समीरा की पहली ऐनिमेशन फिल्म के पुरस्कृत होने पर उसे बधाई देने उस के सहपाठी अनंत के साथ उस का दोस्त मयंक भी आया था. ‘‘मयंक सुबह ही मुंबई से आया है… मेरे पास ठहरा है,’’ अनंत ने कहा, ‘‘तुम्हें मुबारक देने आना जरूरी था, लेकिन मयंक को अकेला कैसे छोड़ता, इसलिए साथ ले आया.’’

‘‘बहुत अच्छा किया. मुझे भी इन से मिल कर अच्छा लगा,’’ समीरा मयंक की ओर मुड़ी, ‘‘वैसे दिल्ली किस सिलसिले में आना हुआ?’’ ‘‘नौकरी की तलाश में…’’

‘‘बेहतर नौकरी की तलाश कह यार,’’ अनंत ने बात काटी, ‘‘यह उस लोकप्रिय टीवी चैनल में प्रोग्राम प्लैनर है, जिस के सीरियल वर्षों तक चलते हैं और भाई को कुछ नया करने को नहीं मिलता. इसीलिए चैनल बदल रहा है.’’ ‘‘अच्छा तो आप भी हमारी ही बिरादरी के हैं.’’ ‘‘जी हां, तभी तो अनंत से दोस्ती है.’’

‘‘तुम्हारे से भी हो सकती है अगर तुम इसे भी इनाम मिलने की खुशी की दावत में शामिल कर लो,’’ अनंत ने कहा, ‘‘और मुझे तो दावत आज ही चाहिए समीरा.’’ ‘‘जरूर. पहले घर पर ही सीता काकी के बनाए गाजर के हलवे से मुंह मीठा करो, फिर खाना खाने बाहर चलेंगे,’’ समीरा चहकी.

फिर कुछ ही देर में एक प्रौढ़ महिला चाय और नाश्ता ले आई. ‘‘मजा आ गया,’’ मयंक ने नाश्ता करते हुए कहा, ‘‘बाहर कहीं खाने जाने के बजाय घर पर ही क्यों न खाना खाएं अनंत? भई मैं तो रोजरोज बाहर खाना खा कर आजिज आ चुका हूं.’’

‘‘अगर समीरा को खिलाने में परेशानी न हो तो मैं भी बाहर के बजाय घर पर ही अरहर की दाल और चावल खाना पसंद करूंगा.’’ ‘‘बिटिया को काहे की परेशानी? मैं हूं न सब बनाने को,’’ सीता काकी बोली, ‘‘दालचावल के साथ और क्या बनाऊं?’’

‘‘भुनवा आलूप्याज का रायता और रोटी,’’ कह कर मयंक समीरा की ओर मुड़ा, ‘‘सीता काकी तुम्हारे साथ ही रहती हैं समीरा?’’ ‘‘हां, काकी के रहने से घर वाले भी निश्चिंत हो गए हैं.’’

‘‘यानी अब शादी का तकाजा नहीं करते?’’ मयंक ने चुटकी ली. ‘‘उस का अभी सवाल ही नहीं उठता… मेरे बड़े भाई की शादी के बाद मेरी तरफ ध्यान देंगे… भैया सिर्फ मेरी पसंद की लड़की से शादी करेंगे और फिलहाल तो मैं अपने कैरियर में पैर जमाने में इतनी व्यस्त हूं कि भैया के लिए लड़की पसंद करने की फुरसत ही नहीं है.’’

‘‘भैया तुम्हारी पसंद की लड़की ही क्यों चाहते हैं?’’ अनंत ने पूछा. ‘‘क्योंकि मम्मीपापा के बाद हम दोनों भाईबहन ही एकदूसरे का सहारा होंगे, इसलिए हमारे जीवनसाथी हमारी पसंद के होने चाहिए. भैया ने किताबीकीड़ा होने की वजह से कभी लड़कियों में दिलचस्पी नहीं ली, मगर अब पत्नी ऐसी चाहते हैं, जो घरपरिवार के साथसाथ उन के बिजनैस का भी दायित्व संभाले और सोसायटी में उभरते उद्योगपति की सुंदर, स्मार्ट पत्नी भी लगे.’’

‘‘लगता है आप की फैमिली भी मेरे परिवार की ही तरह सोचती है,’’ मयंक ने कहा, ‘‘बड़े भैया के लिए लड़की दीदी और मैं पसंद करेंगे और मेरी बीवी सिर्फ भाभी, क्योंकि परिवार की संयुक्तता तो देवरानीजेठानी के तालमेल पर ही निर्भर करती है.’’ ‘‘तेरा तो यार दिनरात लड़कियों से पाला पड़ता है… कोई पसंद आ गई तो क्या करेगा?’’ अनंत ने चुटकी ली.

‘‘तभी तो लड़कियों से हायबाय तक बहुत संभल कर करता हूं… खड़ूस, नकचढ़ा, अकड़ू न जाने कितने उपनाम हैं मेरे… भाभी आ जाएं फिर आंखों से मांबहन का चश्मा उतार कर आसपास देखूंगा कि कोई भाभी की कसौटी पर उतरने लायक है या नहीं,’’ मयंक हंसा. दोनों दोस्तों ने चटखारे लेले कर खाना

खाया और फिर मयंक ने कहा, ‘‘पेट तो भर गया काकी, लेकिन आंखें नहीं भरीं… कल वापस मुंबई जा रहा हूं, लेकिन जब भी आऊंगा खाना यहीं खाऊंगा.’’ कुछ सप्ताह के बाद अनंत ने बताया कि मयंक रविवार सुबह दिल्ली आ रहा है.

‘‘उफ, शुक्रवार शाम को मैं आगरा जा रही हूं,’’ समीरा के मुंह से बेखास्ता निकला, ‘‘भैया के लिए एक रिश्ता आया है… लड़की भैया के लिए उपयुक्त है, लेकिन रिश्ता पक्का मेरे पसंद करने के बाद होगा. इसलिए मेरा जाना जरूरी है.’’ ‘‘वापस कब आओगी?’’

‘‘रविवार की रात को. अगर किसी रस्मवस्म के लिए रुकना पड़ा तो सोमवार को.’’ ‘‘रस्म दिन में करवा कर रविवार की शाम को ही वापस आ जाओ,’’ अनंत ने आग्रह किया, ‘‘मयंक तुम्हारे न होने पर सोचेगा कि मैं ने तुम्हें उस का संदेशा नहीं दिया.’’

‘‘कौन सा संदेशा?’’ समीरा के दिल की धड़कनें तेज हो गई. ‘‘होमली फील करने के लिए शाम तुम्हारे घर गुजारेगा.’’

थोड़ी सी मायूसी तो हुई, मगर फिर सोचा कि अनंत से और क्या कहलवाता? इतना इशारा तो कर ही दिया कि मेरा घर अपना सा लगता है. ‘‘मैं रविवार की शाम तक जरूर आ जाऊंगी,’’ समीरा ने कह तो दिया, मगर वह जानती थी कि अगर शादी तय हो गई तो जल्दी लौटना नहीं हो सकेगा. वह रास्ते भर इसी बारे में सोचती रही.

‘‘सुनील को मधुलिका का विवरण और फोटो इतना अच्छा लगा कि उस ने और जगह मना करवा दिया. कहने लगा कि मेरी पसंद समीरा को भी जरूर पसंद आएगी,’’ मैं ने बताया तभी मधुलिका के मामा जो रिश्ता करवा रहे थे का फोन आया, ‘‘देखिए, कृपाशंकरजी आप के इस आश्वासन पर कि आज आप की बेटी आ जाएगी मैं ने देवराज जीजाजी को सपरिवार बुला लिया है…’’ ‘‘मेरी बेटी आ गई है, राघवजी,’’ कृपाशंकर ने बात काटी, ‘‘शाम को मिल लें.’’

‘‘दोपहर को लंच पर आ जाएं ताकि शाम तक तय हो जाए,’’ राघव ने कहा, ‘‘असल में एक अजीब सी शर्त है मधु की शादी के लिए… उसे भरीपूरी क्लोजनिट फैमिली चाहिए. ऐसे ही एक और परिवार का प्रस्ताव भी है जीजाजी के पास… अगर आप के यहां बात नहीं बनती तो जीजाजी उन लोगों से तुरंत मिलना चाहते हैं. इसीलिए जल्दी में हैं.’’ ‘‘देखिए, हम ने तो तसवीर पसंद कर के ही मिलने का फैसला किया है,’’ स्पष्टवादी पापा ने कहा, ‘‘समीरा की व्यवस्तता के कारण मिलने में देर हो गई. खैर, लंच पर मिलते हैं.’’

समीरा ने राहत की सांस ली. दूसरी पार्टी भी जल्दी में है, इसलिए रोके की रस्म तो आज ही हो जानी चाहिए ताकि काम का बहाना बना कर वह कल ही दिल्ली लौट आए. मधुलिका तसवीर से भी अधिक आकर्षक थी. तटस्थ लगने की कोशिश करने के बावजूद सुनील की मुखमुद्रा से तो लग रहा था कि वह उस पर मर मिटा है.

मधुलिका का छोटा भाई मोहित समीरा से बड़ी दिलचस्पी से ऐनिमेशन फोटोग्राफी के बारे में पूछ रहा था. ‘‘लगता है फोटोग्राफी का बहुत शौक है तुम्हें?’’ समीरा ने पूछा.

‘‘हमारे यहां सभी को फोटोग्राफी का शौक है. मधु दीदी से तो पापा ने एमबीए करने के बजाय फोटोग्राफी का प्रोफैशनल कोर्स करने को कहा भी था.’’ ‘‘फिर आप ने किया क्यों नहीं? समीरा ने मधुलिका से पूछा.’’

‘‘उस में एक तरह से यायावर बनना पड़ता है और मुझे भरेपूरे परिवार में रहना पसंद है.’’ ‘‘लेकिन परिवार में रहते हुए तो आप की अपनी प्रतिभा का पूर्ण विकास नहीं हो सकता?’’

‘‘अकेले रहते हुए या कहिए आज की न्यूक्लीयर फैमिली में केवल व्यावसायिक पहलू को ही प्राथमिकता मिलती है. दूसरी सभी योग्यताएं या शौक तो समय की कमी या समझौतों की बलि चढ़ जाते हैं. दहेज या रूढि़वादी वाले मामलों को छोड़ दें तो संयुक्त परिवारों में रहने वालों के न्यूक्लीयर फैमिलीज में अधिक तलाक होते हैं,’’ मधुलिका मुसकराई, ‘‘वैसे अगर आप में प्रतिभा है और आप को संतुलित वातावरण मिलता है तो फिर आप की प्रतिभा को कहीं भी निखरने में देर नहीं लगेगी.’’ ‘‘फैमिली और प्रोफैशनल लाइफ क्लैश

नहीं करेंगी?’’ ‘‘अगर आप दोनों में तालमेल बना कर रखें तो कभी नहीं. मगर यह तभी हो सकता है जब आप को दोनों से प्यार हो.’’

‘‘लगता है खुश रखोगी मेरे भैया को,’’ समीरा मुसकरा कर बोली. ‘‘मैं किसी व्यक्ति विशेष की खुशी में नहीं पूरे परिवार की खुशी में यकीन रखती हूं,’’ मधुलिका ने बड़ी बेबाकी से कहा.

समीरा कहां हार मानने वाली थी. बोली, ‘‘वह व्यक्ति विशेष भी परिवार के खुश होने पर ही खुश होगा…’’ ‘‘और परिवार व्यक्ति विशेष के खुश होने पर,’’ मधुलिका ने बात काटी, ‘‘दोनों एकदूसरे के पूरक जो हैं.’’

तभी खाने का बुलावा आ गया. खाना बढि़या था. सभी ने बहुत तारीफ करी. ‘‘खाने की नहीं, हमारी बिटिया की बात करिए वह पसंद आई या नहीं?’’ राघव ने पूछा.

‘‘उसे तो नपसंद करने का सवाल ही नहीं उठता अंकल,’’ समीरा चहकी. ‘‘जी हां, आप की बिटिया अब हमारी है देवराजजी,’’ कृपाशंकर ने जोड़ा.

‘‘तो फिर रोके की रस्म कर दें?’’ ‘‘कल शाम को करेंगे खूब धूमधाम से… मैं ने इवेंट मैनेजमैंट वालों से बात की हुई है. अभी फोन पर कह देता हूं कि शानदार समारोह का आयोजन शुरू कर दें हमारे बगीचे में… आप लोग भी अपने परिचितों को आमंत्रित कर लीजिए राघवजी… एक ही बेटा है हमारा. अत: इस की शादी की छोटी से छोटी रस्म भी बड़े धूमधड़ाके से होगी.’’

समीरा चौंक पड़ी कि तो फिर वह कल सुबह दिल्ली कैसे जाएगी? कल शाम को तो उसे जैसे भी हो दिल्ली में रहना ही है. ‘‘यह रोके की रस्म इतनी हड़बड़ाहट में करने की क्या जरूरत है पापा? पहले लड़के और लड़की को 1-2 बार आपस में मिलने, बात करने दीजिए,’’ समीरा बोली, ‘‘फिर अगले सप्ताहांत इतमीनान से तैयारी कर के दावत और रोका करिएगा.’’

‘‘अगले सप्ताहांत तक हम यहां नहीं रुक सकते,’’ मधुलिका की मां बोलीं, ‘‘ये तो आज शाम को ही निकलना चाह रहे हैं, क्योंकि सोमवार को इन की जरूरी मीटिंग है और मोहित का प्रोजैक्ट प्रेजैंटेशन.’’ ‘‘तो शाम को निकल जाओ आंटी, मैं भी कल जा रही हूं. अगले सप्ताहांत हम सब फिर आ जाएंगे दावत और रस्म के लिए,’’ समीरा चहकी.

‘‘तो फिर तुम्हारे लड़केलड़की को अकेले मिलवाने के प्रस्ताव का क्या होगा?’’ राघव बोले. ‘‘लड़की को रोक लो अंकल और अगर यह नहीं हो सकता तो भैया को जयपुर घूमने भेज दो,’’ समीरा ने सुझाव दिया.

‘‘यह बढि़या रहेगा,’’ देवराज ने कहा, ‘‘हम तो आप को जयपुर बुलाना चाहते ही हैं अपने गरीबखाने पर.’’ ‘‘हम फिर कभी आएंगे देवराजजी… फिलहाल तो सुनील अकेला ही आएगा,’’ कृपाशंकर ने कहा.

‘‘मैं भी नहीं जा सकता पापा… अगले सप्ताह प्रदूषण नियंत्रण विभाग वाले फैक्टरी का निरीक्षण करने आ रहे हैं,’’ सुनील बोला. ‘‘ज्यादा भाव मत खाओ भैया… पापा हैं न संभाल लेंगे सब,’’ समीरा बोली.

‘‘नहीं समीरा, मुझे प्रदूषण नियंत्रण के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है,’’ कृपाशंकर बोले. ‘‘भैया से समझ लेना पापा… अभी तो चलिए… इन लोगों को भी आज ही जयपुर के लिए निकलना है,’’ समीरा उठ खड़ी हुई, ‘‘अगले सप्ताह रोके की दावत पर मिलेंगे.’’

समीरा को लगा कि सुनील और मम्मी रोके की रस्म टलने से खुश नहीं हैं, लेकिन इस समय तो उसे केवल अपनी खुशी से मतलब था जो दिल्ली जा कर मयंक से मिलने पर ही मिलेगी.

रास्ते में ही मम्मीपापा दावत की रूपरेखा बनाने लगे जो घर पहुंचने तक बहस में बदल गई. दावत में गानेबजाने के आयोजन पर दोनों में मतभेद था. इस से पहले कि बहस झगड़े में बदलती फोन की घंटी बजी. सुनील बराबर के कमरे में फोन सुनने चला गया.

‘‘बांसुरी बनने से पहले ही बांस नहीं रहा, इसलिए आप लोग भी शांत हो जाएं. देवराजजी का फोन था, खेद प्रकट करने को कि मधुलिका का रिश्ता मुझ से नहीं करेंगे, सुनील ने सपाट स्वर में कहा.’’ ‘‘ऐसे कैसे नहीं करेंगे?’’ समीरा आवेश में चिल्लाई, ‘‘मैं पूछती हूं उन से वजह.’’

‘‘उन्होंने वजह बता दी है जो तुम सुन नहीं सकोगी.’’

‘‘क्यों नहीं सुन सकूंगी, बताओ तो?’’ ‘‘उन का कहना है कि हमारे घर में मम्मीपापा या मेरी नहीं सिर्फ तुम्हारी मरजी चलती है समीरा. बहन के इशारों पर चलने वाले वर को वह अपनी बेटी नहीं देंगे और आज जो हुआ है उसे देखते हुए उन का सोचना सही है,’’ सुनील का स्वर तल्ख हो गया.

‘‘तू ठीक कहता है, समीरा ही तो फैसले ले रही थी सब की बात काट कर,’’ मम्मी ने कहा. ‘‘अगर मेरे फैसले गलत थे तो आप सही फैसले ले लेतीं न उसी समय… एक तो सब कामधाम छोड़ कर यहां आओ और फिर बेकार के उलाहने सुनो,’’ समीरा मुंह बना कर अपने कमरे में चली गई.

कुछ देर के बाद मम्मी ने यह कह कर वातावरण हलका करना चाहा कि शादीब्याह संयोग से होते हैं, किसी के कहने या चाहने से नहीं. सुनील भी यथासंभव सामान्य व्यवहार करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन लग रहा था कि उसे गहरा आघात लगा है, जिस से उबरने में समय लगेगा. लेकिन समीरा खुश थी कि उसे अब दिल्ली जाने से कोई रोकेगा नहीं. दिल्ली लौटने पर उम्मीद से ज्यादा खुशी मिल गई. मयंक ने बताया कि उसे नौकरी मिल गई है. ‘‘जौइन कब करोगे?’’

‘‘कल गाड़ी और फ्लैट की चाबियां भी मिल जाएंगी, मगर अभी अनंत के पास ही रहूंगा… मुंबई से सामान लाने के बाद अपने फ्लैट में शिफ्ट करूंगा.’’ ‘‘फ्लैट है कहां?’’ समीरा ने उत्सुकता

से पूछा. ‘‘तुम्हारे पड़ोस यानी डिफैंस कालोनी में, लेकिन अगर दूर भी होता तो भी चलता, क्योंकि जब मिलना हो तो फासलों से कुछ फर्क नहीं पड़ता.’’

‘‘मिलने पर फर्क फासलों से नहीं फुरसत से पड़ता है यार,’’ अनंत बोला. ‘‘यह भी तू ठीक कहता है,’’ मयंक ने उसांस ले कर कहा, ‘‘क्योंकि जौइन करने से पहले ही चेतावनी मिल गई है कि किसी प्रोग्राम की ऐडवांस प्लैनिंग मत करना.’’

समीरा को अनंत का टोकना अच्छा नहीं लगा. ‘‘मगर बगैर ऐडवांस प्लैनिंग के फुरसत का मजा तो उठा सकते हैं?’’

‘‘दैट्स द स्पिरिट समीरा, वी आलवेज कैन,’’ मयंक फड़क कर बोला, ‘‘अनंत कह रहा था तुम अपने भैया के लिए लड़की देखने गई थीं.’’ समीरा सकपका गई. बोली, ‘‘मगर भैया फिलहाल शादी करने के मूड में ही नहीं हैं.’’

जाने से पहले मयंक ने कहा कि वह कल शाम को फोन करेगा, लेकिन उस का फोन 10 दिन बाद आया, ‘‘माफ करना, मैं जाने से पहले तुम्हें फोन नहीं कर सका. बौस ने राजस्थान में लोकेशन हंटिग का प्रोग्राम बना लिया और हम लोग अगली सुबह ही निकल गए,’’ मयंक ने बताया, ‘‘वहीं से घर चला गया, प्रियंक भैया की सगाई थी. फिर मुंबई से अपना सामान भी ले आया. अब अपने फ्लैट में हूं. शाम को आऊंगा तुम्हारे घर.’’

‘‘यह किस खुशी में?’’ समीरा ने पूछा. ‘‘प्रियंक भैया की सगाई और अपनी लाइन क्लीयर होने की खुशी में.’’

उस के बाद अकसर दोनों की मुलाकातें होने लगीं. फोन पर भी लंबीलंबी बातें होतीं, लेकिन शालीनता की परिधि में. कुछ महीने बाद मयंक भाई के विवाह के लिए गया तो समीरा को 1 सप्ताह काटना असहाय हो गया. वह भी आगरा चली गई. मयंक की याद या सुनील भैया का ठंडा व्यवहार और मां की अनमयंस्कता के कारण उसे घर में अच्छा नहीं लग रहा था. ‘‘भैया के लिए कोई लड़की नहीं देख

रहीं मां?’’ ‘‘देखूं तो तब जब सुनील शादी के लिए तैयार हो.’’

‘‘मैं करवाती हूं भैया को तैयार,’’ और फिर समीरा ने सुनील से बात करी. ‘‘मेरी बजाय तू अपनी शादी रचवा समीरा, फिर मैं अपनी शादी की सोचूंगा,’’ सुनील ने सपाट स्वर में कहा.

समीरा ने कहना तो चाहा कि सच भैया पर कह न पाई. ‘अब जब मयंक की लाइन भी क्लीयर हो गई है तो मैं ही अपना ब्याह रचा लेती हूं,’ समीरा सोचने लगी. मयंक के लौटने के बाद उस ने उसे बताया कि भैया उस की शादी के बाद ही शादी करेंगे. अत: अब घर वाले उस की शादी जल्दी करना चाहते हैं.

‘‘किस से?’’ ‘‘तुम चाहो तो तुम से भी हो सकती है.’’

‘‘तो करवाओ जल्दी से. मैं ने भाभी को तुम्हारे बारे में बता दिया है. उन का कहना है कि लड़की के यहां से प्रस्ताव भिजवाओ. सगाई, शादी मैं आननफानन में करवा दूंगी. भाभी बहुत ही समझदार, स्नेहमयी और सुलझी हुई हैं और मेरे खयाल में तुम भी वैसी ही हो. खूब पटेगी तुम दोनों में. लेकिन यह बात मैं स्वयं घर वालों को नहीं बता सकता. तुम्हारे घर से प्रस्ताव आने के बाद तो कह सकता हूं कि काम के सिलसिले में तुम से मिलता रहता हूं. तुम हमारे परिवार के लिए उपयुक्त हो,’’ मयंक बोला.

‘‘मैं भी स्वयं घर वालों से तुम्हारे घर प्रस्ताव भेजने को नहीं कह सकती, मगर फोन पर तुम्हारी बात सुनील भैया से करवा सकती हूं.’’

‘‘हां, करवा देना,’’ मयंक बोला. उस के बाद सब बहुत तेजी से हुआ. मोबाइल पर संपर्क, ईमेल से फोटो और विवरण और फिर मयंक के पिता जनक का फोन आया, ‘‘लड़कीलड़के की मुलाकात की जरूरत न सही, लेकिन मयंक की मां और भाभी का लड़की से मिलना तो जरूरी है. खासकर मयंक की भाभी का. देवरानीजेठानी में तालमेल होना आवश्यक है कृपाशंकरजी ताकि हमारे बाद हमारे बच्चे हिलमिल कर रहें.’’

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. आगरा या दिल्ली में आप का स्वागत है और अगर आप को आने में कोई परेशानी है, तो मैं सपरिवार पुणे आ जाता हूं.’’ ‘‘इतनी परेशानी उठाने की जरूरत नहीं है. मयंक की मां और भाभी दिल्ली जा रही हैं मयंक के पास. आप भी अपनी पत्नी को वहां भेज दीजिए. समीरा से मिलने के बाद अगर मेरी बड़ी बहू उसे पसंद कर लेगी तो मैं भी आ जाऊंगा और आप भी आ जाना.’’

कृपाशंकर ने यह बात समीरा को बताई. ‘‘मयंक की बेसब्री देख कर तो लग रहा था कि यह मिलनामिलाना महज एक औपचारिकता है. रिश्ता तो पक्का है, लेकिन उस के पिताश्री के अनुसार उन की बड़ी बहू की सहमति ही सर्वोच्च होगी. असलियत क्या है?’’

‘‘मयंक अपनी भाभी को मेरे बारे में बता चुका है और उन्होंने चट मंगनी पट शादी करवाने का आश्वासन दिया है,’’ समीरा ने शरमाते हुए कहा. ‘‘लेकिन किसी कारण अगर भाभी ने तुझे पसंद न किया तो मयंक क्या करेगा?’’

‘‘यह तो मयंक से पूछना पड़ेगा पापा.’’ ‘‘पूछने की क्या जरूरत है समीरा?’’ सुनील पहली बार बोला, ‘‘तू भी मधुलिका वाली हिम्मत दिखाना. भाभी के असहमत होने पर अपना प्यार ठुकराने वाले युवक से तू स्वयं ही रिश्ता तोड़ लेना,’’ सुनील तुरंत बोला.

समीरा चौंक पड़ी कि भैया अभी तक मधुलिका को भूले नहीं हैं. ‘‘सुनील ठीक कह रहा है. भाभी के आज्ञाकारी देवर से तो तेरी निभने से रही तो बेहतर रहेगा रिश्ता जुड़ने से पहले ही तोड़ ले,’’ मां ने कहा.

समीरा को उन का नकारात्मक रवैया अच्छा तो नहीं लगा लेकिन चुप ही रही. मां उस के साथ दिल्ली आ गई. शाम को मयंक मां और भाभी के साथ आने वाला था, इसलिए समीरा औफिस से जल्दी आ गई. मां मेहमानों के लिए नाश्ता लाने ड्राइवर के साथ बाजार चली गईं. तभी दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजे पर मधुलिका को देख कर समीरा चौंक पड़ी. वेशभूषा से लग रहा था कि उस की शादी हो चुकी है. ‘‘अचानक आने के लिए माफी चाहती हूं समीरा, लेकिन तुम से अकेले में मिलना जरूरी था. मैं मयंक की भाभी हूं.’’

‘‘अच्छा… आइए बैठिए,’’ समीरा समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे. ‘‘तुम ने रोके की रस्म रविवार को इसलिए नहीं होने दी थी कि उस रोज तुम्हें दिल्ली में मयंक से मिलना था?’’ मधुलिका ने बगैर किसी भूमिका के पूछा.

‘‘जी… हां मगर आप को कैसे मालूम?’’ समीरा हकलाई. ‘‘अटकल से,’’ मधुलिका हंसी, ‘‘मयंक ने विस्तार से तुम से पहली और अगली मुलाकात का समय व तारीख बताई थी. फिर जब तुम्हारी तसवीर देखी तो 2 और 2 जोड़ कर 44 बनाना मुश्किल नहीं था. ऐनी वे, ऐवरी थिंक इज फेयर इन लव ऐंड वार वैसे भी मुझे तो इस से फायदा ही हुआ है. पुणे तो खैर आगरा से बेहतर जगह है ही और प्रियंक की कंपनी भी बड़ी है, जिस में मेरी प्रतिभा और क्षमता का पूर्णतया विकास हो सकेगा. सुनील को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती, इसलिए प्रियंक से उस की तुलना नहीं करूंगी, लेकिन प्रियंक और उस के परिवार के साथ मैं बेहद खुश हूं और इस का श्रेय तुम्हारे और मयंक के प्यार को देती हूं. मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई कड़वाहट नहीं है.’’

‘‘लेकिन मेरे भैया के दिल में तो मेरे लिए है,’’ समीरा ने रोंआसे स्वर में कहा और फिर सब बता दिया. ‘‘जैसी पत्नी तुम्हारे भैया चाहते हैं, वैसी ही एक सहेली है मेरी. तुम्हारी शादी में दोनों की मुलाकात करवा दूंगी…’’

‘‘लेकिन मेरी शादी होने देंगी आप मयंक से?’’ समीरा ने हैरानी से पूछा, ‘‘सब पर अपनी मरजी थोपने वाली लड़की को आप अपनी देवरानी बनाएंगी?’’

‘‘जरूर बनाऊंगी समीरा, क्योंकि मुझे मालूम है कि उस ने मनमरजी क्यों की थी और फिर मयंक भी यह विश्वास होने पर ही कि लड़की स्वर्था उस के परिवार के उपयुक्त है उस से शादी कर रहा है,’’ मधुलिका ने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘जीवन में खुश रहना है समीरा तो बगैर किसी पूर्वाग्रह या कड़वी यादों के जीना सीखो. भूल जाओ तुम कभी मुझ से मिली थीं. तुम्हारी मम्मी कहां हैं उन से भी एक विनती करनी है.’’

‘‘मैं भला तुम्हारे लिए क्या कर सकती हूं?’’ मां का स्वर सुन कर दोनों चौंक पड़ीं. ‘‘तुम्हें आता देख मैं बाजार गई ही नहीं. दरवाजे के बाहर खड़ी तुम्हारी बातें सुन रही थी.’’

‘‘तो फिर तो आप समझ ही गई होंगी कि आप भी मुझ से अजनबी बन कर मिलेंगी और आप के परिवार के अन्य सदस्य भी… अपने मायके वालों को भी मैं आगरा वाली बात भूलने को कह दूंगी.’’ ‘‘ठीक है बिटिया. दुख तो रहेगा कि तुम मेरी बहू न बन सकीं, मगर यह तसल्ली भी रहेगी कि मेरी बेटी को ससुराल में तुम्हारे जैसी सहृदया जेठानी मिल रही है,’’ मां ने विह्वल स्वर में कहा.

‘‘सहृदया ही नहीं, सुलझी हुई और संतुलित भी हैं मम्मी,’’ समीरा धीरे से बोली.

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