यह विडंबना ही थी कि जो खुशियां श्वेता के हिस्से में आनी चाहिए थीं वे उस की छोटी बहन पल्लवी के दामन में चली गई थीं. श्वेता ने भी हालात से समझौता कर लिया था. लेकिन यह वक्त का कैसा फेर था कि पल्लवी की वजह से खुशियां एक बार फिर उसे मिल रही थीं?

छोटी बहन पल्लवी की मृत्यु का तार पाते ही मैं व्यग्र हो उठी. मन सैकड़ों प्रकार की आशंकाओं से भर उठा. तार झूठा तो नहीं, भला बिना किसी बीमारी के पूरी तरह स्वस्थ युवती की मृत्यु हो सकती है? ऐसा कैसे हो सकता है?

मैं कई बार उलटपलट कर तार के कागज को घूरती रही, उस पर छपे अक्षरों को पढ़ती रही, कहीं भी कुछ जाली नहीं था. मेरे तनमन में शीतलहर सी दौड़ती चली गई. पिछले महीने ही तो मैं दिल्ली जा कर पल्लवी, उस के पति तरुण व 3 महीने की प्यारी सी रुई के गोले जैसी बिटिया नूरी से मिल कर आई थी. तब कहां सोचा था, कुछ दिन बाद मुझे पल्लवी की मृत्यु की सूचना मिलेगी.

उस वक्त पल्लवी मुझे देख कर प्रसन्नता से खिल उठी थी. अपनी बिटिया को छाती से चिपकाए, वह सैकड़ों प्रकार की सुखद कल्पनाओं में डूबी रहती थी. उस के राहतभरे संतुष्ट चेहरे से सुखी दांपत्य जीवन का आभास मिलता था. फिर अचानक ऐसा क्या हादसा हो गया? कौन सी आकस्मिक बीमारी ने पल्लवी को छीन कर उस हरीभरी बगिया को उजाड़ डाला?

अपने कमरे में लगी पल्लवी की मुसकराती तसवीर को देख कर मैं देर तक आंसू बहाती रही. रात में दिल्ली के लिए कोई गाड़ी नहीं थी. रातभर रोती रही. सुबह छुट्टी का आवेदनपत्र छात्रावास की एक सहेली को पकड़ा कर व पहली गाड़ी पकड़ मैं रवाना हो गई.

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