स्वाति के मन में खुशी की लहर दौड़ रही थी. महीना चढ़े आज 15 दिन हो गए थे और अब तो उसे उबकाई भी आने लगी थी. खट्टा खाने का मन करने लगा था. वह खुशी से झूम रही थी. पर वह पूरी तरह आश्वस्त हो जाना चाहती थी. इतनी जल्दी इस राज को वह किसी पर प्रकट नहीं करना चाहती थी, खासकर पति के ऊपर. 15 दिन और बीत गए. दूसरा महीना भी निकल गया. अब वह पूरी तरह आश्वस्त थी. वह सचमुच गर्भवती थी. शादी के 10 वर्षों बाद वह मां बनने वाली थी, परंतु मां बनने के लिए उस ने क्याक्या खोया, यह केवल वही जानती थी. अभी तक उस के पति को भी मालूम नहीं था. पता चलेगा तो कैसा तूफान उस के जीवन में आएगा इस का अनुमान तो वह लगा सकती थी, लेकिन मां बनने के लिए वह किसी भी तूफान का सामना करने के लिए चट्टान की तरह खड़ी रह सकती थी. इस के लिए वह हर प्रकार का त्याग करने को तैयार थी. 10 वर्ष के विवाहित जीवन में बहुत कष्ट उस ने सहे थे. बांझ न होते हुए भी उस ने बांझ होने का दंश झेला था, सास की जलीकटी सुनी थीं, मातृत्वसुख से वंचित रहने का एहसास खोया था. आज वह उन सभी कष्टों, दुखों, व्यंग्यभरे तानों और उलाहनों को अपने शरीर से चिपके घिनौने कीड़ों की तरह झटक कर दूर कर देना चाहती थी, लोगों के मुंह बंद कर देना चाहती थी. वह सास के चेहरे पर खुशी की झलक देखना चाहती थी और पति…

पति को याद करते हुए उस के मन को झटका लगा, दिल में एक कड़वी सी कसक पैदा हुई, परंतु फिर उस के सुंदर मुखड़े पर एक व्यंग्यात्मक हंसी दौड़ गई. अपने होंठों को अपने दांतों से हलके से काटते हुए उस ने सोचा, पता नहीं उन को कैसा लगेगा? उन के दिल पर क्या गुजरेगी, जब उन को पता चलेगा कि मैं मां बनने वाली हूं. हां, मां, परंतु किस के बच्चे की मां? क्या पीयूष इस सत्य को आसानी से स्वीकार कर लेंगे कि वह मां बनने वाली है. उन के दिमाग में धमाका नहीं होगा, उन का दिल नहीं फट जाएगा? क्या वे यह पूछने का साहस कर पाएंगे कि स्वाति के पेट में किस का बच्चा पल रहा है या वे अपने दिल और दिमाग के दरवाजे बंद कर के अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए एक चुप्पी साध लेंगे? कुछ भी हो सकता है. परंतु स्वाति उस के बारे में चिंतित नहीं थी.

उस ने बहुत सोचसमझ कर इतना बड़ा कदम उठाया था. मातृत्वसुख प्राप्त कर के अपने माथे से बांझपन का कलंक मिटाने के लिए उस ने परंपराओं का अतिक्रमण किया था और मर्यादा का उल्लंघन किया था. परंतु उस ने जो कुछ किया था, बहुत सोचसमझ कर किया था. शादी के वक्त स्वाति एक टीवी चैनल में न्यूजरीडर और एंकर थी. वह अपनी रुचि के अनुसार काम कर रही थी, परंतु शादी के पहले ही पीयूष की मम्मी ने कह दिया था कि शादी के बाद वह काम नहीं करेगी. मन मार कर उस ने यह शर्त मंजूर कर ली थी. पीयूष ने एमबीए किया था. एमबीए पूरा होते ही वह अपने पिता के साथ उन के व्यापार में हाथ बंटाने लगा था. उन्हीं दिनों उस के पिता की असामयिक मौत हो गई. उस के बाद उस ने अपने पिता का कारोबार संभाल लिया. उन दोनों की शादी के समय पीयूष के पिता जीवित नहीं थे.

दोनों की शादी धूमधाम से संपन्न हुई. स्वाति भी खुश थी कि उस को अपने सपनों का राजकुमार मिल गया. परंतु सुहागरात को ही उस की खुशियों पर तुषारापात हो गया, उस के अरमान बिखर गए और सपनों के पंख टूट गए. सुहागरात में दोनों का मिलन स्वाति के लिए बहुत दुखद रहा. पीयूष ने जैसे ही उड़ान भरी कि धड़ाम से जमीन पर आ गिरा, जैसे उड़ान भरने के पहले ही किसी ने पक्षी के पर काट दिए हों. वह लुढ़क कर लंबीलंबी सांसें लेने लगा. स्वाति का हृदय दहल गया. मन में एक डर बैठ गया, अगर ऐसा है तो दांपत्य जीवन कैसे पार होगा? फिर उस ने अपने मन को तसल्ली देने की कोशिश की. हो सकता है, पहली बार के कारण ऐसा हुआ हो. उस ने कहीं पढ़ा था कि प्रथम मिलन में लड़के अत्यधिक उत्तेजना के कारण जल्दी स्खलित हो जाते हैं. यह असामान्य बात नहीं होती है. धीरेधीरे सब सामान्य हो जाता है. काश, ऐसा ही हो, स्वाति ने सोचा. परंतु स्वाति की शंका निर्मूल नहीं थी. उस की आशाओं के पंख किसी ने नोंच कर फेंक दिए. उस की सोच भी सत्य सिद्ध नहीं हुई. पीयूष के पंख सचमुच कटे हुए थे. वह बहुत लंबी उड़ान भर सकने में असमर्थ था. स्वाति अपने पर रोती, परंतु कुछ कर नहीं सकती थी. दांपत्य जीवन के बंधन इतने कड़े होते हैं कि कोई भी उन को तोड़ने का साहस नहीं कर सकता है. अगर तोड़ता है तो शरीर में कहीं न कहीं घाव हो जाता है. स्वाति के जीवन में खुशियों के फूल मुरझाने लगे थे, परंतु वह पढ़ीलिखी थी. उस ने आशा का दामन नहीं छोड़ा. आधुनिक युग विज्ञान का युग था, हर प्रकार के मर्ज का इलाज संभव था.

स्वाति के मन में पीड़ा थी परंतु ऊपर से वह बहुत खुश रहने का प्रयास करती थी. घर के सारे काम करती थी. सासूमां उस के व्यवहार व कार्यकुशलता से खु थीं, उस का पूरा खयाल रखतीं. स्वाति के साथ घर के कामों में हाथ बंटातीं. स्वाति कहती, ‘‘मांजी, अब आप के आराम करने के दिन हैं, क्यों मेरे साथ लगी रहती हैं. मैं कर लूंगी न सबकुछ.’’

‘‘तू सब कर लेती है, मैं जानती हूं परंतु मैं अपंग नहीं हूं. तेरे साथ काम करती हूं तो शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है. काम न करूंगी तो बीमार हो कर बिस्तर से लग जाऊंगी.’’

‘‘फिर भी कुछ देर आराम कर लिया कीजिए,’’ स्वाति सासूमां को समझाने का प्रयास करती.

‘‘तेरे आने से मुझे आराम ही आराम है. बस, 1 पोता दे कर तू मुझे बचीखुची खुशियां दे दे तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा,’’ मांजी ने स्वाति की तरफ ममताभरी निगाह से देखा.

स्वाति के हृदय में कुछ टूट गया. मांजी की तरफ देखने का उसे साहस नहीं हुआ. सिर झुका कर अपने काम में व्यस्त हो गई. समय बीतने के साथसाथ सासूमां की स्वाति से पोते पैदा करने की अपेक्षाएं बढ़ने लगीं. दिन बीतते जा रहे थे. उसी अनुपात में सासूमां की पोते के प्रति चाहत भी बढ़ती जा रही थी. एक दिन उन्होंने कहा, ‘‘स्वाति बेटा, अब और कितना इंतजार करवाओगी? तुम लोग कुछ करते क्यों नहीं? क्या कोई सावधानी बरत रहे हो?’’ उन्होंने संदेहपूर्ण निगाहों से स्वाति को देखा. ‘‘कैसी सावधानी, मां?’’ स्वाति ने अनजान बनते हुए पूछा. वह अपनी तरफ से क्या कहती, उसे ऐसे पुरुष के साथ बांध दिया था जिस में पुरुषत्व की कमी थी. इस में न उस के घर वालों का दोष था, न ससुरालपक्ष के लोगों का? दोष था तो केवल पीयूष का, जिस ने सबकुछ जानते हुए भी शादी की. स्वाति अभी तक चुप थी. शर्म और संकोच की दीवार उस के मन में थी, परंतु अब इस दीवार को उसे तोड़ना ही होगा. पीयूष से इस बारे में उसे बात करनी होगी, परंतु इस तरीके से कि उस के अहं को ठेस न पहुंचे और वह बात की गंभीरता को समझ कर अपना इलाज करवाने के लिए तैयार हो जाए.

शादी की पहली वर्षगांठ बीत गई. कोई उत्साह उन के बीच में नहीं था. स्वाति कोई जश्न मनाना नहीं चाहती थी. पीयूष और मां दोनों की इच्छा थी कि घर में छोटामोटा जश्न मनाया जाए. केवल खास लोगों को बुलाया जाए परंतु स्वाति ने साफ मना कर दिया. वह लोगों की निगाहों में जगे हुए प्रश्नों की आग में तपना नहीं चाहती थी. अंत में पीयूष और स्वाति एक रेस्तरां में डिनर कर के लौट आए. उसी रात…स्वाति ने खुल कर बात की पीयूष से, ‘‘एक साल हो गया, अब हमें कुछ करना होगा. मम्मी की हम से कुछ अपेक्षाएं हैं.’’

पीयूष चौंका, परंतु बिना स्वाति की ओर करवट बदले पूछा, ‘‘कैसी अपेक्षाएं?’’

स्वाति मछली की तरह करवट बदल कर पीयूष की आंखों में देखती हुई बोली, ‘‘क्या आप नहीं जानते कि एक मां की बेटेबहू से क्या अपेक्षाएं होती हैं?’’

पीयूष की पलकें झुक गईं, ‘‘मैं क्या कर सकता हूं?’’ उस ने हताश स्वर में कहा. स्वाति ने अपनी कोमल उंगलियों से उस के सिर को सहलाते हुए कहा, ‘‘आप निराशाजनक बातें क्यों कर रहे हैं. दुनिया में हर चीज संभव है, हर मर्ज का इलाज है और प्रत्येक समस्या का समाधान है.’’

पीयूष ने उस की आंखों में देखते हुए पूछा, ‘‘तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘बस यही कि आप एक अच्छे डाक्टर से सलाह ले कर इलाज करवा लें और जब तक आप का इलाज चलता रहेगा, मैं अपने जौब पर वापस जा कर खुश रहने का प्रयास करूंगी.’’

पीयूष सोच में पड़ गया. स्वाति का काम पर जाना उसे पसंद नहीं था. दरअसल, वह अपनी यौन अक्षमता से परिचित था और वह नहीं चाहता था कि शादी के बाद स्वाति अन्य पुरुषों के संपर्क में आए. स्त्री की अधूरी इच्छाएं और कामनाएं उसे भटका सकती थीं. इन पर किसी स्त्री का जोर नहीं चलता.

‘‘बाहर जा कर काम करने की इच्छा तुम मन से निकाल दो,’’ पीयूष ने कुछ कड़े स्वर में कहा, ‘‘मां, कभी नहीं मानेंगी और अगर मैं ने इजाजत दी तो घर में बेवजह कलह पैदा होगा. परंतु मैं एक काम कर सकता हूं. तुम में रचनात्मक प्रतिभा है. मैं घर पर कंप्यूटर ला देता हूं. तुम लेखकहानी लिख कर पत्रपत्रिकाओं में भेजो. इस से तुम्हारे अंदर का रचनाकार जीवित रहेगा और तुम समय का सही उपयोग भी कर सकोगी.’’ स्वाति जो चाहती थी, यह उस का सही समाधान नहीं था. चौबीसों घंटे घर पर रहने से एकाकीपन और ज्यादा डरावना लगने लगता है. यों तो स्वाति के ऊपर बाहर जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं था परंतु पुरानी सहेलियों और मित्रों से संपर्क टूट चुका था. एकाध से कभीकभार फोन पर बात हो जाती थी. अब उसे अपने पुराने रिश्तों को जीवित करना होगा. जिस घुटनभरी मानसिक अवस्था में वह जी रही थी, उस में उस का बाहर निकल कर लोगों के साथ घुलनामिलना आवश्यक था, वरना वह मानसिक अवसाद के गहरे कुएं में गिर सकती थी. स्वाति ने बुझे मन से पति के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया परंतु मन में विद्रोह के भाव जाग्रत हो उठे. वह बहुत सीधी, सरल और सच्चे मन की लड़की थी. उस के स्वभाव में विद्रोही भाव नहीं थे. परंतु परिस्थितियां मनुष्य को विद्रोही बना देती हैं. स्वाति के पास विद्रोह करने के एक से अधिक कारण थे परंतु अपनी मनोभावना को उस ने पति पर प्रकट नहीं किया. स्वाति ने संशय से पूछा, ‘‘और आप ने अपने बारे में क्या सोचा है?’’

‘‘अपने बारे में क्या सोचना?’’ उस ने टालने के भाव से कहा.

‘‘आप जानबूझ कर अनजान क्यों बन रहे हैं? क्या आप समझते हैं कि मैं इतनी भोली हूं और पुरुष के बारे में कुछ नहीं जानती. आप अपनेआप को किसी भ्रम में रखने की कोशिश न करें वरना मांजी पोतापोती का मुंह देखे बिना ही इस दुनिया से कूच कर जाएंगी.’’

पीयूष कुछ पल चुप रहा, फिर गंभीरता से कहा, ‘‘मैं अपना इलाज करवा लूंगा.’’

‘‘तो फिर कब चलेंगे डाक्टर के पास?’’ स्वाति ने उत्साह से कहा.

‘‘तुम क्यों मेरे साथ चलोगी? मैं स्वयं जा कर डाक्टर से सलाह ले लूंगा,’’ पीयूष की आवाज में बेरुखी साफ दिखाई पड़ रही थी.

स्वाति के मन में कुछ चटक गया. पतिपत्नी के प्रेम की डोर में एक गांठ पड़ गई. पीयूष ने दूसरे ही दिन एक डैस्कटौप कंप्यूटर, प्रिंटर के साथ ला कर घर पर लगवा दिया. स्टेशनरी भी रख दी. स्वाति ने अपने भावों को शब्दरूप में ढालना आरंभ किया. उस के लेखन को प्रकाशन के माध्यम से गति मिली. इस से काफी हद तक उसे मानसिक सुख और शांति का अनुभव हुआ. स्वाति अपनी दुश्चिंता और मानसिक परेशानी से बचने के उपाय ढूंढ़ रही थी, तो दूरी तरफ सासूमां उस की परेशानी बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थीं. जैसेजैसे महीने साल में बदल रहे थे, सासूमां की वाणी की मधुरता गायब होती जा रही थी. उन के मुंह से अब केवल व्यंग्यबाण ही निकलते थे. स्वाति को बातबात पर कोसना उन की दिनचर्या में शामिल हो गया था. सासूमां की कटुता स्वाति अपनी कहानियों और कविताओं में भरती रहती थी.

सासूमां अकसर टोकतीं, ‘‘स्वाति, कुछ घर की तरफ भी ध्यान दो.’’

‘‘मेरे बिना घर का कौन सा काम रुका पड़ा है?’’ स्वाति ने अब अपनी स्वाभाविक सरलता त्याग दी थी. वह भी पलट कर जवाब देने लगी थी.

‘‘शादी के कई साल हो गए. अभी तक एक बच्चा पैदा न कर सकी. घरगृहस्थी की तरफ कब ध्यान दोगी, बच्चे कब संभालोगी?’’

‘‘जब समय आएगा, बच्चे भी पैदा हो जाएंगे?’’

‘‘वह समय पता नहीं कब आएगा?’’ सासूमां बोलीं.

स्वाति कुछ नहीं बोली, तो सासूमां ने आगे कहा, ‘‘तुम्हारे पैर घर में टिकते ही नहीं, बच्चों की तरफ ध्यान क्यों जाएगा? बाहर तुम्हारे सारे शौक पूरे हो रहे हैं, तो पति से क्या लगाव होगा? उसे प्यार दोगी तभी तो बच्चे पैदा होंगे.’’ स्वाति ने जलती आंखों से सासूमां को देखा. मन में एक ज्वाला सी भड़की. इच्छा हुई कि सासूमां को सबकुछ बता दे, कमसेकम उन का कोसना तो बंद हो जाएगा, परंतु क्या वे उस की बात पर विश्वास करेंगी? शायद न करें, अपने बेटे की कमजोरी को वे क्यों स्वीकार करेंगी?

‘‘पता नहीं कैसी बंजर कोख ले कर आई है. ऊसर में भी बरसात की दो बूंदें पड़ने से घास उग आती है, परंतु इस की कोख में तो जैसे पत्थर पडे़ हैं,’’ सासूमां के प्रवचन चलते ही रहते थे. सासूमां की जलीकटी सुनतेसुनते स्वाति तंग आ चुकी थी. लेख, कविता और कहानी के माध्यम से मन की भड़ास निकालने के बाद भी उस के मन की जलन कम नहीं होती थी. दिन पर दिन स्वाति का मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा था. पीयूष की तरफ से उसे कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिल रहे थे. उस ने कहा था कि वह एक आयुर्वेदाचार्य से सलाह ले कर जननेंद्रियों को पुष्ट करने वाली कुछ यौगिक क्रियाएं कर रहा था और दूध के साथ कोई चूर्ण ले रहा था. स्वाति समझ गई, वह किसी ढोंगी वैद्य के चक्कर में फंस गया था. एक नियमित अवधि के बाद जब दोनों ने संबंध बनाए तो स्वाति को पीयूष की पौरुषता में कोई अंतर नजर नहीं आया.

‘‘आप किसी अच्छे डाक्टर को क्यों नहीं दिखाते?’’ स्वाति ने कहा.

‘‘क्या फायदा, जब आयुर्वेद में इस का इलाज नहीं है तो अंगरेजी चिकित्सा में कहां होगा?’’

‘‘आप कैसी दकियानूसी बातें कर रहे हैं. आप पढ़ेलिखे हैं. एक अनपढ़गंवार व्यक्ति के मुंह से भी यह बात अच्छी नहीं लगती. आज विज्ञान कहां से कहां पहुंच गया. चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हो रही है. कम से कम आप तो ऐसी बात न करें.’’

‘‘ठीक है, अगर तुम कहती हो तो मैं डाक्टर को दिखा दूंगा,’’ पीयूष ने बात को टालते हुए कहा और बाहर की तरफ चल दिया.

स्वाति पति के टालू स्वभाव से हैरान रह गई. पता नहीं किस मिट्टी का बना है यह इंसान. सासूमां का अत्याचार उस के ऊपर बदस्तूर जारी था, बल्कि दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा था. उन के तानों और जलीकटी बातों से स्वाति का हृदय फट कर रह जाता था. दूसरी तरफ पति की उपेक्षा से उस की मानसिक परेशानी दोगुनी हो जाती. उसे लगता, इस भरीपूरी दुनिया में वह बिलकुल अकेली पड़ गई है. उस का पति और सास ही उस के दुश्मन बन गए हैं. अपने मम्मीपापा से वह अपनी परेशानी बता नहीं सकती थी. अपना दर्द वह उन के हिस्से में क्यों डाले. उन्होंने तो अपनी जिम्मेदारी निभा दी थी. उस की शादी कर दी. अब अपने दांपत्यजीवन की परेशानियों से अवगत करा कर उन्हें क्यों परेशान करे? उस ने ठान लिया कि वह स्वयं ही अपनी परेशानियों से लड़ेगी और जीत हासिल करेगी. इन्हीं दुश्चिंताओं से गुजरते हुए उस ने इंटरनैट पर एक प्रसिद्ध सैक्सोलौजिस्ट का नाम व पता ढूंढ़ निकाला, फिर पीयूष से कहा, ‘‘आप स्वयं तो कुछ करने वाले नहीं हैं. मैं ने एक डाक्टर के बारे में इंटरनैट से जानकारी प्राप्त की है. उन से अपौइंटमैंट भी ले लिया है. कल हम दोनों उन के पास चलेंगे.’’ पीयूष ने अपने स्वर में और ज्यादा तल्खी घोलते हुए कहा, ‘‘एक बात समझ लो, मैं किसी डाक्टर के पास नहीं जाने वाला, तुम अपने काम से काम रखो. घर संभालो, मां की सेवा करो, अपना लेखन कार्य करो. तुम्हें जो चाहिए, मैं ला कर दूंगा. मेरे बारे में कुछ करने की तुम्हें जरूरत नहीं है.’’

इस बात से स्वाति भड़क गई, ‘‘आप क्या समझते हैं, घर संभालने, सास की सेवा करने और लेखन कार्य करने मात्र से एक पत्नी के जीवन में खुशियां आ सकती हैं? इस के अलावा उसे और कुछ नहीं चाहिए? आप समझते क्यों नहीं कि एक स्त्री को इस के अतिरिक्त और भी कुछ चाहिए, उसे अपने पति से एक बच्चा भी चाहिए. वह मां बनना चाहती है. मां बन कर ही एक स्त्री को पूर्णता प्राप्त होती है.

‘‘इस घर में क्या हो रहा है, आप को दिखाई नहीं पड़ता? सासूमां मेरे बारे में क्याक्या बोलती रहती हैं, वह भी आप के कानों में नहीं पड़ता, क्योंकि आप ने अपनी आंखें और कान बंद कर रखे हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि मेरे जीवन में आग लगा कर आप इतने निरपेक्ष कैसे रह सकते हैं. आप को पता है कि आप का रोग लाइलाज है परंतु अपनी नामर्दगी की सजा आप मुझे क्यों दे रहे हैं? मैं ने क्या अपराध किया है?’’ बोलतेबोलते स्वाति की आवाज भर्रा गई. वह पलंग पर बैठ कर सुबकने लगी. पीयूष ने उसे चुप कराने का कोई प्रयास नहीं किया और चुपचाप बाहर निकल गया. स्वाति ने नम आंखों से उसे बाहर जाते हुए देखा और उस का हृदय शीशे की तरह चटक गया. पीयूष के प्रति मन घृणा से भर गया. स्वाति की प्रिय सहेली नम्रता उसी के शहर में ब्याही थी. 2 साल का बच्चा था उस का. उस से यदाकदा बात होती रहती थी. उस के बेटे के जन्मदिन पर पीयूष के साथ गई थी. इधर मानसिक परेशानी और उलझनों के कारण उस ने नम्रता को काफी दिनों से फोन नहीं किया था. कुछ सोच कर उस ने नम्रता को फोन किया. हायहैलो के बाद स्वाति ने कहा, ‘‘मैं तुम से मिलना चाहती हूं.’’

‘‘तो आ जाओ न यार, कितने दिन हो गए मिले हुए. मिल कर गपशप मारेंगे और पुरानी यादें ताजा करेंगे.’’

स्वाति जब नम्रता से मिलने गई तो वह उसे देख कर हैरान रह गई, ‘‘यह क्या स्वाति, इतनी कमजोर कैसे हो गई? बीमार थी क्या?’’ ‘‘सब बताऊंगी यार,’’ स्वाति ने फीकी मुसकराहट के साथ कहा. नम्रता का पति सरकारी नौकरी में उच्च पद पर था. उस वक्त वह घर पर ही था. स्वाति से अपने बेटे के जन्मदिन पर मिल चुका था. पहले वाली स्वाति और सामने बैठी स्वाति में जमीनआसमान का अंतर था. उस के चेहरे की चमक कहीं खो गई थी, आंखें कुछ ढूंढ़ती सी लगती थीं. होंठों में जैसे जमानेभर की प्यास भरी हुई थी, परंतु उन की प्यास मिटाने वाला कोई नहीं था. उस के होंठ सूखते जा रहे थे. स्वाति से बोला, ‘‘स्वातिजी, चांद में ग्रहण लगते तो देखा था, परंतु यह पतझड़ कहां से आ गया? आप का खूबसूरत चांद सा मुखड़ा कहीं खो गया है.’’ पीड़ा में भी स्वाति की हंसी फूट पड़ी. अमित की बात सुन कर उस का दर्द जैसे गायब हो गया. उस की तरफ प्यारभरी नजर से देखा और फिर शरमा कर बोली, ‘‘आप तो मेरे ऊपर कविता करने लगे.’’

‘‘अरे नहीं, ये तो तुम्हारे जीवन में बहार बन कर छाने की कोशिश कर रहे हैं. स्वाति, इन से बच कर रहना, ये बड़े दिलफेंक इंसान हैं. सुंदर लड़की देखते ही लाइन मारना चालू कर देते हैं.’’

‘‘ये तो खुद कह रहे हैं कि मैं पतझड़ की मारी हूं. मेरा चांद कहीं खो गया है. ऐसे में मेरे ऊपर क्या लाइन मारेंगे,’’ स्वाति ने दुखी हो कर कहा.

‘‘ऐसा न कहो, ये तो सूखे फूल में भी खुशबू भर देते हैं,’’ नम्रता जैसे अपने पति की पोल खोलने पर आमादा थी. स्वाति शर्म और संकोच में डूबती जा रही थी.

अमित ने पत्नी से कहा, ‘‘तुम इस बेचारी को क्यों परेशान कर रही हो. पहले इस के हालचाल तो पूछो कि इसे हुआ क्या है?’’ दोनों सहेलियां जब एकांत में बैठीं तो स्वाति ने अपने हृदय के सारे परदे उठा दिए, मन की सारी गुत्थियां खोल दीं. कुछ भी न रखा अपने पास. नम्रता की आंखों में आंसू छलक आए, उस की बातें सुन कर. कुछ सुनने के बाद बोली, ‘‘स्वाति, तुम सचमुच स्वाति नक्षत्र की तरह प्यासी हो. कौन जानता था कि एक सुंदर पढ़ीलिखी लड़की के जीवन में इस तरह की काली छाया भी पड़ सकती है. अब तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘नम्रता, तुम मेरी सब से अच्छी सहेली हो, मैं तुम्हारी मदद चाहती हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारे लिए हर संभव मदद करूंगी. बताओ, कैसी मदद चाहती हो?’’

‘‘मैं जानती हूं, जो मैं तुम से मांगने जा रही हूं वह सहज ही किसी पत्नी को मंजूर नहीं होगा, परंतु मैं इस के लिए किसी कोठे पर नहीं बैठ सकती, किसी परपुरुष से संबंध नहीं बना सकती.’’

‘‘तुम क्या चाहती हो?’’ नम्रता ने धड़कते दिल से पूछा. उसे कुछकुछ समझ में आने लगा था.

‘‘मैं अपनी कोख भरना चाहती हूं, मातृत्व प्राप्त करना चाहती हूं.’’

‘‘यह कैसे संभव हो सकता है? तुम्हारा पति…’’

‘‘सबकुछ हो सकता है, मुझे तुम्हारा साथ चाहिए,’’ स्वाति ने उस की बात काट कर कहा. उस के स्वर में उतावलापन था, जैसे अगर जल्दी से अपनी बात नहीं कहेगी तो कभी कह नहीं पाएगी.

‘‘क्या तुम्हारा कोई बौयफ्रैंड है, जिस के साथ…’’ नम्रता ने जानना चाहा.

‘‘अरे नहीं, बौयफ्रैंड पालना मेरे बस का नहीं. किसी परपुरुष से शारीरिक संबंध बनाना हर हाल में खतरनाक होता है. वह जीवनभर के लिए गले की हड्डी बन जाता है. संबंध तोड़ने पर ब्लैकमेल करने लगता है. मैं इतना बड़ा जोखिम उठा कर अपने परिवार को नष्ट नहीं करना चाहती हूं.’’

‘‘तो फिर मैं किस प्रकार तुम्हारी मदद कर सकती हूं?’’ नम्रता ने बेबसी से पूछा.

‘‘बस, कुछ दिन के लिए तुम्हें अपने हृदय पर पत्थर रखना होगा, कुछ दिनों के लिए तुम अपने पति को मुझे उधार दे दो. मैं उन के साथ शारीरिक संबंध बनाना चाहती हूं. जब मेरी कोख भर जाएगी तो मैं उन से अपना संबंध तोड़ लूंगी,’’ स्वाति ने साफसाफ कहा. यह सुन कर नम्रता को चक्कर सा आ गया. वह विस्फारित नेत्रों से स्वाति को देखती रही. मुंह से एक बोल भी न फूटा. स्वाति ने उस के दोनों हाथ पकड़ कर अपने धड़कते सीने पर रख लिए और विनती सी करती बोली, ‘‘तुम मेरी इतनी सी बात मान लो, मैं तुम्हारी जीवन भर एहसानमंद रहूंगी. तुम यह सोच लेना कि जैसे तुम इस बारे में कुछ नहीं जानती हो.’’

नम्रता कुछ पल सोचती सी बैठी रही, फिर अपने हाथों से स्वाति के हाथों को थामते हुए कहा, ‘‘सुन कर बड़ा अजीब सा लग रहा है, बड़ा कठोर निर्णय है यह. एक पत्नी जानबूझ कर अपने पति को दूसरी स्त्री के बिस्तर पर लिटा दे, यह संभव नहीं होता परंतु मैं तुम्हारा दुख समझ रही हूं. उस की कसक अपने दिल में महसूस कर सकती हूं. अच्छा होता अगर तुम बिना बताए मेरे पति को अपने जाल में फंसा लेतीं. पीठपीछे पति क्या करता है, यह जब तक पत्नी को पता नहीं चलता, उसे दुख नहीं होता है.’’

‘‘मैं तुम्हारे साथ विश्वासघात नहीं करना चाहती थी. मैं पूरी सुरक्षा के साथ यह सब करना चाहती हूं. अगर सबकुछ तुम्हारी जानकारी में होगा तो बाद में अमितजी से पीछा छुड़ाना मेरे लिए आसान होगा, वरना कहीं वे भी जीवनभर के लिए पीछे पड़ गए तो…’’ स्वाति ने स्पष्ट किया. नम्रता कुछ पल तक सोचती रही. उस के चेहरे पर तरहतरह के भाव आ रहे थे. स्वाति ने अधीरता से उस के हाथों को कस कर दबा दिया, ‘‘देखो नम्रता, मना मत करना, वरना मेरे जीवन का सारा आधार ढह जाएगा. मैं कहीं की न रहूंगी.’’

‘‘खैर, जब तुम ने मुझे सबकुछ बता ही दिया तो मैं तुम्हारी बात मान कर कुछ दिन के लिए अपने हृदय पर पत्थर रख लेती हूं, परंतु स्वाति, तुम स्वयं अमित को पटाओगी. मैं उन से कुछ नहीं कहूंगी. उन्हें यह बताना भी मत कि मुझे सबकुछ मालूम है. तुम उन से कहां मिलोगी, यह भी तुम तय करना. मुझे मत बताना.’’

स्वाति ने उस का माथा चूम लिया, ‘‘नम्रता, मैं जीवनभर तुम्हें सगी बहन की तरह मानूंगी.’’

स्वाति के लिए अमित को पटाना बहुत आसान सिद्ध हुआ. नम्रता ने सही कहा था कि वह बहुत दिलफेंक इंसान था. स्वाति के 2-3 फोन पर ही अमित उस से मिलने के लिए व्याकुल हो गया. स्वाति स्वयं प्यासी थी, सो उस ने भी सारे बंधन ढीले कर दिए और कटी पतंग की तरह अमित की बांहों में जा गिरी. जिस योजना के तहत स्वाति इस अनैतिक कार्य को अंजाम दे रही थी, वह समयसीमा में बंधा हुआ था. उस कार्य के पूर्ण होने का आभास होते ही उस ने अमित से दूरियां बनानी शुरू कर दीं. अंत में एक दिन उस ने अमित को अपनी मजबूरी बता कर उन से अपने संबंध तोड़ लिए. अमित समझदार पारिवारिक व्यक्ति ही नहीं एक जिम्मेदार अधिकारी भी था. उस ने स्वाति को आजाद कर दिया. गर्भधारण के बाद स्वाति के आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आने लगे थे. सासूमां को समझते देर न लगी कि स्वाति मां बनने वाली है. उन का मनमयूर नाच उठा. जो स्वाति अभी तक उन की आंखों में खटक रही थी, दुश्मन से बढ़ कर नजर आती थी, उस का परित्याग करने के मन ही मन मनसूबे बांध रही थीं. वही अचानक उन की आंखों का तारा बन गई. वह उन के लिए खुशियों का खजाना ले कर जो आने वाली थी. स्वाति की बलैयां लेते हुए सासूजी ने कहा, ‘‘नजर न लगे मेरी बेटी को. कितने दिन बाद तू खुशियां ले कर आई है. दिन गिनतेगिनते मेरी आंखें पथरा गईं. पर चलो, देर से ही सही, तू ने मेरी मुराद पूरी कर दी.’’

शाम को उन्होंने पीयूष से कहा, ‘‘तुझे कुछ पता भी है, बहू पेट से है. उस के लिए अच्छीअच्छी खानेपीने की चीजें ले कर आ. मेवाफल आदि.’’

पीयूष चौंका, ‘‘ऐं…’’ उसे सचमुच पता नहीं था. काफी दिनों से स्वाति और उस के बीच अबोला चल रहा था.

उस ने बड़ी मुश्किल से अपने मन को शांत किया. वह किसी को अपने मन की बात नहीं बता सकता था. कैसे बताता कि स्वाति के पेट में उस का बच्चा नहीं था? उसे यह दंश झेलना ही पड़ेगा. एक परिवार को बचाने और सुखी रखने के लिए यह अति आवश्यक था. वह अपनी मां की खुशियों को आग के हवाले नहीं कर सकता था. पिताजी नहीं थे. मां ही उस की सबकुछ थीं. जब तक जिंदा हैं, उन की खुशियों के लिए उसे भी खुश होने का दिखावा करना पड़ेगा. सासूजी रातदिन स्वाति की सेवा में लगी रहतीं. उस की हर चीज का खयाल करतीं, उसे कोई काम न करने देतीं. परंतु पीयूष उस से उखड़ाउखड़ा रहता, बात न करता. व्यवहार में इतना रूखापन था कि कई बार स्वाति का मन करता कि उस की पोल खोल दे, परंतु परिवार की प्रतिष्ठा और मर्यादा का खयाल कर वह चुप रह जाती. यह कैसी विडंबना थी कि जब तक स्वाति ने मर्यादा के अंदर रहते हुए अपने पति और सासू के लिए खुशियां बटोरनी चाहीं तो उसे दुखों के कतरों के सिवा कुछ न मिला. परंतु जब मर्यादा का उल्लंघन किया, सामाजिक मूल्यों को तोड़ दिया और एक अनैतिक कार्य को अंजाम दिया, तो सासूमां की झोली में खुशियों का अंबार लग गया. नियत समय आने पर स्वाति ने एक बच्ची को जन्म दिया. नर्स नवजात शिशु को तौलिए में लपेट कर लाई और दादी के हाथों में रख कर बोली, ‘‘मुबारक हो, पोती हुई है.’’

सुन कर सासूजी का हृदय धक से रह गया. चेहरे पर स्याही पुत गई. वे बच्ची की तरफ नहीं, नर्स की तरफ अविश्वास भरी नजरों से देख रही थीं, जैसे उस ने बच्चा बदल दिया हो.

नर्स बोली, ‘‘क्या दादीमां, आप मेरा मुंह क्यों ताक रही हैं?’’

‘‘दादीमां शायद सोच रही होंगी, यह लड़की कहां से पैदा हो गई. इन को पोते की चाहत रही होगी,’’ दूसरी नर्स बोली.

पहली नर्स ने कहा, ‘‘दादीमां, आप एक औरत हैं, फिर भी समाज और परिवार के लिए लड़की की महत्ता नहीं समझतीं. इतना जान लीजिए, लड़कों से ज्यादा खुशियां एक लड़की परिवार के लिए ले कर आती है. जब बेटियां घर में रह कर मांबाप की सेवा करती हैं, तब लड़के बाहर जा कर मटरगश्ती करते हैं. आप को तो खुश होना चाहिए कि आप की बहू ने एक बेटी को जन्म दिया है.’’ तीसरे दिन स्वाति बच्चे के साथ घर आ गई. स्वाति के मम्मीपापा और बहन भी साथ ही आए थे. वे बच्ची की छठी होने तक स्वाति के साथ रहना चाहते थे. सभी चाहते थे बच्ची की छठी धूमधाम से मनाई जाए. इन 3 दिनों में पीयूष की मम्मी का मन भी बच्ची की तरफ से साफ हो गया था. नर्सों की बातें उन के हृदय को छू गई थीं. उन्होंने खुशी मन से छठी मनाने की स्वीकृति दे दी परंतु पीयूष ने साफ मना कर दिया कि वह कोई जश्न नहीं मनाएगा. सभी के मुंह लटक गए. कारण पूछा तो बिना कुछ बोले बाहर चला गया. उस के बाहर जाने के बाद पीयूष की मां ने कहा, ‘‘उस के मनाने  न मनाने से क्या होता है. मेरे घर में पोती हुई है, तो जश्न मैं मनाऊंगी. समधीजी, आप सारी तैयारियां करवाएं.’’

रात को पीयूष काफी देर से घर लौट कर आया. सभी लोग उस का इंतजार कर रहे थे. खाना वह बाहर से खा कर आया था. उस ने किसी से बात नहीं की. सब ने खाने के लिए पूछा तो मना कर दिया और चुपचाप ड्राइंगरूम में जा कर बैठ गया. सभी लोगों को उस के इस प्रकार के व्यवहार पर आश्चर्य हो रहा था. परंतु ऐसा वह क्यों कर रहा था, किसी को पता नहीं था. वह किसी को कुछ बता भी नहीं रहा था.

उस के मन की बात तो केवल स्वाति ही जानती थी. सभी लोग अपनेअपने कमरे में चले गए तो स्वाति बच्ची को सुला कर ड्राइंगरूम में आई. पीयूष एक सोफे में आंखें बंद कर के लेटा था. वह सोया नहीं था. विचारों के झोंके उसे सोने नहीं दे रहे थे. स्वाति उस के पैंताने बैठ गई और बोली, ‘‘मैं जानती हूं, आप दुखी हैं और मुझ से नाराज भी हैं, परंतु आप बताइए, इस के अलावा मेरे पास चारा क्या था?’’ आज उस ने अपनी चुप्पी तोड़ दी थी. काफी दिनों बाद वह पीयूष से बोली थी.

पीयूष थोड़ा कसमसाया परंतु बोला कुछ नहीं. स्वाति ने आगे कहा, ‘‘आप बताइए, अगर मैं ऐसा न करती तो क्या जिंदगी भर लांछनों के दाग ले कर घुटघुट कर जीती? मांजी के ताने आप ने नहीं सुने? मैं बांझ नहीं कहलाना चाहती थी और अगर आप से तलाक लेती तो आप की बदनामी होती. मुझे स्पष्ट कारण बताना पड़ता. तब बताइए, क्या आप इस समाज में एक प्रतिष्ठित जीवन जी पाते? आप कौन सा मुंह दुनिया को दिखाते और क्या मांजी पोतापोती का मुंह देखे बिना ही इस संसार से विदा न हो जातीं?’’

पीयूष ने हलके से सरक कर अपना सिर सोफे के पुट्ठे पर रख लिया. आंखें चौड़ी कर के स्वाति को देखा. वह गंभीर थी, परंतु उस की आंखों में एक अनोखी चमक थी.

वह कहती गई, ‘‘आप देख रहे हैं, मेरे एक अमर्यादित कदम से कितने लोगों के हृदय में खुशियों का सागर लहरा रहा है. सभी के चेहरों पर रौनक आ गई है. मांजी की खुशियों का आप अंदाज भी नहीं लगा सकते हैं.’’

पीयूष ने अचानक तड़प कर कहा, ‘‘परंतु एक बच्चे के लिए तुम ने अपनी इज्जत क्यों दांव पर लगाई? क्या हम निसंतान रह कर जीवन नहीं गुजार सकते थे?’’

‘‘गुजार सकते थे, परंतु तब मैं जीवनभर अपने माथे पर बांझ होने का कलंक ले कर जीती. उसे मिटा नहीं सकती थी. सासूजी जब तक जीतीं, उन के ताने झेलती. दुनियाभर की शक्की निगाहों के वार झेलती. आप को नहीं पता, वे तो मुझे तलाक दिलवा कर आप की दूसरी शादी तक करने की बात भी सोच रही थीं. क्या आप उन की खुशी के लिए दूसरी लड़की की जिंदगी बरबाद करते? आप शांत मन से सोचिए, यह बात केवल हम दोनों को मालूम है. ‘‘इस बच्ची को आप एक बार अपना मान कर देखिए, फिर उस के पालनेपोसने में जो खुशी आप को प्राप्त होगी वह किसी और चीज में नहीं प्राप्त हो सकती?’’

‘‘परंतु यह बच्ची मेरी नहीं है. इस में मेरा खून कहां है?’’ उस ने तर्क दिया.

‘‘इसे दत्तक पुत्री समझ कर ही अपनी मान लीजिए. इस बच्ची के शरीर में कम से कम मेरा खून तो है.’’

‘‘परंतु मैं अपने मन को कैसे समझाऊं?’’ पीयूष ने हताश स्वर में कहा.

स्वाति ने आगे सरक कर उस के सीने पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘आप को दुखी होने की आवश्यकता नहीं है. ऐसा करने में ही हम दोनों की भलाई थी. अब समाज में हम इज्जत के साथ जी तो सकते हैं.’’

पीयूष ने तर्क दिया, ‘‘परंतु मुझे मानसिक कष्ट हुआ है.’’

‘‘सच है, परंतु आप का मानसिक कष्ट मेरे कष्ट से बढ़ कर नहीं है. अपनी कमजोरी के बारे में जानते हुए भी आप ने मेरे साथ शादी की और मुझे तानों, उलाहनों और लांछनों की आग में जलने के लिए छोड़ दिया. खैर, जो भी हुआ उसे भूल जाने में ही भलाई है. आप अपनी सापेक्ष सोच से अपने गमों को खुशियों में बदल सकते हैं.’’ पीयूष की सोच कुछकुछ बदलने लगी थी. स्वाति की नरम उंगलियां अब पीयूष के गालों को हौलेहौले सहला रही थी. काफी रात हो चुकी थी वह आंखें बंद कर के बोली, ‘‘मैं आप को विश्वास दिलाती हूं कि अब मेरे कदम कभी नहीं डगमगाएंगे. आप की उपेक्षा और मांजी के तानों से ऊब कर ही मैं ने बहुत कड़े मन से यह कदम उठाया था. अगर मैं ऐसा न करती तो आप की कमजोरी सभी को पता चल जाती या मैं जीवनभर बांझ औरत की लांछना ले कर जीने को मजबूर रहती. आप की इज्जत बची रहे और मेरे ऊपर लगे सारे लांछन मिट जाएं, इसलिए मुझे परपुरुष की बांहों का सहारा लेना पड़ा,’’ कहतेकहते स्वाति का स्वर भावुक हो गया. पीयूष ने अपने गालों पर उस की उंगलियों को थाम लिया और अगले ही क्षण स्वाति को खींच कर सीने से लगा लिया. आज की उजली भोर उस के लिए आशा की नई किरण ले कर आई थी.

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