सिंगापुर हवाई अड्डे से स्कूल की दूरी अच्छीखासी थी. एयरपोर्ट पर ही वसुधा को लेने आए ट्रैवल एजेंट ने स्कूल की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए, ‘‘मैडम, ऐसा स्कूल आप को दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा. बच्चे का पूरा ध्यान रखते हैं. और शायद यह दुनिया का पहला स्कूल है जो अस्पताल से जुड़ा हुआ है. बच्चे की सेहत का पूरा ध्यान रखा जाता है, पेरैंट्स को टैंशन लेने की जरूरत नहीं. आप देखिएगा कुछ ही सालों में न आप अपने बच्चे को पहचान पाएंगे और न ही आप का बच्चा आप को.’’ जवाब में वसुधा ने एक फीकी मुसकान फेंकी और मन ही मन कहा, ‘देख पाएगा, तो जरूर पहचान पाएगा.’

‘‘मम्मी, पानी,’’ नन्हे करण का हाथ आगे था. वसुधा ने थर्मस से पानी डाला और गिलास आगे बढ़ा दिया जिसे बच्चे ने एक सांस में ही खाली कर दिया, ‘‘मम्मी, हम कहां जा रहे हैं? यह कौन सी जगह है.’’

‘‘हम सिंगापुर पहुंचे हैं और तुम्हारे नए स्कूल में जा रहे हैं, जहां तुम्हें ढेर सारे खिलौने मिलेंगे, अच्छेअच्छे दोस्त मिलेंगे, खूब मस्ती होगी…’’

‘‘अच्छा,’’ करण कुछ सोच में था, ‘‘सिंगापुर – वही जहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सैकंड वर्ल्ड वार में दिल्ली चलो का नारा दिया था.’’

‘‘हां, यह जगह वही है. अब तुम थोड़ी देर सुस्ता लो. फ्लाइट में भी नहीं सोए थे, तबीयत खराब हो जाएगी.’’

स्कूल के रिसैप्शन पर एक लड़की वसुधा का इंतजार कर रही थी, ‘‘मैं हूं रमया, मानव सर की असिस्टैंट. सर, आप का ही इंतजार कर रहे हैं.’’

‘‘फ्लाइट लेट हो गईर् थी,’’ वसुधा ने कहा लेकिन दिमाग उस का मानव नाम पर अटका हुआ था. कितना परिचित नाम है. पिं्रसिपल के कमरे में प्रवेश करते ही वसुधा की सांस अटक सी गई, विशाल कमरा, पीछे दीवार पर एक बड़ी तसवीर और आगे एक बड़ी सी मेज, सोफे और इन सब के बीच एक कुरसी पर मानव… वही चेहरा, वही ललाट, वही माथा और वही गहरी आंखें – वसुधा सकपका सी गई. ‘‘वैलकम मिस्टर करण,’’ पिं्रसिपल का ध्यान अपने छात्र पर ही था.

‘‘थैंक्यू सर, करण कुरसी खींच कर उस पर बैठ चुका था.’’

‘‘तो आप दिल्ली से आए हैं?’’ पिं्रसिपल ने मुसकरा कर पूछा तो झट से करण ने जवाब दिया, ‘‘यस सर, हम दिल्ली में रहते हैं. वैसे, हम बीकानेर के राजघराने से हैं. आप कभी गए हैं वहां?’’

जवाब में मानव ने मुसकराहट फेंकी. फोन की घंटी बज रही थी, मानव ने फोन उठा कर बात करनी शुरू कर दी. ‘तो क्या मानव जानबूझ कर उसे अनदेखा कर रहा है, क्या वह अभी भी…’ वसुधा मन ही मन खुद से सवालजवाब कर रही थी कि अचानक एक शोर ने उस का ध्यान खींचा-खेलखेल में करण ने पेपरवेट नीचे गिरा दिया था जो लुढ़कते हुए अलमारी के कोने में छिप गया था. करण उठ कर गया और चुपचाप पेपरवेट वापस मेज पर रख दिया.

‘‘ओह गुड,’’ पिं्रसिपल मानव ने मुसकरा कर कहा,’’ बिना सहारे के तुम ने अपनेआप पेपरवेट मेज पर रख दिया. दिस इज इंप्रैसिव.’’

‘‘मैं अंधा थोड़े ही हूं. मम्मी तो बस वैसे ही मुझे देखदेख कर रोती रहती हैं. आप ही समझाइए न, मम्मी को.’’  ‘‘जरूर बेटा. तुम अभी छोटे हो, तुम्हें नहीं पता कि अपनों के आंसुओं में कितना प्यार, कितनी भावनाएं होती हैं. इस का इल्म मुझ से ज्यादा किसी को नहीं होगा जिस की आंखों के जाने पर किसी की आंखों से एक बूंद अश्क भी नहीं बहा.’’

वसुधा को काटो तो खून नहीं, तो क्या मानव नेत्रहीन है? आंखों की खूबसूरती वही जो कालेज के जमाने में थी. मगर उस खूबसूरती की अब कोई कीमत नहीं थी. यह सब कैसे हुआ, कब हुआ. ऐसे कई सवाल वसुधा को झकझोर रहे थे. इस से पहले कि बातों का सिलसिला कुछ आगे बढ़ता, मानव ने इजाजत मांगी और लाइब्रेरी की ओर बढ़ गया.

ऐडमिशन की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद वसुधा अपने कमरे की बालकनी में बैठी दूर पहाड़ों की ओर टकटकी लगाए थी. बादलों का एक झुरमुट आया और उसे भिगोने लगा. वसुधा ने आगे बढ़ कर खिड़की को बंद करने की कोशिश की, मगर तेज हवा की वजह से वह ऐसा नहीं कर पाई और अतीत में खो गई.

पहाड़ों से उसे खास प्यार था. शायद इसी वजह से उस ने छुट्टियों में कश्मीर घूमने का कार्यक्रम बनाया था. उस के पति आनंद ने दफ्तर से काफी सारी छुट्टियां ले ली थीं. कितना खुश था नन्हा करण. श्रीनगर का हर कोना उन्होंने देखा. शिकारे में सैर की. हाउसबोट में सारे दिन आनंद और करण धमाचौकड़ी करते, शाम को डलझील के किनारे सैर करते.

ऐसी ही एक शाम थी जब वे डल झील के किनारे घूम रहे थे कि कुछ लड़के पास से गुजरते फौज के एक कारवां पर अकारण पत्थरों की बरसात करने लगे, फौजी दस्ते हथियारों से लैस होने के बावजूद चुपचाप चलते जा रहे थे कि अचानक एक दुबलेपतले लड़के ने एक फौजी की वरदी पर हाथ डाल दिया. जवान ने लड़के की कलाई पकड़ ली और वह घिसटता चला जा रहा था. जवान ने एक हाथ से उसे पकड़े रखा और वह लड़का अपनी पूरी ताकत व जोरआजमाइश के बावजूद अपनी कलाई नहीं छुड़ा पाया.

कारवां के कप्तान ने आखिर उसे छुड़ाया और कहा, ‘‘हम चाहें तो अभी तुम्हें मजा चखा सकते हैं, मगर हम तुम्हें एक और मौका देते हैं. मत करो ऐसा काम, वरना भूखे मर जाओगे, तुम्हारे आका ऐयाशी करते जाएंगे और तुम मरते जाओगे. ये जो पर्यटक हैं, पहाड़ देखने के लिए कुल्लू जा सकते हैं, शिमला, मनाली, मसूरी, आबू, दार्जिलिंग, यहां तक कि स्विट्जरलैंड भी जा सकते हैं. मगर सोचो, ये अगर यहां नहीं आएंगे तो तुम्हारा क्या होगा, दानेदाने को मुहताज हो जाओगे.’’ यह कह कर कप्तान ने लड़के को छोड़ दिया.

लड़का एक ओर गिरा. मगर गिरते ही एहसानफरामोश दल ने पत्थर की बारिश कर दी. एक पत्थर करण को जा लगा और उस की आंखों से खून बहने लगा. फौज के कप्तान ने कारण को घायल देखा तो नारे लगाती भीड़ में घुस गया और पत्थरों की बौछारों के बीच करण, वसुधा और आनंद को बचा कर जीप में बैठा कर अस्पताल की तरफ चल पड़ा.

अस्पताल पहुंचते ही फौरन करण का इलाज शुरू हो गया. ‘बच्चे की आंखों का कार्निया डैमेज हो चुका है, अगर कुछ देर और हो जाती तो औप्टिकल नर्व भी कट सकती थी. फिलहाल, बच्चा देख नहीं पाएगा,’ डाक्टर ने राय जाहिर की.

‘क्या कोई उम्मीद नहीं,’ आनंद ने हौले से पूछा.

‘आस तो रखिए, मगर उम्मीद नहीं. शायद कभी कोई ऐसा डोनर मिल जाए, जिस की आंखों का यह हिस्सा सही हो तो उस के कार्निया की मदद से इस की आंखों की रोशनी आ जाए. मगर पूरी तरह से मैचिंग हो जाए तभी ऐसा मुमकिन हो पाएगा.’

फोन की बजती घंटी वसुधा को अतीत से वापस वर्तमान में ले आई. फोन पर दूसरी ओर आनंद था जो करण की खैरियत पूछ रहा था. वसुधा चाह कर भी आनंद से मानव का जिक्र नहीं कर पाई.्र

अगले दिन वसुधा ने मानव को दफ्तर की तरफ जाते देखा तो वह भी पीछेपीछे पहुंच गई. मानव अपनी कुरसी पर बैठ ही रहा था कि एक बरसों से अनजान मगर सदियों से परिचित खुशबू ने उसे पलभर के लिए चौंका दिया, संयत हो कर मानव ने धीरे से कहा, ‘‘आओ वसुधा, सबकुछ हो गया न, कोई दिक्कत तो नहीं हुई? करण कहां है?’’

सबकुछ ठीक हो गया मगर ठीक कुछ भी नहीं है. मैं समंदर में गोते लगाती एक ऐसी नैया हूं जिस का न कोई किनारा है न साहिल. नियति एक के बाद एक मेरी परीक्षाएं लेती आ रही है और यह सिलसिला चलता जा रहा है, थमने का नाम ही नहीं ले रहा. कभी नहीं सोचा था कि तुम से यों अचानक मुलाकात हो जाएगी. जो कुछ कालेज में हुआ उस के बाद तो मैं तुम से नजर ही नहीं मिला सकती, कितने बड़े अपराधबोध में जी रही हूं मैं.’’

‘‘तुम्हें एक अपराधबोध से तो मैं  ने बिना कहे ही मुक्त कर दिया. जब मेरी आंखें ही नहीं तो नजर मिलाने का तो प्रश्न ही नहीं,’’ मानव ने एक फीकी मुसकान फेंकते हुए कहा.

‘‘मगर, तुम्हारी आंखें?’’ वसुधा ने रुंधे गले से पूछा.

‘‘लंबी कहानी है. मगर सार यही है कि पहली बार एहसास हुआ कि जातपांत के सदियों पुराने बंधन से हमारा समाज पूरी तरह से मुक्त नहीं हुआ है. जातिवाद के जहर को देश से निकलने में अभी कुछ वक्त और लगेगा. जब तुम्हारे रिश्तेदारों ने हमें बीकानेर फोर्ट की दीवार पर देखा तो वे अपना आपा खोने लगे. तुम्हारी बेवफाई ने आग में घी का काम किया. तुम ने तो बड़ी आसानी से यह कह कर दामन छुड़ा लिया कि मैं ने तुम्हें मजबूर किया मिलने के लिए और तुम्हारा मेरा कोई रिश्ता नहीं, मगर मुझ से वे बड़ी बेरहमी से पेश आए.’’

‘‘मैं डर गई थी. मेरे पिता और भाई जातपांत को नहीं मानते, लेकिन आसपास के गांव और दूर के रिश्तेदार उन पर हावी हो गए थे. मुझ से उन्होंने कहा कि अगर मैं यह कह दूं कि तुम मुझे जबरदस्ती मिलने को मजबूर कर रहे हो तो उस से बिरादरी में उन की इज्जत बच जाएगी और इस के एवज में वे तुम्हें छोड़ देंगे, वरना वे तुम्हारी जान लेने को आमादा थे. जब सारी बात का मेरे पिता और भाइयों को पता चला तो वे बहुत शर्मिंदा भी हुए और उन्होंने अपने तमाम रिश्तेदारों से रिश्ता तक तोड़ दिया. उन्हें सलाखों के पीछे भी पहुंचा दिया. मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. तुम वहां से जा चुके थे. तुम्हें ढूंढ़ने की हमारी सारी कोशिशें नाकाम साबित हुईं.’’

‘‘तुम्हारे सामने तो उन्होंने मुझे छोड़ दिया मगर तुम्हारे ओझल होते ही उन की हैवानियत परवान चढ़ गईर् और वह खेल तब तक चलता रहा जब तक कि मेरी सांसें न उखड़ गईं. मरा जान कर छोड़ गए वे मुझे. डाक्टरों ने किसी तरह से मुझे बचा लिया, मगर मेरी आंखें न बचा पाए. फिर उस के बाद जिंदगी ने करवट बदली. अंधा होने के बाद मैं ने पढ़ाई जारी रखी और आज ब्रेल लिपि के जरिए हासिल की गई मेरी उपलब्धियों ने मुझे यहां तक पहुंचा दिया.’’

वसुधा की आंखों से आंसुओं की बरसात जारी थी, ‘‘शायद नियति ने मुझ से बदला लिया. तुम्हारी आंखों की रोशनी छीनने के अपराध में मुझे यह सजा दी कि मेरे करण की भी आंखें छीन ली. मुझे सिर्फ एक ही शिकायत है. गलती मेरी थी मगर सजा उस मासूम को क्यों मिली. अपराध मेरा था तो अंधेरों के तहखाने में मुझे डाला जाना चाहिए था, कुसूर मेरा था तो सजा की हकदार मैं थी, करण नहीं.’’

‘‘दिल छोटा न करो वसुधा और खुद को गुनाहगार मत समझो. करण के साथ जो हुआ वह एक हादसा था. मुझे यकीन है वह देख पाएगा. मैं ने उस की मैडिकल हिस्ट्री पढ़ी है. तुम्हे धैर्य रखना होगा. विश्वास के दामन को मत छोड़ो. देखना, एक सुबह ऐसी भी आएगी जब करण उगते हुए सूरज की लालिमा को खुद देखेगा,’’ मानव ने पूरे यकीन के साथ कहा.

‘‘और तुम? तुम कब देख पाओगे अपनी वसुधा को?’’ वसुधा ने ‘अपनी वसुधा’ शब्द पर जोर दे कर कहा.

‘‘वसुधा,’’ मानव की आवाज में कंपन था, ‘‘ऐसा सोचना भी मत. तुम एक ब्याहता स्त्री हो. तुम्हारा अपना एक परिवार है. आनंद जैसा अच्छे व्यक्तित्व का पति है. मैं जानता हूं वह तुम्हें बहुत चाहता है. किसी और के बारे में सोचना भी तुम्हारे लिए एक अपराध है.’’

‘‘मैं इनकार नहीं कर रही, मगर सचाई यह भी है कि मैं ने सिर्फ तुम्हें चाहा है. तुम्हें देखते ही मेरे सोए जज्बात फिर जाग उठे हैं. बुझे हुए अरमानों ने फिर से अंगड़ाइयां ली हैं,’’ वसुधा एक पल को रुकी, फिर मानो फैसला सुनाते हुए बोली, ‘‘अब मेरेतुम्हारे बीच में कोई नहीं आ सकता. तुम्हारा अंधापन भी नहीं. अगर आज मुझे यह मौका मिल रहा है तो मैं क्यों न फिर से अपनी खोई हुई खुशियों से अपने दामन को भरूं. आखिर, क्या गुनाह किया है मैं ने?’’

‘‘ऐसा सोचना भी हर नजरिए से गलत होगा,’’ मानव ने कुछ कहना चाहा.

‘‘क्या गलत है इस में?’’ क्या औरत को इतना हक नहीं कि वो अपना जीवन वहां गुजारे जहां उस का मन चाहे, उस शख्स के साथ गुजारे जिस की तसवीर उस ने बरसों से संजो रखी थी. क्या मैं दोबारा अपनी चाहत का गला घोट दूं?’’

‘‘तुम दोबारा बेवफाई भी नहीं कर सकती. पहली बार किया गुनाह, गलती हो सकती है, दोबारा किया गुनाह एक सोचासमझा जुर्म होता है और मेरा प्यार इतना गिरा हुआ नहीं है कि तुम्हें गुनाहगार बना दे.’’

अगले दिन फिर वसुधा मानव के आने से पहले ही उस के दफ्तर में पहुंच गई, साफसफाई करवाई, मेज पर ताजे फूलों का गुलदस्ता रखा और मानव का इंतजार करने लगी. इंतजार करतेकरते दोपहर हो गई. लंचटाइम में रमया जब दफ्तर में आई तो वसुधा को वहां पा कर चकित रह गई. ‘‘सर तो आज दफ्तर नहीं आएंगे, किसी कौन्फ्रैंस में गए हैं,’’ रमया ने यह कहा तो वसुधा ने एक ठंडी सांस ली, मायूसी से अपना बैग उठाया और अपने कमरे की ओर चल पड़ी.

शाम को रमया ने मानव को सारी बात बताई तो मानव चिंतित हो गया. उसे वसुधा से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा न थी. आखिर क्यों वसुधा उम्र के इस पड़ाव में ऐसी नादानी कर रही है? उस ने तो वसुधा की याद को मौत आने तक अपने सीने में दफन कर लिया था. क्यों वसुधा पुराने जख्मों को हरा कर रही है? क्यों नहीं सोच रही कि उस की गृहस्थी है. पति है, बच्चा है…अगले दिन जब उस ने फिर वसुधा को पाया तो उस की परेशानी और बढ़ गई. ‘‘तुम चाहो तो वापस दिल्ली लौट सकती हो, यहां करण…’’

‘‘जानती हूं, यहां करण की देखभाल होती रहेगी और वक्त आने पर आंखों के बारे में भी कुछ अच्छी खबर मिल जाएगी, मगर मैं दिल्ली तुम्हारे बगैर नहीं जाऊंगी. वहां जा कर आनंद से तलाक…’’ वसुधा कुछ कहना चाह रही थी मगर रमया को आते देख ठिठक गई.

वसुधा के आने का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. रमया के हिस्से का काम भी वह बड़ी मुस्तैदी से करती. काम के बीच वह कई बार खुद के और मानव के रिश्ते के बारे में जिक्र छेड़ देती जिसे वह किसी तरह से टाल देता.

एक शाम मानव ने रमया को बुला भेजा. रमया ने अपने ओवरकोट की जेब से चाबी निकाली और मानव के फ्लैट का दरवाजा खोला, सामने कोने में मानव सोफे पर धंसा हुआ था.

‘‘सर, आप ने याद किया?’’

‘‘आओ रमया, नए स्टूडैंट्स की मैडिकल हिस्ट्री अस्पताल को भेज देना और उन से कहना, डोनर्स की लिस्ट भी अपडेट कर लें.’’

‘‘आप कुछ परेशान लग रहे हैं, सर?’’

‘‘रमया, तुम्हें याद है मैं ने एक बार तुम्हें अपनी कहानी सुनाई थी, उस कहानी में जो लड़की थी…’’

‘‘वो वसुधा है और एक बार फिर उस बेचारी के बुझे हुए अरमानों ने पंख फैलाए हैं.’’

‘‘ओह, तो तुम सब जानती हो. मगर यह गलत है, मुझे उसे रोकना है. मैं नहीं चाहता कि उस का परिवार टूटे. लेकिन मैं यह समझ नहीं पा रहा कि कैसे उसे रोकूं. मुझे डर है कि कहीं वह अपने पति से वो सब न कह दे जो उसे नहीं कहना चाहिए. मुझे समझ में नहीं आ रहा कि यह कैसे मुमकिन हो पाएगा. लगता है वसुधा बहुत दूर निकल गई है, जहां से उसे उस का परिवार, परिवार वालों की खुशियां, कुछ भी नजर नहीं आ रहीं.’’

‘‘सर, आप जो चाहते हैं वह तभी हो पाएगा जब आप उस की जिंदगी से दूर चले जाएं, ओझल हो जाएं उस की जिंदगी से आप.’’

‘‘तुम ठीक कहती हो रमया. मुझे उस की जिंदगी से दूर ही नहीं, बहुत दूर जाना पड़ेगा.’’

‘‘सर, अगर आप को मेरी कहीं भी कोई भी जरूरत हो तो मुझे बेझिझक कहिएगा. मैं अगर आप की मदद कर पाई तो मुझे बेहद खुशी महसूस होगी.’’

‘‘रमया, मैं अंधा जरूर हूं लेकिन मैं मन की आंखों से तुम्हारे मन को देख पा रहा हूं. मैं जानता हूं कि तुम्हारी भावनाएं क्या हैं. तुम्हारे ढेरों एहसान हैं मुझ पर. फिर भी मैं ने तुम्हारे एहसासों को अनदेखा किया. जानती हो क्यों, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम अपनी जिंदगी अंधेरे के सहारे गुजारो, जबकि कई जगमगाते सितारे तुम्हारी राह तक रहे होंगे. मेरा साथ तुम्हें सिर्फ दुख और तकलीफों के अलावा कुछ नहीं दे सकता.’’

‘‘रोशनी में जल कर मरने वाले परवानों से पूछिए. मेरा दावा है कि वे रोशनी में तिलतिल कर मरने के बजाय अंधेरे में सुकून से मरना चाहेंगे,’’ रमया की आंखें से आंसू बह निकले.

‘‘तुम रो रही हो रमया, मत रोओ रमया, आंसू बचा कर रखो. मेरा साथ देना है तो ये आने वाले वक्त में काम आएंगे, इन्हें संजो कर रखो.’’

मानव ने वसुधा को फोन करवा के बुलाया. वसुधा मानो आने के लिए तैयार ही थी. ‘‘आओ वसुधा, मैं ने तुम्हारे और अपने रिश्ते के बारे में, भविष्य के बारे में बहुतकुछ सोचा. ईमानदारी से कहूं तो मैं आज तक एक पल के लिए भी तुम्हें भुला नहीं पाया हूं और आज जब तुम मुझे इस हाल में अपनाने को तैयार हो, तो मैं इस मौके को खोना नहीं चाहूंगा, करीब पा कर फिर मैं तुम्हें दूर नहीं कर पाऊंगा.’’

वसुधा को विश्वास ही नहीं हुआ, उसे मानो मनमांगी मुराद मिल गई थी. ‘‘मैं जानती थी मेरे प्यार में ताकत है, सचाई है. मैं कल ही वकील से…’’

‘‘नहीं वसुधा, अदालत के चक्कर, वकीलों की झंझट, उस से होने वाली रुसवाई और बदनामी की आग में मैं तुम्हें झुलसने नहीं दूंगा. मैं ने कुछ और ही सोचा है. वह तभी हो पाएगा जब तुम्हें साथ देना गवारा हो, तुम्हें सही लगे तो ठीक है वरना मेरी तरफ से तुम आज भी आजाद हो.’’

‘‘क्या सोचा है तुम ने, मैं हर हाल में तुम्हारे साथ हूं.’’

‘‘खून, कत्ल…’’

‘‘खून…आनंद का?’’ वसुधा सकते में आ गई.

‘‘हां वसुधा, और कोई रास्ता भी तो नहीं है. तुम सोच कर जवाब देना, कोई जबरदस्ती नहीं है. मेरे आदमी यह काम बखूबी कर देंगे, किसी पर शक नहीं जाएगा, न तुम पर न मुझ पर. कल भारतीय राजदूतावास में एक कार्यक्रम है जिस में भारत से कई व्यवसायी शिरकत कर रहे हैं, और दल को लीड करने वाला कोई और नहीं, तुम्हारा पति है, तुम्हारे बच्चे करण का पिता. वही आनंद, जिस के साथ तुम ने शादी का बंधन बांधा था और जिसे तुम अब तोड़ने जा रही हो. मैं चाहता हूं कल ही तुम्हारा पति तुम्हारा एक्स पति हो जाए. बस, तुम करीब एक लाख डौलर का इंतजाम कर दो.’’

वसुधा को शांत देख मानव ने आखिरी दाव फेंका, ‘‘आज अगर मैं अंधा न होता तो बढ़ कर तुम्हारे करीब आ जाता, अक्षम हूं, असहाय हूं वरना आनंद को खत्म करने के लिए मेरे दो बाजू ही काफी थे. आनंद को राह से हटा कर हम एक नई जिंदगी शुरू कर देते जहां सिर्फ हम होते, सिर्फ मैं और तुम.’’

‘हम नई जिंदगी जरूर जिएंगे,’ वसुधा ने मन ही मन यह सोच कर निर्णय लेते हुए कहा, ‘‘मैं कुछ न कुछ जरूर करूंगी.’’

अगले रोज आनंद को आते देख, खुशी और परेशानी के मिलेजुले भाव वसुधा के चेहरे पर आजा रहे थे, ‘‘यों अचानक. मुझे इत्तला तो दी होती.’’ वसुधा ने पूछा तो आनंद ने बेफिक्री से जवाब दिया, ‘‘मिलने का मजा तो तब ही हो जब मुलाकात अचानक हो. दरअसल, यहां एक औफिस का काम निकल आया, मैं ने सोचा, क्यों न एक टिकट में 2 काम किए जाएं. कहां है हमारा चश्मेबद्दूर. करण कुमार?’’ आनंद ने इधरउधर नजरें दौड़ाते हुए पूछा.

‘‘होस्टल में, उसे छुट्टी दिलाना यहां बहुत मुश्किल है.’’

‘‘कोई बात नहीं. हम सिंगापुर घूमेंगे. यह देखो क्रूज का टिकट. यहां से मलयेशिया, इंडोनेशिया…तब तक वीकैंड आ चुका होगा. तब हम अपने जिगर के टुकड़े के पास होंगे.

‘‘वैसे, करण कैसा है? उम्मीद है वो नर्वस नहीं होगा. हमेशा की तरह खुश. हर हाल में मस्त,’’ आनंद की आंखें नम थीं.

‘‘तुम थक गए होगे, थोड़ा आराम कर लो,’’ वसुधा ने सुनीअनसुनी करते हुए कहा, कमरे में सामान रखते हुए वसुधा मानो मुद्दे की बात करने को बेताब थी, ‘‘मेरे अकाउंट में एक लाख डौलर ट्रांसफर कर दो. कुछ फीस वगैरह देनी है.’’

‘‘जरा मैसेज पढ़ लिया करो मैडम. आप के अकाउंट में कल ही 2 लाख डौलर डाले हैं. वैसे, फीस, होस्टल चार्जेज सब मैं औनलाइन दे चुका हूं. अब एक लाख डौलर से किसी की जान लेने का इरादा है क्या?’’ आनंद एक पल के लिए रुका, फिर हौले से बोला, ‘‘जानती हो, दौलत के बारे में मेरी क्या सोच है? लोगों की दौलत आतीजाती रहती है, मगर मैं ने जो दौलत कमाई है वो मेरे पास से कभी नहीं जाएगी. उसे मुझ से कोई छीन नहीं सकता.’’

‘‘ऐसा कौन सा इन्वैस्टमैंट कर दिया तुम ने जिस पर तुम्हें इतना ऐतबार है?’’

‘‘तुम, वसुधा तुम, मेरी जिंदगी की सब से बड़ी दौलत, सब से बड़ा इन्वैस्टमैंट तुम हो, जो आज भी मेरी है, कल भी रहेगी और मरते दम तक मेरी ही रहेगी.’’ वसुधा को काटो तो खून नहीं.

‘‘बस, अब एक ही चाहत है हमारा करण जल्द ही अपनी आंखों से यह दुनिया देखे. अंधेरों से निकल कर उजाले में आए?’’ आनंद ने कहना जारी रखा.

वसुधा ने अपने आंचल के छोर से आनंद की आंखों से बहते आंसुओं को पोंछा और मन ही मन कहा, ‘तुम मुझे कमजोर नहीं कर सकते.’

‘‘मानव, तुम जानते हो मैं मौके की तलाश में हूं. आज जब आनंद कौन्फ्रैंस में जाएगा तो मैं पैसे निकाल लूंगी. तुम मुझे बारबार फोन मत करो.’’ वसुधा मानव से फोन पर बात कर रही थी और जल्द से जल्द बात पूरी करना चाह रही थी.

रात को फिर वसुधा के फोन की घंटी बज गई. दूसरी ओर मानव था, ‘‘आनंद मुझे भी कौन्फ्रैंस में ले गया. सो, मुझे न वक्त मिला और न ही मौका,’’ वसुधा ने बताया.

‘‘और कल तुम क्रूज पर जा रही हो? फिर?’’

‘‘तुम्हें यह भी मालूम है?’’ वसुधा चकित थी.

‘‘अंधा हूं, इसलिए मैं ने किराए पर आंखें ली हुई हैं ताकि मेरी आंखें न होने का कोई फायदा न उठा सके. मेरे आदमी तुम्हारे आसपास रहेंगे. मुझे तुम पर विश्वास है तुम मुझे पैसे दे दोगी. वैसे भी आनंद के मरने के बाद सबकुछ हमारा ही होगा. कल शाम को 3 बजे तुम क्रूज के डेक पर पहुंचोगी, वहां आनंद का पैर फिसलेगा और वह समंदर की लहरों में समा जाएगा. उधर आनंद खत्म, इधर करण का काम तमाम. होस्टल की खिड़की से मासूम गिर पड़ेगा और…’’

‘‘यह क्या कह रहे हो तुम,’’ वसुधा लगभग चीखते हुए बोली.

‘‘शांत वसुधा, शांत, तुम्हें तो मेरे दिमाग की दाद देनी चाहिए. आनंद के मरने के बाद करण भी तो आधी दौलत का हिस्सेदार रहेगा और फिर बारबार तुम्हें तुम्हारे अतीत की याद दिलाता रहेगा.’’

‘‘तुम ऐसा नहीं करोगे,’’ वसुधा ने ऊंची आवाज में कहा तो अनायास ही आनंद की आंख खुल गई, ‘‘किस पर गुस्सा कर रही हो?’’

‘‘कोई नहीं, यों ही, होस्टल की वार्डन का फोन था.’’

क्रूज पर ठीक 2 बजे वसुधा के कमरे की घंटी बजी, ‘‘मैडम, हाई टी तैयार है. आप साहब को ले कर डेक पर आ जाएं.’’

‘‘यहां तो बिन मांगे मोती मिल रहे हैं. वसुधा, चलो.’’

‘‘नहीं, हम नहीं जाएगे, मेरे सिर में दर्द है.’’

‘‘तो साहब आप आ जाइए. हम ने आप के लिए ही तो सारा इंतजाम किया है.’’

‘‘नहीं, साहब भी नहीं आएंगे. कह दो जा कर हम नहीं आएंगे, किसी सूरत में भी नहीं.’’

आनंद अचरज से वसुधा को देखने लगा, ‘‘तुम्हें अचानक क्या हो गया? क्यों बेचारे को डांट रही हो?’’ वसुधा को मानो अपनी भूल का एहसास हुआ, ‘‘मेरे सिर में दर्द है और तुम डेक पर ठंडीठंडी हवा खाओगे अकेलेअकेले?’’

वसुधा ने कहा तो आनंद ने वेटर से चले जाने को कहा.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है मानव, माना कि तुम्हारी आंखों की खराबी के बावजूद तुम आंखें दान दे सकते हो और ये करण की आंखों से मैच भी करती हैं, पर हर काम का एक तरीका होता, नियम होता है. कायदाकानून भी तो कोई चीज होती है. यों हम जीतेजी तुम्हारी आंखें उसे नहीं दे सकते.’’

‘‘क्यों नहीं दे सकते डाक्टर. मैं तो वैसे भी नहीं देख सकता. मेरी आंखें सिर्फ सजावट के लिए हैं, मेरे लिए बेजान हैं, बेकार हैं, अगर इन से उस नन्हे बच्चे की आंखों की रोशनी मिल सकती है, तो क्यों नहीं?’’

‘‘मुझे कौंसिल में बात करनी पड़ेगी, मानव.’’

‘‘ठीक है डाक्टर. पर कृपया मेरी मदद करो. समझो कि बरसों पहले जो खुशी मैं किसी को देना चाह रहा था, उसे देने का समय अब आया है.’’

कौंसिल ने जल्द ही अपना फैसला सुना दिया. नियम के मुताबिक, किसी जिंदा इंसान की आंखें किसी और को नहीं दी जा सकतीं. सिर्फ मृत्यु के बाद ही ऐसा हो सकता है और यह कानून विश्व के हर देश में लगभग एकजैसा ही है.

मौसम की खराबी और लगातार होती बारिश की वजह से क्रूज अपनी रफ्तार और दिशा दोनों खो बैठा था. संपर्क सूत्र भी न के बराबर थे. इसलिए वसुधा को करण से बात न कर पा सकने का बेहद मलाल था. किनारे पहुंचते ही उस ने सब से पहले करण को फोन साधा. मगर बात न हो पाई. ‘‘शायद क्लास में होगा,’’ आनंद ने कहा तो वसुधा ने हामी भरी.

स्कूल के बाहर ही उन की टैक्सी को रोक लिया गया और आगे पैदल जाने की हिदायत दी गई. आनंद ने सामान उठाया और स्कूल की तरफ चल पड़े. रास्ते में एक शख्स से रास्ता रोकने का कारण पूछा तो पता चला कि कोई हादसा हो गया था. खिड़की से गिर कर किसी की मौत हो गई थी.

वसुधा चिंतित हो गई. आनंद ने पुलिस वाले से तहकीकात की तो उस ने सिर्फ इतना बताया कि जो मरा उस की मरने की उम्र नहीं थी.

भारी कदमों से और आशंकित मन से वसुधा ने स्कूल प्रांगण में प्रवेश किया. एक अजीब सी भयावह खामोशी छाई हुई थी. न बच्चों का शोर, न अफरातफरी, न भागदौड़ का माहौल. बाहर ही रमया नजर आई तो वसुधा भाग के उस तक पहुंची. उसे देख मानो रमया के सब्र का पैमाना छलक गया, ‘‘मैडम, सब खत्म हो गया.’’

‘‘क्या हुआ, करण कहां है, कहां है वह, ठीक तो है न?’’

‘‘मैं यहां हूं मम्मी,’’ वसुधा के कानों में रस भरती आवाज आई तो उस ने उसी दिशा में नजरें घुमा दीं, सामने करण खड़ा मुसकरा रहा था. ‘‘वाह मम्मी, लाल साड़ी में तो आप लालपरी लग रही हैं.’’

‘‘अच्छा ठीक है, मस्का छोड़ और बता, कैसा है तू?’’ वसुधा ने उतावलेपन से पूछा, मगर अगले ही पल ठिठक गई ‘‘तुझे कैसे पता चला कि मैं ने लाल साड़ी पहनी है.’’

‘‘क्योंकि काले चश्मे के अंदर से करण की आंखें देख पा रही हैं. ठीक वैसे ही जैसे आप की और मेरी,’’ यह रमया की आवाज थी. वसुधा को सहसा विश्वास ही नहीं हुआ. उस ने कस के करण को भींच लिया. उस की आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. ‘‘कैसे हुआ यह सब. और यहां हादसा कौन सा हुआ…’’

‘‘सब बताती हूं, मगर पहले करण को वापस अंदर बैड पर जाना होगा. करण की आंखों पर जोर नहीं पड़ना चाहिए, आंनदजी आप को भी करण के साथ जाना पड़ेगा, कागजी कार्यवाही पूरी करनी है.’’

मानव के कमरे में प्रवेश करते ही वसुधा का कलेजा मानो मुंह तक आ गया. सामने मानव की तसवीर पर हार चढ़ा हुआ था. वसुधा वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गई. एकटक उस ने उस की तसवीर को निहारा और फिर कहा, ‘‘मैं सब समझ गई. मैं समझ गई कि उस ने कितना बड़ा बलिदान किया मेरी गृहस्थी को बचाने के लिए, शायद इसीलिए उस ने खुद को एक खुदगर्ज प्रेमी के रूप में पेश किया. मगर उस की मौत…’’

‘‘अस्पताल और मैडिकल बोर्ड के कानून के मुताबिक, एक जिंदा इंसान अपनी आंखें दान नहीं कर सकता. उस रात मानव ने मुझे फोन किया, ‘रमया, जो हालात हैं उस में अगर मैं इस दुनिया से चला जाता हूं तो वसुधा, उस की ब्याहता जिंदगी, उस की गृहस्थी बच जाएगी. साथ ही, करण को आंखे मिल जाएंगी, वह देख पाएगा और उस के साथसाथ वसुधा की जिंदगी का भी अंधेरा दूर हो जाएगा. उस की खोई हुई तमाम खुशियां उसे मिल जाएंगी, मेरी मौत उसे उस कशमकश से हमेशा के लिए आजाद कर देगी जिस ने उस का सुख, चैन, मन की शांति सब छीन लिया है. मेरी मौत पूरे परिवार को एक नई जिंदगी दे पाएगी, मेरी जिंदगी तो वैसे भी बेकार है, जीना और न जीना सब बेमानी है. उस का इस से अच्छा इस्तेमाल क्या होगा?’

‘‘‘लेकिन मानव, तुम ऐसा नहीं कर सकते. हम कुछ और रास्ता तलाश करेंगे. प्लीज, अपनी जान देने  के बारे में सोचना भी मत, तुम्हारी जान पर किसी और का भी हक है?

‘‘‘जानता हूं. मगर तुम्हीं ने तो कहा था कि मेरे ओझल हुए बगैर वसुधा को अपना परिवार नजर नहीं आएगा. मुझ पर आखिरी एहसान करना, थोड़ी ही देर में एक जोरों की आवाज आएगी. शायद, उस आवाज में मेरी चीख भी शामिल होगी. तुम बिना समय गंवाए, नीचे लौन में चली जाना, मैं लाश बन कर वहीं तुम्हारा इंतजार करूंगा. मेरी जेब में एक पत्र मिलेगा, उस में लिखा होगा कि मेरी आंखें करण को दी जाएं.’

‘‘मैं उस के आगे नहीं सुन पाई और बेहताशा भागती हुई लिफ्ट की ओर पहुंची. मैं चीखती जा रही थी, ‘मानव सर आत्महत्या कर रहे हैं, कोई उन्हें रोको.’ इस के पहले कि कोई कुछ समझ पाता, एक आवाज और हृदयविदारक चीख सुनाई पड़ी और फिर सबकुछ शांत हो गया.

रमया और वसुधा दोनों आंसुओं के सैलाब में फोन की घंटी बजने तक बहती रहीं. आनंद ने फोन पर कुछ कहा, जिसे वसुधा मुश्किल से सुन पाई. अगले दिन दिल्ली की फ्लाइट पकड़ने के लिए वसुधा, करण और आनंद हवाईअड्डे पर पहुंच चुके थे. रमया ने लिपट कर रोती हुई वसुधा को एक लिफाफा दिया जिस में मानव की तसवीर थी. मानव की इच्छा थी कि यादगार के तौर पर उस की यह तसवीर करण को दी जाए और उस से कहा जाए कि बड़ा हो कर अगर हो सके तो वह एक आंखों का डाक्टर बने और जीवन की आपाधापी में से वक्त निकाल इस अस्पताल में आ कर अंधेरे से लड़ते हुए बच्चों को रोशनी की किरण दिखाए.

राजेश कुमार रंगा

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