लेखक-प्राची भारद्वाज

सारिका को देख श्रीकांत सन्न रह गया था. उसे समझ नहीं आया कि सारिका का सामना कैसे करे और उसे क्या कहे. आखिर उस के साथ गलत भी तो उसी ने किया था.

‘‘लगता है जब तक तू पिटेगा नहीं, तेरे भेजे में इत्ती सी बात घुसेगी नहीं...,’’ आज फिर शांता ने घर सिर पर उठा रखा था. बेचारा नन्हा विपुल डर के मारे तितरबितर भाग रहा था. रोज का काम था यह. शांता के बदमिजाज व्यक्तित्व ने सारे घर में क्लेश घोल रखा था. शाम को दफ्तर से घर लौट रहे श्रीकांत ने घर के बाहर ही चीखने की आवाजें सुन ली थीं. ‘‘क्या शांता, आज फिर तुम विपुल पर चिल्ला रही हो? ऐसा क्या कर दिया इस नन्ही सी जान ने?’’

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