भाग 1

सेवानिवृत्त होने के बाद मुझ जैसे फिट इनसान के लिए दिन काटना एक समस्या बन गया था. जिस ने जीवन भर साथ निभाने का वादा किया था वह 2 साल पहले दुनिया छोड़ कर चली गई. उस के साथ का अभाव अब बहुत खलता था.

बड़ा बेटा अपने परिवार के साथ अमेरिका में बस गया है. उस का साल में एक चक्कर लगता है. छोटा बेटा और उस की पत्नी मुंबई में नौकरी करते हैं. वे हमेशा अपने पास रहने को बुलाते हैं पर मन नहीं मानता. यह इलाका और आसपास के लोग जानेपहचाने हैं. इन्हें छोड़ कर जाने की बात सोचते ही मन उदास हो जाता है.

‘‘सर, आप के पास पैसा और जीने का उत्साह दोनों ही हैं. आप को अकेलेपन की पीड़ा क्यों भोगनी है? अपने मनोरंजन और खुशी के लिए आप को बढि़या कंपनी बड़ी आसानी से मिल सकती है.’’ ये शब्द 21 साल की शुचि ने मुझ से आज सुबह के वक्त पार्क में कहे तो मैं मन ही मन चौंक पड़ा था.

शुचि से मेरी मुलाकात सप्ताह भर पहले सुबह की सैर के समय पार्क में हुई थी. उस दिन मैं घूमने के बाद बैंच पर बैठ कर सुस्ता रहा था और वह कुछ दूरी पर व्यायाम कर रही थी.

मैं बारबार उस की तरफ देखने से खुद को रोक नहीं पा रहा था. उस के युवा, सांचे में ढले खूबसूरत जिस्म को हरकत करते देखना मुझे अच्छा लग रहा था, इस तथ्य को मैं बेहिचक स्वीकार कर लेता हूं.

एक्सरसाइज करने के बाद उसी ने मौसम के ऊपर टिप्पणी करते हुए मेरे साथ वार्तालाप शुरू किया था. करीब 10 मिनट हमारे बीच बातें हुईं पर इतनी छोटी सी मुलाकात से मिली ताजगी और खुशी दिन भर मेरे साथ बनी रही थी.

हम रोज सुबह पार्क में मिलने लगे. उस के साथ बातें करने में मुझे बहुत मजा आता था. वह एक बातूनी पर समझदार और संवेदनशील लड़की थी.

मैं रात को सोने के लिए लेटता तो पाता कि मन सुबह होने का इंतजार बड़ी बेचैनी से कर रहा है. उस से मिल कर आने के बाद घर का कोई भी काम करना मुझे पहले की तरह उबाऊ नहीं लगता. अब अगर खाली बैठता तो अकेलेपन और उदासी की चुभन व पीड़ा ने मुझे परेशान करना बंद कर दिया था.

‘‘मेरे मनोरंजन और खुशी के लिए कौन देगा मुझे बढि़या कंपनी?’’ आज सुबह उस की बात सुन कर मैं ने हलकेफुलके अंदाज में उत्सुकता दर्शाई थी.

‘‘आप अगर पैसा खर्च करने को तैयार हैं तो पहले किसी क्लब या सोसाइटी के मेंबर बन जाइए. पांचसितारा होटल के बार और रेस्तरां में जाना शुरू कीजिए. वहां आप की मुलाकात ऐसी जवान महिलाओं से होगी जिन्हें अपने शौक या जरूरतें पूरी करने को पैसा चाहिए. बदले में आप का मन बहलाने के लिए वे आप को अच्छी कंपनी देंगी.’’

ये भी पढ़ें- दीवारें बोल उठीं: भाग 2

‘‘आजकल ऐसा कुछ होता है, यह मैं ने सुना जरूर है पर ऐसी किसी औरत से कभी मिला नहीं हूं.’’

‘‘तो अब मिलिए, सर. आप के बेटेबहुओं के पास आप के लिए वक्त नहीं है और न ही उन्हें आप का पैसा चाहिए. तब बैंक में पैसा जोड़ कर आप को किस के लिए रखना है?’’

‘‘अरे, पैसा तो पास में होना ही चाहिए. कल को किसी बीमारी ने धरदबोचा तो…’’

‘‘सर, अगर कल की सोचते हुए आप ने आज की खुशियों को दांव पर लगा दिया तो अपने अकेलेपन और उदासी से कभी छुटकारा नहीं पा सकेंगे.’’

‘‘लेकिन मेरा इस तरह की स्त्री से परिचय कौन कराएगा?’’

‘‘सर, आप नोटों से पर्स भर कर घर से निकलिए तो सही. गुड़ कहां है, ये मक्खियों को कोई बताता है क्या, सर?’’

ऐसा जवाब देने के बाद शुचि खिलखिला कर हंसी तो मैं भी खुल कर मुसकराने से खुद को रोक नहीं पाया था.

अगले दिन उस ने जब फिर से इसी विषय पर वार्तालाप शुरू किया तो मैं ने उस से पूछा, ‘‘शुचि, मैं रुपए खर्च करने को तैयार हूं पर मुझे यह बताओ कि कल को मेरा कोई परिचित, दोस्त या रिश्तेदार जब किसी सुंदर स्त्री के साथ मुझे घूमते हुए देखेगा तो क्या सोचेगा?’’

‘‘वह कुछ भी सोचे, आप को इस बारे में कैसी भी टेंशन क्यों लेनी है?’’

‘‘टेंशन तो मुझे होगी ही. मैं लोगों की नजरों में अपनी छवि खराब नहीं करना चाहता हूं.’’

‘‘सर, आप तो बहुत डरते हैं,’’ उस ने अजीब सा मुंह बनाया.

‘‘अपनी बदनामी से सभी को डरना चाहिए, यंग लेडी.’’

‘‘फिर तो आप मुझे अपने घर चलने का निमंत्रण कभी नहीं देंगे,’’ उस ने अचानक ही वार्तालाप को नया मोड़ दे दिया.

‘‘तुम मेरे घर चलना चाहती हो?’’ मैं ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘यस, सर,’’ उस ने बेहिचक जवाब दिया.

‘‘तुम्हारे घर आने की खुशी पाने के लिए मैं थोड़ी सी बदनामी सह लूंगा. तुम कब आओगी मेरे घर?’’ मैं ने मजाकिया लहजे में पूछा.

‘‘अभी चलें?’’ उस ने चुनौती देने वाले अंदाज में मेरी आंखों में झांका.

‘‘तुम्हारे मम्मीपापा चिंता तो नहीं करेंगे?’’ उस के सवाल से मन में उठी हलचल के कारण मैं एकदम से ‘हां’ नहीं कह पाया था.

‘‘मैं ने घर से निकलते हुए मम्मी को बता दिया था कि शायद मैं आप के साथ आप के घर चली जाऊं.’’

‘‘तब चलो,’’ हम दोनों पार्क के गेट की तरफ चल पड़े, ‘‘तो तुम ने अपनी मम्मी को मेरे बारे में और क्याक्या बता रखा है?’’

‘‘वह तो आप के बारे में पहले से ही बहुतकुछ जानती हैं. पार्क में घूमते हुए कुछ दिन पहले उन्होंने ही मुझे आप का परिचय बताया था.’’

‘‘और वह मुझे कैसे जानती हैं?’’ मैं ने चौंक कर पूछा.

‘‘वह आप के साथ कालिज में पढ़ा करती थीं लेकिन आप दोनों के बीच ज्यादा बातचीत कभी नहीं हुई थी.’’

‘‘शायद देखने पर मैं उन्हें पहचान लूं. वैसे तुम्हें क्या बताया है उन्होंने मेरे बारे में?’’

‘‘यही कि आप बहुत अमीर हैं और 2 साल से बहुत अकेले भी.’’

‘‘इस का मतलब तुम्हारी मम्मी को मेरी पत्नी के इस दुनिया को छोड़ कर चले जाने की जानकारी है. मेरे अकेलेपन को दूर करने का जो इलाज तुम मुझे बता रही हो, क्या वह तुम्हारी मम्मी का बताया हुआ है?’’

‘‘एक बार हम दोनों की इस विषय पर बातचीत हुई थी. वैसे मुझे नहीं लगता कि आप इस दिशा में कोई कदम उठाएंगे.’’

ये भी पढ़ें- बिट्टू: भाग 2

‘‘ऐसा क्यों कह रही हो?’’ मैं ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘आप को अपनी रेपुटेशन कुछ ज्यादा ही प्यारी है,’’ उस ने बड़े नाटकीय अंदाज में जवाब दिया और फिर हम दोनों ही जोर से हंस पड़े थे.

उस दिन शुचि मेरे घर में करीब 2 घंटे रुकी. उस ने मुझे चाय बना कर पिलाई और टोस्ट पर बटर लगा कर नाश्ता कराया. फिर मेरे साथ बातें करते हुए उस ने पहले ड्राइंगरूम में फैले सामान को संभाला और फिर मेरे शयनकक्ष को भी ठीकठाक कर दिया.

उस के हाथ में जूस का गिलास पकड़ाते हुए मैं ने पूछा, ‘‘तुम जिंदगी में क्या करना चाहती हो…क्या बनना चाहती हो, शुचि?’’

‘‘सर, 5 महीने बाद मेरा बी.कौम पूरा हो जाएगा. मेरी इच्छा बहुत अच्छे कालिज से एम.बी.ए. करने की है लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ उस की आंखों में परेशानी के भाव पढ़ कर मैं ने उत्सुक लहजे में सवाल पूछा.

‘‘मेरी फीस देना पापा के लिए कठिन होगा.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘पहले मेरी बड़ी बहन की शादी में और फिर भैया को होस्टल में रख कर इंजीनियरिंग कराने में पापा ने पहले ही सिर पर कर्जा कर लिया है. मैं बेटी हूं, बेटा नहीं. इसीलिए वह मेरी एम.बी.ए. की फीस का इंतजाम करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेंगे,’’ शुचि उदास हो उठी थी.

मैं ने फौरन उस का हौसला बढ़ाया, ‘‘शुचि, तुम अच्छे कालिज में प्रवेश तो लो. तुम्हारी फीस का इंतजाम कराने की जिम्मेदारी मेरी रहेगी.’’

‘‘क्या आप मेरी फीस भर देंगे?’’ उस की आंखों में आशा भरी चमक उभरी.

‘‘अगर बैंक से लोन नहीं मिला तो मैं भर दूंगा. नौकरी लग जाने के बाद बैंक का या मेरा लोन लौटाओगी न?’’ मैं ने मजाक में पूछा.

‘‘श्योर, सर, मेरी इस समस्या को हल करने की जिम्मेदारी ले कर आप मुझ पर बहुत बड़ा एहसान करेंगे,’’ वह भावुक हो उठी थी.

‘‘दोस्तों के बीच एहसान शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए. तुम्हारे लिए कुछ भी कर के मुझे खुशी होगी,’’ इन शब्दों को सुन कर उस का चेहरा फूल सा खिल उठा था.

शुचि के साथ के कारण अचानक ही मेरा समय बड़े आराम से कटने लगा था. उस से मिलने और उस के घर आने का मुझे इंतजार रहता. अपने को मैं नई ऊर्जा और उत्साह से भरा महसूस करता. अपने बेटेबहुओं से फोन पर बातें करते हुए मैं अपने अकेलेपन की शिकायत अब नहीं करता था. शुचि की मौजूदगी ने मेरी जिंदगी से ऊब और नीरसता को बिलकुल दूर भगा दिया था.

आगामी रविवार की सुबह पार्क में सैर कर लेने के बाद उस ने कहा, ‘‘सर, आज आप का लंच हमारे यहां है. आप तैयार रहना. मैं आप को अपने घर ले चलने के लिए ठीक 12 बजे आ जाऊंगी.’’

‘‘थैंक यू वेरी मच, शुचि. तुम्हारे मम्मीपापा से मिलने की मेरी भी बड़ी इच्छा है,’’ उस के घर जाने का बुलावा पा कर मैं सचमुच बहुत खुश हुआ था.

शुचि के आने से पहले मैं काजू की मिठाई का डब्बा और फूलों का बहुत सुंदर गुलदस्ता बाजार से ले आया था. उस के आने के 5 मिनट बाद ही हम दोनों कार में बैठ कर उस के घर जाने को निकल पड़े थे.

‘‘बहुत सुंदर गुलदस्ता बनवाया है आप ने, सर. मम्मी तो बहुत खुश हो जाएंगी,’’ शुचि की आंखों में अपनी तारीफ के भाव पढ़ कर मैं खुश हुआ था.

ये भी पढ़ें- धारावाहिक कहानी : अभिनेता भाग 4

शुचि के पापा ने बड़ी गरमजोशी के साथ हाथ मिलाते हुए मेरा स्वागत किया, ‘‘मैं रवि हूं…शुचि का पापा. वेलकम, कपूर साहब. शुचि आप की बहुत बातें करती है. इसीलिए ऐसा लग नहीं रहा है कि हम पहली बार मिल रहे हैं.’

Tags:
COMMENT