी शेखर के दर्द में कमी नहीं आईर्. प्रणव फिर उन्हें डाक्टर के पास ले कर गए. शेखर तो लगातार छुट्टी पर ही थे. कुछ और टैस्ट हुए. अब की बार रिपोर्ट्स आईं तो सब का दिल दहल गया. शेखर को स्पाइन का कैंसर था जो कमर के निचले हिस्से से सिर के पीछे के हिस्से तक फैल चुका था, और रीढ़ की हड्डी को 65 प्रतिशत नुकसान पहुंचा चुका था. सब एकदूसरे का मुंह देखते रह गए. स्वभाव से शांत और नरम शेखर ने अपनी स्थिति को बहुत सहजता से स्वीकार कर लिया. औफिस के और लोग भी थे. वे सब से सामान्य रूप से बातचीत करते रहे, जैसे कुछ हुआ ही न हो उन्हें. उन्हें इतना सामान्य देख कर सब के दिलों में उन के लिए इज्जत और भी बढ़ गई. कमर में दर्द तो उन्हें कई बार होता था लेकिन वे इसे अपने काम का टूरिंग जौब और बढ़ती उम्र का प्रैशर समझ लेते थे. अब और दवाएं तुरंत शुरू हो गईं और कीमोथेरैपी शुरू होेने वाली थी. उन्होंने औफिस से लंबी छुट्टी ले ली थी. उन के बौस आनंद कपूर भी उन का बहुत साथ दे रहे थे. उन्होंने कह दिया था, ‘‘बस, तुम आराम करो, अपना इलाज करवाओ और अब अपनी फैमिली को बुला लो तो ठीक रहेगा, तुम्हें आराम मिलेगा.’’

बहुत सोचसमझ कर शेखर ने तन्वी को फोन किया, ‘‘बेटा, अगर हो सके तो 3-4 दिन की छुट्टी ले कर मुंबई आ जाओ.’’

तन्वी घबरा गई, ‘‘पापा, आप ठीक तो हैं न?’’

‘‘हां ठीक हूं, बस तुम लोगों को देखने का मन कर रहा है. तीनों आ जाओ.’’

तन्वी को पिता के स्वर की उदासी कुछ खटकी. उस ने लतिका से कहा, ‘‘मम्मी, पापा की तबीयत ठीक नहीं लग रही है, हम तीनों मुंबई चलते हैं.’’

‘‘नहीं, मुझे नहीं जाना.’’

तन्वी हैरानी से बोली, ‘‘आप कैसी बात कर रही हैं, आप को पापा की चिंता नहीं हो रही है?’’

‘‘जो भी समझो, तुम दोनों को जाना हो तो चले जाओ, मुझे नहीं जाना.’’ तन्वी गुस्से में फिर कुछ नहीं बोली और छुट्टी ले कर सौरभ के साथ मुंबई पहुंच गई. शेखर की हालत देख कर दोनों बच्चे उन के सीने से लग कर फफक पड़े. संध्या वहीं काम कर रही थी. उसे शेखर की बीमारी के बारे में पता था. उस की भी आंखें भर आईं. शेखर से न लेटा जा रहा था, न बैठा. वे बस सोफे पर तकिया रख कर अधलेटे से बैठे रहते थे. रात को भी उसी स्थिति में सोते थे. पिता की हालत देख कर दोनों बच्चे बहुत दुखी हुए. शेखर ने बच्चों को अपने पास बिठा कर अपनी बीमारी के  बारे में बताते हुए कहा, ‘‘मैं तुम लोगों को दुखी नहीं देख पाऊंगा. इलाज शुरू हो ही चुका है. आजकल तो हर बीमारी का इलाज है,’’ यह कहते हुए शेखर हलके से मुसकरा दिए. बच्चों ने हौसला रखते हुए खुद को संभाला, सौरभ ने कहा, ‘‘हां पापा, आप जरूर ठीक हो जाएंगे. अब हम यहीं रहेंगे, आप के पास.’’

शेखर ने कहा, ‘‘नहीं, तुम दोनों अपने काम का नुकसान नहीं करोगे.’’

तन्वी ने कहा, ‘‘पापा, आप का ध्यान रखने से बढ़ कर हमारे लिए और कोई काम जरूरी नहीं है. आप की देखरेख इस समय हमारा सब से पहला काम है.’’

शेखर ने कहा, ‘‘बस मां, पिताजी और चाचू को कुछ मत बताना.’’

‘‘ठीक है, पापा, मैं फिर मां को आने के लिए कहती हूं.’’

शेखर ने ‘हां’ में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘कह दो.’’ शेखर के दिल में एक आस थी कि शायद उन की बीमारी की बात सुन कर लतिका अपनी जिद, अहं, लालच छोड़ कर फौरन चली आएगी. लतिका ने सारी बात सुन कर तन्वी से कहा, ‘‘उन्हें मेरी जरूरत नहीं है. अगर होती तो इतने दिनों में भी क्या मेरी बात पर ध्यान नहीं देते. अपने परिवार के लिए हमेशा मेरी बात अनसुनी की है. अब उन सब को ही बुलाएं, मुझे क्यों बुला रहे हैं.’’ लतिका ने क्या कहा होगा, तन्वी  का चेहरा देख कर ही शेखर जान गए. फिर वे बहुत देर तक कुछ नहीं बोले.

तन्वी ने कहा, ‘‘सौरभ, हम दोनों में से  कोई एक यहां पापा के पास रहेगा, अभी मैं ने अपने बौस को फोन पर सब बताया है. उन्होंने मुझे घर से ही काम करने की परमिशन दे दी है. अभी तो मैं यहां रहूंगी. तुम चले जाओ. कालेज की छुट्टी होते ही तुम आ जाना. फिर मैं चली जाऊंगी. हम सब मैनेज कर लेंगे.’’ शेखर को अपने बच्चों पर बहुत प्यार आया. तन्वी ने फोन पर वन्या को सब बताया तो वह आकाश के साथ फौरन आ गई. आ कर शेखर के पास बैठ कर रोने लगी, ‘‘दीदी के व्यवहार पर शर्मिंदा हूं मैं जीजाजी, हैरान हूं उन के स्वभाव पर. इस समय भी इतनी जिद और गुस्सा.’’

शेखर ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मैं ने बहुत कोशिश की पर उस की सोच को बदल नहीं पाया. अगर मैं अपने मातापिता, भाई और उस के परिवार को अपने से अलग नहीं देख सकता तो क्या मेरी गलती है यह? मेरा भाई जिस की नईनई नौकरी है, जो अभी आर्थिक रूप से बहुत मजबूत नहीं है उस पर मैं घर के बंटवारे का दबाव कैसे डालूं. मैं यह सब नहीं कर सकता. और लतिका को मैं ने कभी कोई कमी कहां होने दी पर उस का लालच समय के साथ बढ़ता ही चला गया. और अब मुझे नहीं पता मैं कितने दिन जिऊंगा. तो क्या मैं अब अपने मातापिता को दुखी करूंगा, हिस्से की बात छेड़ कर. यह तो मुझ से कभी नहीं हो पाएगा,’’ शेखर का स्वर भरा र् गया. वहां बैठा हर व्यक्ति दुखी हो गया. शेखर की कीमोथैरेपी का पहला दिन था. प्रणव की कार से ही शेखर, वन्या और तन्वी हौस्पिटल पहुंचे. सौरभ को तन्वी ने भेज दिया था. डाक्टर से बात कर के प्रणव ने कीमो का दिन शनिवार का रखवाया था ताकि वह शेखर के साथ रह सके. उन्हें हौस्पिटल आनेजाने में परेशानी न हो. प्राइवेट रूम बुक कर लिया गया था. नर्स ने शेखर के कपड़े बदलवा कर इंजैक्शन देने की तैयारी शुरू कर दी थी. अपने मन की घबराहट पर काबू पाने के लिए तन्वी ने बाहर पड़ी बैंच पर बैठ कर अपना लैपटौप खोल लिया था. शेखर बैड पर लेट चुके थे. नर्स डाक्टर के आने का इंतजार कर रही थी. शेखर बिलकुल चुप थे. प्रणव बाहर रखी एक दूसरी बैंच पर बैठा तो वन्या वहीं बैठती हुई बोली, ‘‘आप लोगों का बड़ा सहारा है जीजाजी को.’’

‘‘शेखरजी इतने अच्छे इंसान हैं, कोई भी कुछ करना चाहेगा उन के लिए,’’ फिर थोड़ा संकोच करते हुए बोले, ‘‘वन्याजी, शेखरजी से तो नहीं पूछा कभी पर बारबार अब मन में यह प्रश्न उठ रहा है कि भाभीजी यह बीमारी सुन कर भी यहां…’’ वन्या ने बात पूरी नहीं होने दी. ठंडी सांस लेती हुई बोली, ‘‘जीजाजी इस मामले में दुखी ही रहे कि उन्हें मेरी बहन पत्नी के रूप में मिली.’’ प्रणव ने हैरान होते हुए पूछा, ‘‘अच्छा? शेखरजी जैसे व्यक्ति के साथ किसी को क्या परेशानी हो सकती है?’’

‘‘जीजाजी अपने मातापिता, भाई को बहुत प्यार करते हैं. मेरी बहन की नजर में यह उन की गलती है. मुझे तो समझ नहीं आता कि क्यों कोई पुरुष विवाह के बाद सिर्फ अपनी पत्नी के बारे में ही सोचे. यह क्या बात हुई. मेरी बहन की जिद पूरी तरह गलत है. अपनी बहन के स्वभाव पर मुझे शर्म आती है और अपने जीजाजी पर गर्व होता है. अपने मातापिता को प्यार करना क्या किसी पुरुष की इतनी बड़ी गलती है कि उसे ऐसी बीमारी से निबटने के लिए अकेला छोड़ दिया जाए.’’ धीरेधीरे बोलती हुई वन्या का मुंह गुस्से से लाल हो गया था. उस ने किसी तरह अपने को शांत किया. फिर दोनों ने अंदर जा कर शेखर पर नजर डाली. वे चुपचाप आंख बंद किए लेटे हुए थे. चेहरा बहुत उदास था. प्रणव  यही सोच रहे थे किसी स्त्री पर उस की जिद लालच, क्रोध इतना हावी हो सकता है कि वह अपने पति की इस स्थिति में भी स्वयं को अपने पति से दूर रख सके. उन के दिल में चुपचाप लेटे हुए शेखर के लिए स्नेह और  सम्मान की भावनाएं और बढ़ गई थीं.

शेखर का इलाज शुरू हो गया तो सौरभ और तन्वी ने पिता की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी. बच्चों ने कई बार लतिका को मुंबई आने के लिए समझाया पर उस की जिद कायम थी कि पहले शेखर अपने पिता की संपत्ति में अपना हिस्सा मांगें, जो शेखर को किसी भी स्थिति में मंजूर नहीं था. 2 महीने बीत रहे थे. सौरभ ने भागदौड़ कर मुंबई में ही ऐडमिशन ले लिया था जिस से वह पिता की देखभाल अच्छी तरह कर सके. तन्वी की पोस्ंिटग बैंगलुरु  में हो गई थी. कुछ दिन वह मुंबई रह कर काम करती, कुछ दिन बैंगलुरु रहती. उस के औफिस में शेखर की बीमारी सुन कर सब उस के साथ सहयोग कर रहे थे. शेखर को धीरेधीरे आराम आ रहा था. अब वे पहले की तरह चलनेफिरने लगे थे. प्रणव के साथ औफिस भी जाना शुरू कर दिया तो जीवन की गाड़ी एक बार फिर ढर्रे पर आ गई. इलाज तो लंबा ही चलने वाला था. पूरी तरह से ठीक होने में टाइम लगने वाला था. शेखर अपने मातापिता, भाई से लगातार संपर्क में रहते थे. वे परेशान न हों, इसलिए शेखर ने अपनी बीमारी के बारे में बताया था कि उन्हें कमरदर्द परेशान कर रहा है, इसलिए बच्चे उन के साथ ही रहना चाहते हैं. सब हैरान थे, बच्चे भी शेखर के पास  चले गए हैं. लतिका क्यों अकेली रह रही है. सब ने समझाया भी पर लतिका ने किसी की नहीं सुनी. पिता की बीमारी से परेशान बच्चे भी लतिका से बहुत नाराज थे. एक तरह से अब तीनों ने लतिका के बिना जीने की आदत डाल ली थी.

अचानक शेखर और बच्चों ने लतिका से बात करना बहुत कम कर दिया तो लतिका ने सोचा, एक बार मुंबई की सैर कर ही ली जाए. उस ने अपनी फ्लाइट बुक करवाई और मुंबई पहुंच गई. उस ने अपने आने की खबर किसी को नहीं दी थी. उस के पास शेखर के फ्लैट का पता भी नहीं था. एअरपोर्ट पहुंच कर उस ने बन्या को फोन किया.

वन्या हैरान हुई, ‘‘अरे दीदी, बताया तो होता.’’

‘‘बस अचानक प्रोग्राम बना लिया. तेरे जीजाजी और बच्चों को सरप्राइज देने का मूड हो आया. चल, अब उन का पता बता.’’ वन्या ने पता बताया, कहा, ‘‘अभी तो घर पर कोई होगा नहीं. चाबी सामने वाले फ्लैट की मिसेज कुलकर्णी से ले लेना.’’

‘‘लेकिन वे मुझे जानती नहीं, चाबी देंगी?’’

‘‘मैं उन्हें फोन कर के बता दूंगी.’’

‘‘ठीक है, तू कब आएगी?’’

‘‘जल्दी आप से मिलूंगी, वैसे आप अभी मेरे घर आ जाओ, शाम को चली जाना.’’

‘‘नहीं, बाद में ही मिलूंगी तुझ से.’’

‘‘अच्छा हुआ दीदी, आप आ गईं. जीजाजी की तबीयत भी…’’

‘‘बस, तू रहने दे. अपने जिद्दी जीजाजी का पक्ष मत ले.’’

‘‘जिद वे नहीं, आप करती हैं.’’

‘‘अच्छा, मैं सामान ले कर अब बाहर निकल रही हूं, फिर मिलेंगे.’’

लतिका शेखर के फ्लैट पर पहुंच गई. वन्या मिसेज कुलकर्णी को फोन कर चुकी थी. वे एक महाराष्ट्रियन महिला थीं. सौरभ व तन्वी से मिलतीजुलती रहती थीं. शेखर की बीमारी की उन्हें जानकारी थी. उन तीनों से सहानुभूति थी. लतिका ने उन से चाबी ली और दरवाजा खोल कर अंदर आ गई. बैग रख कर पूरे घर पर नजर  डाली. एकदम साफसुथरा, चमकता घर. लतिका को हैरानी हुई. वह किचन में गई. खाना तैयार था, करेले की सब्जी, साग, दाल. फ्रिज खोल कर देखा, सलाद भी कटा रखा था. लतिका अब हैरान थी. आधे घंटे बाद ही सौरभ आ गया. वन्या ने उसे फोन पर बता दिया था. सौरभ ने एक बेहद औपचारिक मुसकान से मां का स्वागत किया, बोला कुछ नहीं. लतिका ने ही पूछा, ‘‘कैसे हो, बेटा?’’

‘‘ठीक हूं, मां, आप कैसे आ गईं?’’

‘‘बस, तुम लोगों को देखने का मन हो आया.’’ सौरभ कुछ नहीं बोला. फ्रैश होने  चला गया. लतिका को धक्का सा लगा. यह बेटा है या कोई अजनबी. लतिका ने फिर पूछा, ‘‘तन्वी कहां है?’’

‘‘बैंगलुरु में, कल आएगी एक हफ्ते के लिए.’’

‘‘तुम्हारे पापा कब तक आएंगे?’’

‘‘बस, आने ही वाले होंगे.’’

‘‘आप चाय पिएंगी?’’

‘‘आने दो उन्हें भी.’’

लतिका देख रही थी, पहले का मस्तमौला सौरभ अब एक जिम्मेदार बेटा बन गया है. उस ने हाथमुंह धो कर शेखर के लिए फल काटे. शेखर के खानेपीने का बहुत ध्यान रखा जाता था. शेखर आ गए. लतिका को देख हैरान हुए, ‘‘कब आईं?’’ ‘‘थोड़ी देर हुई,’’ लतिका उन्हें देखती रह गई. कितने कमजोर हो गए थे शेखर पर उन के चेहरे पर बहुत शांति और संतोष दिखा लतिका को.

शेखर ने पूछा, ‘‘कोई परेशानी तो नहीं हुई घर ढूंढ़ने में?’’

‘‘नहीं, आराम से मिल गया घर.’’

इतने में सौरभ ने कहा, ‘‘पापा, मौसम कुछ ठंडा सा है, गरम पानी से हाथमुंह धो कर फल खा लीजिए,’’ फिर सौरभ उन के लिए फल ले आया, कहने लगा, ‘‘जब तक आप ये खत्म करें, मैं चाय चढ़ा देता हूं.’’शेखर जैसे ही सोफे पर बैठे, सौरभ ने उन की कमर के पीछे मुलायम सा तकिया लगाया. लतिका ने नोट किया शायद शेखर को उठनेबैठने में कहीं दर्द है, बोली, ‘‘कैसी तबीयत है? दर्द है क्या?’’

शेखर ने सपाट स्वर में जवाब दिया, ‘‘नहीं, सब ठीक है.’’ सौरभ 3 कप चाय और कुछ नमकीन ले आया. तीनों ने चुपचाप चाय पी. सौरभ ने कहा, ‘‘पापा, अब आप थोड़ी देर लेट लें, थकान होगी.’’

‘‘हां,’’ कह कर शेखर बैडरूम में चले गए. सौरभ अपना बैग खोल कर कुछ काम करने लगा. लतिका ने खुद को अनचाहा महसूस किया. उसे अपनी स्थिति किसी अनचाहे मेहमान से बदतर लगी. अभी तक वह अपने अहं, जिद में आसमान में ही उड़ती आई थी लेकिन अब यहां आ कर जैसे वह जमीन पर गिर गई. थोड़ी देर में उस ने ही पूछा, ‘‘रात को खाने में क्या करना है?’’ सौरभ ने उस की ओर बिना देखे ही जवाब दिया, ‘‘कुछ नहीं, मां. संध्या काकी आती हैं, सब काम वही कर जाती हैं.’’

‘‘क्या बनाया है?’’ बात जारी रखने के लिए लतिका ने पूछा.

‘‘पापा को करेला और साग देना होता है. वह तो रोज बनता ही है, दाल भी बनी होगी, बस, आप के आने से पहले ही निकली होंगी काकी खाना बना कर.’’

‘‘उस के पास चाबी रहती है?’’

‘‘नहीं, सामने वाली आंटी से लेती हैं.’’ शेखर के पास बैडरूम में जाने की हिम्मत नहीं पड़ी लतिका की. थोड़ी देर आराम कर शेखर ड्राइंगरूम में आ गए. इतने में धोबी आ गया. सौरभ ने गिन कर कपड़े धोबी को दिए. लतिका तो हर बात पर हैरान होती रही. अब तक वह सोफे पर ही अधलेटी थी. टेबल पर डिनर लगाने के लिए जब वह सौरभ के पीछे किचन में जाने लगी तो शेखर ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘रहने दो लतिका, सब हो जाएगा,’’ शेखर का स्वर इतना भावहीन था कि लतिका फिर वापस बैठ गई. खाना लगाते हुए सौरभ ने कहा, ‘‘काकी हम दोनों का ही खाना बना कर रख गई हैं, मां. बस, आप अपने लिए रोटी बना लें.’’ ‘‘हां ठीक है,’’ कह कर लतिका किचन में चली गई और अपने लिए 2 रोटी बना लाई. वह सौरभ को बहुत स्नेह से पिता को खाना परोसते हुए देखती रही. दोनों औफिस की, कालेज की बातें करते रहे. लतिका ने नोट किया, जब भी शेखर से उस की नजरें मिलीं, उन नजरों में पतिपत्नी के रिश्ते की कोई मिठास नहीं थी. एकदम तटस्थ, भावहीन थीं शेखर की नजरें उस के लिए. खाना खत्म होते ही सौरभ ने सब समेट दिया, फिर कहने लगा, ‘‘मां, आप आराम करो, मैं पापा को थोड़ा टहला कर लाता हूं.’’

सौरभ शेखर के साथ बाहर चला गया. लतिका ने अपने कपड़े बदले, गाउन पहना, अपना बैग शेखर के बैडरूम में ले जा कर रखा. बैड पर लेट कर कमर सीधी करने लगी, उसे यही लगता रहा था जैसे वह किन्हीं अजनबियों के साथ है इतनी देर से. दोनों टहल कर आए. सौरभ बाथरूम में था. शेखर ने कहा, ‘‘लतिका, तुम दूसरे रूम में सो जाना. रात को मुझे कोई जरूरत न पड़ जाए, यह सोच कर सौरभ मेरे साथ ही सोता है.’’ लतिका अपमानित सी खड़ी रह गई, कुछ कह नहीं पाई. फिर सौरभ दूध गरम कर के लाया. शेखर को दूध और दवाएं दीं. लतिका दूसरे कमरे में करवटें बदलती रही. कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे, यह क्या हो गया. अगले दिन सुबह उस ने देखा, सौरभ ने वाश्ंग मशीन में कपड़े डाले और सब्जी लेने चला गया. संध्या आई तो उस ने घर के काम निपटाने शुरू कर दिए. संध्या लतिका से मिली तो उस के मुंह से निकला, ‘‘अरे मैडम, आप आ गईं? अच्छा किया, साहब बहुत बीमार रहे. आप के बच्चे तो बहुत ही अच्छे हैं.’’

लतिका ने फीकी सी मुसकान के साथ ‘हां’ में सिर हिला दिया. शेखर औफिस के लिए तैयार हो गए तो सौरभ ने उन्हें नाश्ता और दवाएं दीं. उन का टिफिन पैक कर के उन के हाथ में पकड़ाया. शेखर लतिका से बिना कुछ कहे औफिस चले गए. संध्या ने सब का खाना बना दिया था. वह सब काम कितनी अच्छी  तरह कर के जाती है, यह लतिका देख ही चुकी थी. उस के हाथ में भी स्वाद था, यह भी वह रात को देख चुकी थी. थोड़ी देर में सौरभ ने कहा, ‘‘मां, मैं कालेज जा रहा हूं. तन्वी शाम तक आ जाएगी.’’ दिनभर लतिका घर में इधर से उधर घूमती रही, बेचैन, अनचाही, अपमानित सी. दोपहर में उस ने थोड़ा सा खाना खाया. शाम को सब से पहले तन्वी आई. सौरभ ने उसे बता ही दिया था, मां आई हैं. तन्वी ने देखते ही पूछा, ‘‘मां, आप कैसे आ गईं?’’

‘‘तुम लोगों को देखे काफी दिन हो गए थे.’’

‘‘अब आ ही गई हैं तो इस बात का ध्यान रखना मां, पापा को आप की किसी बात से तकलीफ न हो. हम तीनों बहुत दिनों बाद अब संभले हैं. पापा की तबीयत से बढ़ कर हमारे लिए इस समय और कुछ भी नहीं है.’’ रात को सब इकट्ठा हुए. तीनों हंसीखुशी बातें कर रहे थे. शेखर की हर बात का बच्चे ध्यान रख रहे थे और शेखर बच्चों पर अपना भरपूर स्नेह लुटा रहे थे. घर की सारी व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही थी. कहां तो लतिका ने सोचा था कि उस के बिना तीनों की हालत खराब होगी, उसे देखते ही तीनों उस के आगे झुकते चले जाएंगे कि आओ, अब संभालो घर. पर यहां तो किसी को उस की जरूरत ही नहीं थी. न शेखर को न बच्चों को. वे तीनों किसी बात पर हंस रहे थे और लतिका सोफे पर एक कोने में बैठी दिल ही दिल में कलप रही थी, यह क्या हो गया? बंटवारे की जिद, अपना गुस्सा, लालच, ईगो सब धराशायी होते दिख रहे थे उसे. अब क्या करे वह? क्या वापस चली जाए? पर पति और बच्चों के बिना वहां अकेली कितने दिन रह सकती है या यहां रह कर पति और बच्चों के दिल में जगह बनाने की कोशिश करनी चाहिए? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह अपना सिर पकड़े तीनों को हंसतेमुसकराते देखती रही.