‘‘कुलक्षणी,अभी से जवानी फूट पड़ी... शर्म नहीं आई तुझे  बाप तो चला गया और मेरे ऊपर यह मुसीबत... किस से कहूं  क्या करूं ’’

पड़ोसिन अचला के रोनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर मैं ने उन के घर की घंटी बजाई. उन से हमारे बहुत ही अच्छे संबंध थे. दरवाजा खोलते ही मुझे देख कर वे रोते हुए बोलीं, ‘‘कहीं का नहीं छोड़ा इस ने मुझे... पिता तो चल बसे हैं... मेरा तो कुछ खयाल करती  मैं क्या इस के बारे में नहीं सोचती हूं  इसी के लिए तो जी रही हूं.’’

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