लेखिका- निक्की लाल

एक शाम मैं सीडी पर अपनी मनपसंद फिल्म ‘बंदिनी’ देख रही थी कि अपने सामने के खाली पड़े दोमंजिले मकान के सामने ट्रक रुकने और कुछ देर बाद अपने दरवाजे पर दस्तक पड़ते ही समझ गई कि अब मैं फिल्म पूरी नहीं देख पाऊंगी. खिन्नतापूर्वक मैंने दरवाजा खोला तो सामने ट्रक ड्राइवर को खड़े पाया. वह कह रहा था, ‘‘सामने जब रस्तोगी साहब आ जाएं तो उन्हें कह दीजिएगा, मैं कल आ कर किराया ले जाऊंगा.’’

मैं कुछ कहती, इस से पहले वह चला गया.

मैं बालकनी में ही कुरसी डाल कर बैठ गई. शाम को सामने वाले घर पर आटोरिकशा रुकते देख मैं समझ गई कि वे लोग पहुंच गए हैं.

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घंटे भर में नमकीन-पूरी और आलू-मटर की सब्जी बना कर टिफिन में पैक कर के मैं अपने नौकर के साथ सामने वाले घर पहुंची. कालबैल बजाने पर 5 साल की बच्ची ने दरवाजा खोला. तब तक रस्तोगीजी अपनी पत्नी सहित वहीं आ पहुंचे.

मैंने बताया कि मैं सामने के मकान में रहती हूं. मिसेज रस्तोगी ने नमस्कार किया और बताया कि उन का मेरठ से दिल्ली स्थानांतरण हुआ है. सफर से थकी हुई हैं,

घर भी व्यवस्थित करना है और बच्चे भूखे हैं, अभी तुरंत तो गैस का कनैक्शन नहीं मिलेगा. कुछ समझ में नहीं आ रहा है, क्या करूं?

मैंने कहा, ‘‘घबराइए नहीं. मैं घर से खाना बना कर लाई हूं. नहा-धो कर खाना वगैरह खा लीजिए. वैसे मेरे घर में 1 अतिरिक्त सिलेंडर है, फिलहाल उस से काम चला लीजिए. बाद में कनैक्शन मिलने पर वापस कर दीजिएगा.’’

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