शृंगारमेज के आगे खड़ी हम दोनों अपनीअपनी प्रथम ‘डेट’ के लिए शृंगार कर रही थीं. अदिति अपने मंगेतर रीतेष के लिए आकांक्षाओं से भरा दिल लिए, कंपकंपाते हाथों से अपेक्षाओं को सहेजती हुई और मैं पीयूष के लिए आशंकाओं भरा दिल लिए, थरथराते हाथों से अनिश्चितता का दामन पकडे़.

हम दोनों के होंठ यदाकदा कुछ बुदबुदा देते थे. एकदूसरे के आमनेसामने खड़े हो बात करने का साहस दोनों ही नहीं जुटा पा रही थीं. दर्पण की छवि ही बिना एकदूसरे का सामना किए कभीकभार कुछ बोल देती थी.

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