मनोज अपनी मां को गांव से ले तो आया पर मां बहू की गृहस्थी में अपनापन न पा सकीं. उन्होंने थोड़ी हिम्मत दिखा कर समाज सेवा और स्वार्जन का काम कर बहू को चाहे नाराज कर दिया, पर घर में अपनी स्वतंत्र जगह बना ली. एक दिन रास्ते में रेणु भाभी मिल गईं.  बड़ी उदास, दुखी लग रही थीं. मैं  ने कारण पूछा तो उबल पड़ीं. बोलीं, ‘‘क्या बताऊं तुम्हें? माताजी ने तो हमारी नाक में दम कर रखा है. गांव में पड़ी थीं अच्छीखासी. इन्हें शौक चर्राया मां की सेवा का. ले आए मेरे सिर पर मुसीबत.

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