आशीष बेतरह उदास था. मां की तस्वीर के आगे चुपचाप सिर झुकाए बैठा था. बार-बार आंखें आंसुओं से छलछला उठती थीं. बाइस साल के इकलौते बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना पाले मां ने अचानक ही आंखें मूंद ली थीं. उनके जाने का किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था. न आशीष को, न उसके पापा संजीव को और न ही परिवार के अन्य सदस्यों को. आज मां की तेरहवीं थी. बैठक के कमरे में सोफे हटा कर जमीन पर गद्दे डाल सफेद चांदनी बिछा दी गयी थी. सामने एक छोटी मेज पर मां फोटो में मुस्कुरा रही थी. पापा बार-बार उसके आसपास अगरबत्तियां लगा रहे थे. दरअसल इस बहाने से वो अपने आंसुओं को दूसरों की नजरों से छिपा रहे थे. अभी कल तक तो भली-चंगी थी. कभी ब्लडप्रेशर तक चेक कराने की जरूरत नहीं पड़ी, और अचानक ही ऐसा कार्डिएक अटैक पड़ा कि डॉक्टर तक बुलाने की फुर्सत नहीं दी उसने. खड़े-खड़े अचानक ही संजीव की बाहों में झूल गयी. संजीव चीखते रह गये, ‘रागिनी, रागिनी… आंखें खोलो… क्या हुआ… आंखें खोलो रागिनी…’ मगर रागिनी होती तब तो आंखें खोलती… वह तो एक झटके में अनन्त यात्रा के लिए प्रस्थान कर चुकी थी. पापा की चीखें सुन कर आशीष अपने कमरे से बदहवास सा भागा आया… पापा मां को तब तक जमीन पर लिटा चुके थे. आशीष ने भी मां को झकझोरा, मगर मां जा चुकी थी. जिसने भी सुना आश्चर्यचकित रह गया. कितनी भली महिला थी. हर वक्त हंसती-मुस्कुराती रहती थी. कभी किसी ने रागिनी को ऊंची आवाज में बात करते नहीं सुना था. मधुर वाणी, शालीन व्यवहार वाली रागिनी हरेक की मदद के लिए हर वक्त तैयार रहती थी. घर को तो उसने स्वर्ग बना कर रखा था. पति संजीव और बेटे आशीष पर उसका स्नेह हर वक्त बरसता था. दोनों ही उसके प्रेम की डोर में बंधे जीवन-आनन्द में डूबे थे कि अचानक ही यह डोर टूट गयी.

बैठक में काफी लोग जमा थे. सभी के चेहरों पर उदासी थी. बड़े-बूढ़े बारी-बारी से आकर आशीष के सिर पर हाथ फेर कर उसे सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे. अचानक एक हाथ आशीष के सिर पर काफी देर तक रुका रहा. आशीष ने सिर उठा कर पास खड़े सज्जन का चेहरा देखा तो एकटक देखता ही रह गया. वो हू-ब-हू उसकी ही तरह दिख रहे थे, बल्कि यूं कहें कि आशीष हू-ब-हू उनकी तरह था… जैसे उनकी कार्बन कॉपी. बैठक में बाकी लोग भी आश्चर्यचकित से इस आगन्तुक को देख रहे थे. इससे पहले तो इन्हें कभी इस घर में नहीं देखा गया. कौन थे ये? और आशीष से इनका चेहरा और कदकाठी इसकदर कैसे मिलती है, बिल्कुल जैसे उसके बड़े भाई हों. आशीष का चेहरा-मोहरा न तो उसकी मां से मिलता था और न ही उसके पापा संजीव की कोई झलक उसमें थी, मगर इस आगन्तुक से वह इतना ज्यादा रिजेम्बल कैसे कर रहा है? हरेक की आंखों में यही सवाल था. आशीष और संजीव की आंखों में भी कि – आप कौन हैं?

आगन्तुक ने आगे बढ़कर रागिनी की फोटो पर फूल चढ़ाये और हाथ जोड़कर वहीं संजीव के निकट ही बैठ गया. उसने धीरे से संजीव के कानों के पास मुंह ले जाकर कुछ कहा. फिर दोनों के बीच खामोशी पसर गयी. काफी देर तक वह आगन्तुक वहीं संजीव के पास ही बैठा रहा. बीच में धीरे-धीरे दो-चार बातें भी कीं. करीब आधे घंटे बाद वह उठे और संजीव व आशीष से विदा लेकर चले गये. गमगीन माहौल था, लिहाजा लोगों ने उस वक्त आगन्तुक के विषय में कोई सवाल नहीं किया, मगर लोगों के बीच फुसफुसाहट जरूर होती रही. शाम तक सभी लोग जा चुके थे. बैठक खाली हो गयी थी. बस संजीव और आशीष ही रागिनी की तस्वीर के साथ रह गये थे. तभी आशीष ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा, ‘पापा, वो अंकल कौन थे, जो बिल्कुल मेरी तरह दिख रहे थे?’

संजीव ने गहरी नजरों से आशीष के चेहरे की ओर देखा और बोले, ‘वो… वो तुम्हारी मम्मी के कॉलेज टाइम के दोस्त हैं. अभय… अभय नाम है उनका. मैं भी आज पहली बार ही मिला हूं उनसे… वो कल फिर आएंगे.’

‘क्यों?’

‘उन्हें कुछ बात करनी है.’

‘कैसी बात? मम्मी ने तो कभी अपने इस दोस्त के बारे में नहीं बताया… क्या आप भी इन्हें नहीं जानते थे?’

‘नहीं… कल आएंगे तब पता चलेगा कि क्या बात करनी है उन्हें.’ कह कर संजीव उठे और अपने कमरे की ओर चल दिये. आशीष वहीं बैठा रहा. आगन्तुक, जिनका नाम पापा ने अभय बताया था, के बारे में सोचता रहा. कौन हैं, कहां से आये, कहां रहते हैं, क्या बात करनी है उन्हें, पहले कभी क्यों नहीं आये, मां ने उनके बारे में कभी कुछ क्यों नहीं बताया, मुझसे इतने क्यों मिलते हैं… बहुतेरे सवाल उसके दिमाग में चक्कर काट रहे थे.

उधर संजीव के जेहन में भी बाइस बरस पहले की बातें चल रही थीं. इस आगन्तुक से मिलने के बाद जैसे उनकी पूरी जिन्दगी फ्लैशबैक में चलने लगी. रागिनी से उनकी शादी के पांच बरस बीत चुके थे और रागिनी की गोद सूनी की सूनी थी. पहले दो साल तो बेख्याली में गुजर गये, मगर तीसरा साल लगते-लगते संजीव की मां ने और रिश्तेदारों ने बहू को टोकना शुरू कर दिया था. मां को पोते का मुंह देखने की जल्दी मची थी. आये-दिन रागिनी को लेकर कभी इस पंडित के पास तो कभी उस ओझा के पास पहुंच जाती थी. तमाम टोने-टोटके करा लिये, अनेक डॉक्टरों से दवा-इलाज करवा लिया, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला. कभी-कभी खिसिया कर रागिनी को कोसने भी लग जाती थी, ‘बांझ है बांझ… मेरे बेटे की तो तकदीर ही फूट गयी… हाय, अब मेरा वंश कैसे बढ़ेगा… इसकी तो कोख ही नहीं फल रही….’ मां की बातों से रागिनी बहुत आहत होती थी, कमरे में खुद को कैद करके फूट-फूट कर रोया करती थी. तब संजीव उसे बहुत दिलासा देते थे. कहते थे, ‘रागिनी हमारी किस्मत में बच्चा होगा तो जरूर मिलेगा. अभी कौन सी हमारी उम्र निकल गयी है? तुम मां की बातों को दिल पर मत लिया करो. वो बूढ़ी हो गयी हैं. कुछ काम-धाम नहीं है तो तुम्हारे पीछे पड़ी रहती हैं….’ मगर रागिनी को संजीव की बातों से राहत नहीं मिलती थी. वह खुद बच्चे के लिए बड़ी परेशान रहती थी. उसकी सभी सहेलियों की गोद में बच्चे खेल रहे थे, बस वही थी जो बांझ होने का कलंक लिये घूम रही थी. यह कलंक वह किसी भी कीमत पर हटाना चाहती थी.

उन्हीं दिनों की बात है जब संजीव ने रागिनी को बताये बिना एक जान-पहचान के डॉक्टर से अपना भी चेकअप करवाया था. रिपोर्ट आयी तो पता चला कि बच्चा न होने का कारण वह खुद ही है. कमी संजीव में ही थी. उसके सीमन में शुक्राणु न के बराबर थे. रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि वह कभी पिता नहीं बन सकता. हालांकि उन्होंने संजीव को कुछ दवाएं दी थीं, मगर दो महीने के सेवन के बाद भी शुक्राणुओं की संख्या में कोई वृद्धि नहीं दिखी.

संजीव अपना इलाज करवा रहे हैं, यह बात उन्होंने रागिनी को कभी नहीं बतायी और न ही कभी रागिनी के समक्ष यह स्वीकार कर पाने की उनकी हिम्मत हुई कि वह उसे बच्चा देने लायक नहीं हैं. वह डरते थे कि बात खुली तो उनके माथे पर नपुंसक, नामर्द जैसे कलंक चमकने लगेंगे. वह कैसे अपनी कमजोरी रागिनी के सामने स्वीकार करें? कैसे बतायें कि कमी रागिनी में नहीं, बल्कि खुद उनके अन्दर है? यह सच बताने के बाद वह कैसे रागिनी का सामना कर पाएंगे, जो उनकी मां के ताने सुन-सुन कर आधी हो चुकी है. मोहल्ले की औरतों के बीच ‘बांझ’ के नाम से पुकारी जाने लगी है. वह अपने इलाज के बारे में चुप्पी साध गये. उनमें सच को कह पाने की हिम्मत ही नहीं थी.

फिर एक दिन अचानक रागिनी ने घर में खुशियों का बम फोड़ दिया. शाम को संजीव आॅफिस से लौटे तो घर में औरतों का जमावड़ा लगा था. ढोल बज रहा था, गाने गाये जा रहे थे. चारों ओर चहचहाटें, रौनकें, हंसी-ठिठोली, किलकारियों के पटाखे छूट रहे थे. संजीव के लिए बधाइयों का तांता लग गया. अपनी मां के चेहरे की खुशी देखकर तो वह दंग रह गये. इससे पहले उन्होंने अपनी मां को कभी इतना खुश नहीं देखा था. खुशी से उसका चेहरा दमक रहा था. मां ने उनके मुंह में लड्डू ठूंसते हुए कहा – ‘पांव भारी हैं बहू के… देखना पहला तो पोता ही होगा’. शर्मायी-लजायी रागिनी ने मुस्कुरा कर कमरे में संजीव का स्वागत किया.

उसने संजीव को अपनी बाहों में जकड़ कर पूछा, ‘तुम खुश हो न?’

संजीव ने हौले से जवाब दिया, ‘बहुत….’ उस दिन संजीव की बाहों में लिपटी रागिनी के चेहरे पर दर्द और टीस की जगह खुशी, शान्ति और सुख का नूर था, मगर संजीव के दिमाग में हलचल मची थी. वह जानते थे कि यह बच्चा उनकी देन नहीं है. फिर कौन है जिसने रागिनी को यह खुशी दी है? कब और कैसे वह रागिनी के सम्पर्क में आया? रागिनी उनसे छिप कर किसी और से मिलती थी? रागिनी ने उन्हें धोखा दिया? दम्भी पुरुष प्रवृत्ति उन पर हावी होने लगी. मगर साथ-साथ वह इस आशंका से भी भर गये कि कहीं डॉक्टर की दवाएं तो असर नहीं कर गयीं उन पर.. हो सकता है उनके सीमन में शुक्राणुओं की संख्या बढ़ गयी हो… शायद वही इस बच्चे के बाप हों.. शायद विज्ञान का चमत्कार हो ही गया हो… शायद… शायद…  रात भर सैकड़ों सवाल उन्हें परेशान किये रहे, मगर सुबह तक वह एक फैसले पर पहुंच चुके थे. यह फैसला था आने वाले के स्वागत का.

रागिनी के पांव भारी होते ही वह जैसे पूरे घर की महारानी बन गयी. संजीव की मां जो हर वक्त उसको कोसती रहती थी, अब हर वक्त उसकी सेवा-टहल में लगी रहती थीं. उसको घर का एक काम नहीं करने देती. सुबह से शाम तक उसके खाने-पीने का ध्यान रखती. अपने हाथ से काजू-बादाम की खीर बना-बना कर खिलाती. तमाम तरह के जूस और सूप पिलाती. उसके लिए अपने हाथों से सूखे मेवे और सूजी के लड्डू बना-बना कर जार में रखतीं. रागिनी को बड़ा अटपटा लगता था कि इस बुढ़ापे में वह इतनी मेहनत कर रही हैं, मगर पोते का सुख पाने के लालच में मां की ममता उछाले मार रही थी, उसे रोक पाना न संजीव के बस में था और न रागिनी के. नौ महीने तो पंख लगाकर उड़ गये और वह घड़ी आ पहुंची जब मां की बरसों की साध पूरी हो गयी. संजीव का घर-आंगन नन्हें आशीष की किलकारियों से गूंज उठा. दादी को खेलने के लिए खिलौना मिल गया. रागिनी की जिम्मेदारियां बढ़ गयीं और संजीव को जीवन का लक्ष्य प्राप्त हो गया. आशीष ने सबका जीवन खुशियों से भर दिया था. पूरा घर बस उसके इर्द-गिर्द ही घूमता रहता था.

संजीव के दिल में यह शंका धुंधली पड़ गयी थी कि आशीष उनका नहीं, बल्कि किसी औेर का बेटा था. उन्होंने कभी यह शक रागिनी के सामने जाहिर नहीं किया. आशीष को उन्होंने बेइन्तहा प्यार दिया. उसकी छोटी से छोटी ख्वाहिश को पूरा किया. उसको कभी हल्का सा बुखार भी आ जाता तो संजीव पूरी रात जाग कर उसकी देखभाल करते थे. जान से ज्यादा प्यार करते थे संजीव अपने बेटे से. उन्होंने आशीष को बहुत अच्छे संस्कार दिये. उसके लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा का इंतजाम किया. शहर के सबसे अच्छे और मंहगे स्कूल में उसका एडमिशन करवाया. आशीष पढ़ाई में हमेशा अच्छा रहा. हर कक्षा में कभी फर्स्ट, कभी सेकेन्ड आता रहा. यही नहीं मेडिकल की पढ़ाई के लिए वह पहले ही अटेम्प में सिलेक्ट हो गया. डॉक्टरी की पढ़ाई का यह उसका तीसरा साल चल रहा था. संजीव और रागिनी को अपने होनहार बेटे पर नाज था.

आशीष जब पन्द्रह बरस का था, तो उसकी प्यारी दादी उसे छोड़ कर हमेशा के लिए चली गयी. बुढ़ापा था. उम्र हो चुकी थी. मगर जाते वक्त तक खुश थी दादी. हर वक्त पोते के प्यार में डूबती-उतराती रहती थी. अन्तिम वक्त में भी उसकी ही गोद में सिर रख कर चिरनिद्रा में सो गयी थी. तब आशीष बहुत रोया था. दादी का लाडला था. कई दिन तक उदास रहा. उदास तो रागिनी और संजीव भी बहुत थे, मगर यह तो प्रकृति का नियम है, जो आया है एक दिन जाएगा. आज प्रकृति का वही नियम एक बार फिर संजीव के सामने आ खड़ा हुआ था. उसकी प्यारी रागिनी चली गयी. फर्क इतना था कि यह उसकी जाने की उम्र नहीं थी. अभी तो बहुत सारे सपने साथ देखने थे, साथ पूरे करने थे. आशीष को दूल्हा बनाना था, ब्याह रचाना था, उसका घर बसाना था, उसके बच्चे खिलाने थे… कितने सारे काम बचे हुए थे और रागिनी वह सारे काम संजीव के कंधे पर डालकर चल दी. रात भर संजीव की आंखों के आगे बीते साल चलचित्र की भांति गुजरते रहे. सुबह आशीष ने आकर जब चाय का प्याला उन्हें थमाया, तो उनकी लाल-सुर्ख आंखें देखकर उसकी भी आंखें भर आयीं. बाप-बेटा बड़ी देर तक एक दूसरे के गले लग कर सिसकते रहे.

दोपहर बाद घर की घंटी बजी तो अनजान आशंका से संजीव का दिल धड़क उठा. आशीष अपने कमरे में सो रहा था. वह उठे, दरवाजा खोला तो सामने वही आगन्तुक खड़ा था, जिसने अपना नाम कल अभय बताया था. संजीव ने उससे हाथ मिलाया और अन्दर आने का रास्ता दे दिया. अभय शालीनता से भीतर आया और सोफे पर बैठते हुए पूछा, ‘आशीष नहीं है?’

‘सो रहा है….’ संजीव ने संक्षिप्त सा जवाब दिया और पास वाले सोफे पर बैठ गया. मन आशंकाग्रस्त था… पता नहीं यह क्यों आया है? कहां से आया है? क्या बात करनी है?

‘जी, कल आपने पूरा परिचय नहीं दिया था. आप रागिनी को कैसे जानते हैं? आपके बारे में रागिनी ने कभी नहीं बताया?’ संजीव ने एकसाथ ही कई सवाल दाग दिये.

‘संजीव जी, रागिनी मेरे साथ कॉलेज में पढ़ती थी. बस तीन साल का साथ था हमारा. हम सिर्फ दोस्त थे और कुछ नहीं. फिर मैं मेडिकल की पढ़ाई के लिए अपनी बड़ी बहन के पास अमेरिका चला गया. वहां से लौटकर मैंने पुराने शहर में अपना हॉस्पिटल बनाया. आरोग्य नर्सिंग होम.’

‘ये तो बहुत विख्यात नर्सिंग होम है. मेरी मां रागिनी को लेकर वहां जाती थी इलाज के लिए.’ संजीव अचानक याद करके बोल उठे.

‘जी… तभी रागिनी से दोबारा मुलाकात हुई थी. उन दिनों वह बहुत परेशान थी. उसकी हालत देख कर तो मैं उसे पहचान भी नहीं पाया था. आपकी मां के सामने हमने जाहिर नहीं किया था कि हम एकदूसरे को जानते हैं. रागिनी मां बनना चाहती थी, किसी भी कीमत पर. तब मैंने उसके सारे टेस्ट करवाये थे. वह मां बनने के लिए पूर्णत: काबिल थी. एक दिन जब वह मेरे पास अकेले आयी तो मैंने उससे कहा कि वह आपका टेस्ट करवाये. क्योंकि मुझे शक था कि कमी आप में है. मगर उसने मना कर दिया. उसने साफ कह दिया कि वह अपने पति को खुशी देना चाहती है, कमी होने का अहसास कराके दुखी नहीं करना चाहती. वह कई दिन तक मेरे पास आती रही, मैं उसे समझाता रहा कि तुम्हें दवाइयां खाने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि तुम पूरी तरह मां बनने के काबिल हो. अचानक एक दिन उसने मेरे सामने एक मांग रख दी. उसने कहा कि उसे मुझसे एक बच्चा चाहिए. मैं उसको अपने शुक्राणु देने को तैयार था, मगर वह आर्टिफिशल तरीके से गर्भ धारण नहीं करना चाहती थी. फिर हमारे बीच सहमति से रिश्ता कायम हुआ. कई बार. वह दवा के बहाने से मेरे नर्सिंग होम में आती थी. प्रेग्नेंट होने के बाद वह बहुत खुश थी. उसने मेरा बहुत आभार जताया था, मगर मुझसे यह भी साफ कह दिया था कि बच्चा सिर्फ उसका है, उस पर मेरा कोई हक नहीं है और न मैं कभी भविष्य में उस पर अपना हक जताने की कोशिश करूं. इसके बदले में उसने मुझे पैसे देने की भी पेशकश की थी, मगर मैंने मना कर दिया था. मेरे लिए उसकी खुशी ही सबकुछ थी. उसके बाद मैं रागिनी से कभी नहीं मिला. हां, एकाध बार फोन पर जरूर बात हुई थी.’ अभय क्षण भर को रुके तो संजीव अधीरता से बोल पड़े, ‘फिर इतने सालों बाद आप क्यों आये हैं?’ संजीव का मन अनजान आशंका से कांप रहा था.

‘अखबार में रागिनी की तेरहवीं का विज्ञापन देखा था. खुद को रोक नहीं पाया. कई सालों से मन छटपटा रहा था अपने बेटे को देखने के लिए. रागिनी ने फोन पर बताया था कि बेटा हुआ है, कहा था – मेरा बेटा हुआ है, तुम्हारा धन्यवाद मुझे और मेरे परिवार को यह खुशी देने के लिए. जब मैंने उसे देखने का इसरार किया तो उसने मना कर दिया. बोली, मुझे शर्मिंदगी महसूस होगी. जब मर जाऊं तब देख लेना कभी उसे. रागिनी के मन में इस बात की गिल्टी थी कि उसने तुमको धोखा दिया, मगर संजीव, यह उसने तुम्हारी खुशी के लिए किया था. वह तुमको इस बात का अहसास भी नहीं होने देना चाहती थी कि तुममें कोई कमी है. वह तुमसे बहुत प्यार करती थी.’

‘फिर अब आप क्यों आये हैं? आप क्यों यह बातें मुझे बता रहे हैं? क्या आप आशीष को वापस पाना चाहते हैं? या उसे यह सब बता देना चाहते हैं? प्लीज ऐसा मत करिएगा…’ संजीव की आवाज थरथराने लगी.

डॉ. अभय तुरन्त उठ कर उनके पास आये और उसके कन्धे पर हाथ रख कर वहीं सोफे पर बैठ गये, बोले, ‘अरे,  नहीं, नहीं… आप मुझे गलत समझ रहे हैं. मैं सिर्फ अपने दिल के हाथों विवश होकर कल रागिनी की तेरहवीं में आया था. मन में यह इच्छा भी थी कि इस बहाने से एक नजर अपने बेटे को देख सकूं. सो देख लिया.  मेरा उस पर कोई अधिकार नहीं है, आपने उसको पाला है, उसे प्यार दिया है, उसका भविष्य बनाया है, वह आपका ही है और हमेशा रहेगा. मैं तो बस एक चाह लेकर आया था आपके पास…’

‘कैसी चाह?’ संजीव ने जल्दी से पूछा.

‘संजीव, मैंने शादी नहीं की है और न ही मेरी सम्पत्ति का भारत में कोई वारिस है. पुराने शहर में मेरा जो अस्पताल और घर है, वह मैं आशीष के नाम करना चाहता हूं. आशीष डॉक्टर बनने वाला है, यह मैं जानता हूं. मुझे उम्मीद है तुम इसके लिए न नहीं कहोगे. मैं अपनी विल बनाकर तुमको दे जाऊंगा. तीन साल बाद मैं अमेरिका अपनी बड़ी बहन के पास शिफ्ट हो जाऊंगा. मैं वहां एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ाने की इच्छा रखता हूं. अब यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम कब और कैसे आशीष को इस विल के बारे में बताओ.’

संजीव यह सब सुन कर सन्न बैठे थे. उनको समझ में ही नहीं आ रहा था कि इस औफर को वह सौगात समझें या मुसीबत. वह क्या कहेंगे आशीष से कि अभय उसका कौन है? क्यों वह अपनी करोड़ों की प्रॉपर्टी आशीष को दे रहा है? क्या आशीष यह सब जान कर सहज रह पाएगा? कहीं वह मुझसे दूर तो नहीं हो जाएगा? कहीं वह अपने असली पिता के साथ रहने की जिद तो नहीं कर बैठेगा? अगर ऐसा हुआ तो मेरा क्या होगा? बुढ़ापे में मैं बिल्कुल अकेला हो जाऊंगा… यह सब सोच कर संजीव कांप उठे.

बोले, ‘मैं… मैं आपको सोच कर जवाब दूंगा…’

डॉ. अभय ने ठंडी सांस ली और उठ खड़े हुए. जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर उन्होंने संजीव के हाथ पर रखा और बोले, ‘उम्मीद है आप मुझे गलत नहीं समझेंगे. आप सोच लें तो मुझे फोन कर लीजिएगा. मुझे आपके जवाब का इन्तजार रहेगा. मेरे यहां आने का आशय आपको या आशीष को दुख पहुंचाने का हरगिज नहीं था. आशीष भले मेरा खून है, मगर उसके पिता आप हैं. वह सिर्फ आपका ही है. मैं तो बस उसे एक नजर देखना भर चाहता था.’ कहकर डॉ. अभय ने हाथ जोड़ दिये. संजीव ने उनके जुड़े हुए हाथ थाम लिये. आंखें आंसुओं से भीग गयीं. डॉ. अभय चले गये.

संजीव के दिमाग में विचारों की आंधी चल रही थी. आशीष को क्या बताएं? कैसे बताएं? बताएं कि न बताएं? वह किसी फैसले पर नहीं पहुंच पा रहे थे. शाम हो गयी थी. आशीष भी उठ गया था. संजीव उसके कमरे में पहुंचे तो वह पुराने एल्बम में खोया हुआ था. संजीव ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और पलंग पर उसकी बगल में बैठ गये. एल्बम में आशीष के बचपन से लेकर ग्रेजुएशन तक की फोटोज थीं. दो चार पन्ने पलटने के बाद संजीव अचानक एक फोटो को गौर से देखने लगे. उस फोटो में सब लोग ड्राइंग रूम में टीवी के सामने बैठे थे. नन्हा आशीष रागिनी की गोद में था, बगल में मां और संजीव बैठे हंस रहे थे. उस फोटो पर हाथ फेरते हुए संजीव बोले, ‘बेटा, जब तुम्हारी मां से मेरी शादी हुई थी तब पहली बार हमारे घर पर रंगीन टीवी आया था. यह वही टीवी है. तुम्हारे नानाजी ने दिया था. उन दिनों महाभारत सीरियल आया करता था. हम सब बड़े शौक से देखते थे. इसी टीवी से मुझे महाभारत की कथाओं का ज्ञान मिला था. तुम्हें पता है धृतराष्ट्र और पांडु अपने पिता विचित्रवीर्य के पुत्र नहीं थे, बल्कि उनके बड़े भाई वेद व्यास के पुत्र थे, जो संन्यासी हो चुके थे. विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद उनकी माता सत्यवती ने उनके बड़े भाई वेद व्यास से आग्रह किया था कि वह उनकी दोनों बहुओं को गर्भवती करें. अपनी मां के कहने पर वेद व्यास ने उनकी दोनों बहुओं को गर्भवती किया था. वास्तव में धृतराष्ट्र और पांडु वेद व्यास के पुत्र थे, मगर माने गये विचित्रवीर्य के. इसी तरह पांडु के पांचों बेटे भी उनके अपने पुत्र नहीं थे, बल्कि पांच अलग-अलग शक्तियों के संसर्ग से उत्पन्न हुए थे. मगर माने गये पांडु के ही बेटे…’

‘हां, मुझे यह कहानी पता है पापा. हमारे देश का इतिहास, हमारे धर्मग्रन्थ बताते हैं कि पहले के जमाने में इन बातों को पाप नहीं माना जाता था, इस तरह के सम्बन्ध समाज में पूरी तरह स्वीकार्य थे. जरूरी नहीं था कि किसी बच्चे का पिता वही हो, जिससे उसकी मां ने शादी की हो. आज भी ऐसी प्रथाएं कई समाजों में हैं. बच्चा पाने के लिए शादीशुदा स्त्री दूसरे पुरुष से सम्बन्ध बनाने के लिए आजाद है. कई समाजों में तो शादी से पहले शारीरिक सम्बन्ध बनाना और बच्चे पैदा करना आवश्यक है. उसके बिना वे शादी ही नहीं करते. धरती पर जीवन को चलते रहने के लिए बच्चों का पैदा होना जरूरी है. अब आप देखिये आईवीएफ पद्धति के अन्तर्गत हम कभी-कभी दूसरे पुरुष का वीर्य लेकर औरत को गर्भवती बनाते हैं. इसमें कोई अपराध नहीं है. हर इन्सान चाहता है कि उसके घर में बच्चे हों, खुशियां आयेंं.’

‘हां, पर…! ’ संजीव कुछ कहते-कहते रुक गये.

‘पर क्या पापा?’ आशीष ने पूछा.

‘जब बच्चे को पता चलता होगा कि उसका असली पिता कौन है, तब उसका दिल बंट जाता होगा.’ संजीव मायूसी से बोले. ‘अरे पापा, ऐसा कुछ नहीं होता है. पैदा करना कोई बड़ा काम नहीं है. बच्चे को पालने वाला, उसे प्यार देने वाला,उसका भविष्य बनाने वाला ही उसका पिता होता है. यह जानते हुए भी कि बच्चे में उसका डीएनए नहीं है, फिर भी उसे दिल से लगा कर रखना बड़ी बात है. उस प्यार के आगे दुनिया की हर नियामत छोटी है.’

‘तुम ऐसा मानते हो बेटा?’ संजीव ने उत्सुकता से पूछा.

‘हां पापा बिल्कुल. आखिर भगवान कृष्ण भी तो बाबा नन्द और मां यशोदा को ही अपना माता-पिता मानते थे, भले उनके असली पिता वासुदेव और मां देवकी थे. पैदा करने वाले से पालने वाला बड़ा होता है.’ कहते हुए आशीष बिस्तर से उठ खड़ा हुआ. बाथरूम के दरवाजे की ओर बढ़ते हुए अचानक पलट कर बोला, ‘पापा, वो जो कल अंकल आये थे, वह आज आने के लिए कह रहे थे न?’

‘हां, वो आये थे, जब तुम सो रहे थे.’ संजीव ने संक्षिप्त सा जवाब दिया.

‘अच्छा! वो कुछ बताना चाहते थे न पापा?’ आशीष ने जिज्ञासा प्रकट की.

‘हां’

‘क्या बताना चाहते थे?’

‘यही कि वह तुम्हारे पिता हैं…’

कमरे में सन्नाटा पसर गया. संजीव सिर झुकाये बिस्तर पर बैठे थे और आशीष के कदम जैसे बाथरूम के दरवाजे पर ही चिपक गये थे. अचानक आशीष ने आगे बढ़कर पापा का सिर अपने सीने में भींच लिया और थरथराती आवाज में बोला, ‘मेरे पापा सिर्फ आप हैं… सिर्फ आप…’

आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा और संजीव की सारी शंकाएं इस सैलाब में बह गयीं.

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