लेखिका- रोचिका अरुण शर्मा

‘युवक को बचाने के लिए बुजुर्ग का बैड लेने से इनकार, 3 दिनों बाद स्वयं की मृत्यु’ शीर्षक से प्रकाशित खबर पढ़ कर रति बुदबुदाई, ‘मैं ही तो हूं वह महिला, जिस ने अस्पताल में फूटफूट कर रोना शुरू किया था.’ उसे सब समझते देर न लगी... रति के पति विशाल 2 दिनों से सिर में दर्द व थकावट की शिकायत कर रहे थे. उन्होंने कहा कि ‘‘शायद नींद पूरी नहीं हुई है.’’ ‘‘आराम कीजिए आप, सारे दिन लैपटौप में आंखें गड़ाए काम भी तो करते हैं,’’ रति के कहने पर विशाल ने सिरदर्द की दवा ली और दूसरे कमरे में जा कर सो गए. रति मन ही मन चिंतित थी कि इन्हें तो आराम करने को कह रही हूं पर कहीं इन्हें... उफ्फ, मैं भी न क्या फालतू की बात सोचने लगी हूं. अगले दिन विशाल को बुखार भी चढ़ने लगा था. ‘‘विशाल, यह लो थर्मामीटर, अपने शरीर का तापमान देखो तो,’’ रति ने मास्क पहन कर उसे थर्मामीटर थमाया. तापमान सौ डिग्री था. विशाल ने स्वयं ही पास के डाक्टर को फोन किया और अपनी स्थिति बताई.

‘‘लग तो कोरोना के लक्षण ही रहे हैं. यों करिए, आप अस्पताल जा कर सीटी स्कैन करवा लीजिए, कुछ ब्लड टैस्ट भी व्हाट्सऐप पर बता देती हूं, आप जा कर करवा लीजिए और फिर रिपोर्ट मुझे दिखाएं.’’ घर में मानो भूचाल सा आ गया था. विशाल के पृथकवास यानी आइसोलेशन के लिए उस की पत्नी ने अलग कमरा तैयार कर दिया था. सभी टैस्ट हुए, रक्त की जांच भी करवा ली गई थी और आज रिपोर्ट भी आ गई. डाक्टर ने सारी रिपोर्ट्स देख कर कोरोना का संक्रमण होने की पुष्टि कर दी थी. रति के हाथपैर फूल गए थे. विशाल की शारीरिक स्थिति से अधिक मानसिक स्थिति खराब थी. एक कमरे में बंद हर पल यही विचार मन में आता कि ‘यदि मुझे कुछ हो गया तो बच्चों का क्या होगा? उन की शिक्षा के लिए कैसे इंतजाम करेगी अकेली रति? कभी ऐसा सोचा ही नहीं था कि ऐसी महामारी यह सोचने पर विवश कर देगी. वैसे कुछ इंश्योरैंस पौलिसी तो ली हुई हैं मैं ने अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए.

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