सनराइज होटल के लौन में वे गुलाब और गेंदे के पौधों को सींच रहे थे, तभी होटल के मैनेजर अभिलाष ने उन्हें पुकारा, ‘‘विश्वास दा, अब बस करिए. देखिए, आप से कुछ लोग मिलने आए हैं.’’ उन्होंने झट से सींचना बंद किया और बरामदे की ओर बढ़े अभिलाष के साथ एक अधेड़ विदेशी पर्यटक और एक फिल्म कैमरामैन खड़ा था. दोनों ने उन्हें देख कर ‘हैलो’ कहा. विश्वास दा ने सिर झुकाया और प्रणाम किया. तभी अभिलाष बोल उठा, ‘‘दादा, ये विदेशी पर्यटक हैं और हैवलौक द्वीप पर कोई डाक्यूमैंट्री फिल्म बनाना चाहते हैं. मैं ने आप के बारे में बताया, ये लोग आप की फोटो लेंगे, जल्दी से कपड़े बदल कर आइए. विश्वास दा फौरन होटल के पीछे वाले आउटहाउस में चले गए. मैनेजर पर्यटक और कैमरामैन से बतियाता रहा. कुछ क्षण बाद अपना हुलिया बदल कर लौट आए. उन्होंने सफेद पायजामा और कुरता पहना हुआ था.

अमलतास के पेड़ के नीचे आर्मेट की कुरसियां रखी गई थीं. विदेशी पर्यटक ने दादा को कुरसी पर बैठने को कहा. ठीक उन की ओर मुंह किए कुरसियों पर दोनों पर्यटक महाशय और अभिलाष बैठे हुए थे. कैमरामैन कैमरे को स्टैंड में लगाए उन के पार्श्व में खड़ा था.

‘‘दादा, ये आप से पूछना चाहते हैं कि आज और बीते कल के जमाने के हैवलौक में क्या फर्क है? आप ने अपना संघर्ष कैसे किया? अपनी जमीन को होटलमालिकों को बेच कर क्या आप खुश हैं?’’ अभिलाष ने दादा  को बताया.

पहले विश्वास दा ने रूमाल से पसीना पोंछा और अपने को संयत किया. पहली बार कोई उन की वीडियो शूट कर रहा था.

‘‘स्टार्ट कैमरा,’’ पर्यटक ने कहा.

कैमरा चालू हो चुका था. अभिलाष ने इशारे से विश्वास दा से कहा कि वे बोलें. टूटीफूटी हिंदीबंगला मिश्रित भाषा में उन्होंने कहा, ‘‘हैवलौक और नील द्वीप सैलानियों का बहुत खूबसूरत स्थल बन जाएगा, यह तो हम ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था. विभाजन के बाद सरकार ने हम को इधर ला कर बसाया. हम ने और दूसरे विस्थापितों की टोलियों ने खूनपसीना एक कर दिया इन जंगलों को काट कर कृषियोग्य भूमि बनाने में. हमारी आजीविका कृषि थी. हमारे बच्चे भी यहीं हुए.’’ तभी पर्यटक महाशय ने अंगरेजी में कहा, ‘‘दैट्स नाइस, ओके. व्हाट अबाउट मनी यू रिसीव्ड फौर योर लैंड?’’

दादा कुछ समझ न पाए. अभिलाष ने उन्हें दुविधा से निकाला, ‘‘दादा, ये पूछ रहे हैं अपनी जमीन का आप को जो पैसा मिला उस से क्या आप संतुष्ट हैं?’’ विश्वासनाथ ने अपनी 2 उंगलियां हवा में उठा दीं और कहा, ‘‘दो कौड़ी (करोड़). मेरे परिवार के सभी लोग बहुत खुश हैं,’’ लेकिन दूसरे ही क्षण दर्द की एक रेखा उन के चेहरे पर उभरी. उन्होंने तुरंत रूमाल से मुंह से पोंछा.

‘‘ओके, कट, कट,’’ पर्यटक महाशय की आवाज आई, ‘‘थैंक्यू मिस्टर विश्वासनाथ,’’ उस ने झट से बढ़ कर दादा से हाथ मिलाया.

दादा के सख्त और खुरदरे हाथ को महसूस करते ही उस ने झट अपना हाथ खींच लिया.

‘‘ओह, सो स्ट्रौंग,’’ उस ने कहा और झट कुरसी से उठ खड़ा हुआ. कैमरामैन ने भी अपना कैमरा कंधे पर रख लिया था. पर्यटक महाशय और उस के साथी कुछ देर तक अभिलाष से बातें करने के बाद विदा ले कर चले गए.

उसी समय किसी ने अभिलाष को होटल के भीतर बुला लिया था. वह जाने लगा, ‘‘दादा, ये कुरसियां बरामदे में रखवा दीजिए,’’ उस ने कहा. कुरसियां रखवाने के बाद सुस्ताने के उद्देश्य से वे बरामदे के चबूतरे पर बैठ गए और अपने हाथों को देखते हुए सोचने लगे, यही तो वे हाथ हैं जिन की सख्ती में महीनों की मेहनत का दर्द छिपा है, जंगलों को मैदान में बदलने का एहसास भी. स्मृतियों का एक रेला उन्हें 40 बरस पीछे लिए चला जा रहा था… उन दिनों जब विश्वासनाथ और उन के जैसे दूसरे लोग कलकत्ता के शरणार्थी कैंपों में अपनी जिंदगी जी रहे थे. उन में औरतें भी थीं, बच्चे भी, उम्रदराज बूढ़े भी. जमीन से उखड़ना उन की नियति बन गई थी.

वहां हर सुबहशाम पुनर्स्थापना अधिकारी आतेजाते रहते थे. सरकार की मंशा थी कि पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित इन हिंदू परिवारों को भारत की मुख्यभूमि से दूर अंडमान के अलगअलग द्वीपों में बसाया जाए. कैंपों में वर्षों से लोग रह रहे थे. ये वही लोग थे जो अपने गांव, अपनी जमीन को छोड़ कर पूर्वी पाकिस्तान से भागने को मजबूर हुए.

भारत के विभाजन के बाद दंगेफसाद के माहौल में तब रहना सुरक्षित कहां था. उन्हें कोई ठिकाना तो चाहिए था. मुसलिम बहुतायत की जगहों से हिंदू पलायन कर रहे थे. कैंपों में अंडमान भेजने की कोशिशें जोरों पर थीं. एक शाम की बात है,  पुनर्स्थापना अधिकारी विश्वासनाथ के शिविर में आ धमका.

उस ने विश्वासनाथ को बुलाया, ‘ए, इधर आ.’

वे एक कोने में बैठे थे. वे तुरंत अफसर के पास चले आए. रिहैबिलिटेशन अफसर ने फौरन उन के हाथों को मजबूती से खींचा.

‘ओह, स्ट्रौंग, गुड,’ अधिकारी ने कहा, ‘तुम लोगों को कल जहाज से अंडमान ले जाया जाएगा, समझे. तुम्हारी घरवाली है?’

‘हां साहब, है,’ उन्होंने कहा. उन की पत्नी सौदामिनी कैंप में ही उन के साथ थी. उन के साथ अन्य टोलियों को उस दिन छांटा गया. मनुष्य की एक कुत्सित मानसिकता के आगे, एक पागलपन के कारण छूट गए धान के वे खेत, गांव के तालाबपोखर जहां वे मछलियां पकड़ा करते थे. अपनी जमीन से उखड़ने के इसी दुख में उन के बूढ़े पिता चल बसे थे. अपने पति के विछोह में उन की मां दुनिया छोड़ गईं. बच गए थे विश्वासनाथ और उन का छोटा भाई.

अगली सुबह अपने साथियों के साथ उन्हें जहाज पर चढ़ा कर रवाना कर दिया गया था. कलकत्ता से छूटने के बाद जहाज के डैक पर खड़ेखड़े विश्वासनाथ और उन के साथी सागर के असीम विस्तार को देख कर चकित होते गए थे. 1 दिन, 2 दिन, 3 दिन…अंडमान अब भी बहुत दूर था. औरतों की हालत ठीक नहीं थी. उन्हें लगातार उल्टियां हो रही थीं. 7वें दिन उन की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्होंने अंडमान के छितरे हुए द्वीपों को देखा. उन सभी टोलियों को पोर्टब्लेयर के बंदरगाह में उतारा गया और अगले दिन विश्वासनाथ और उन के साथियों को एक मोटर नौका द्वारा बारीबारी से हैवलौक द्वीप पहुंचाया गया. अपनी जमीन से उखड़े ये लोग फिर बसने जा रहे थे. उखड़ना और बसना उन की नियति जो है.

चीफ कमिश्नर के आदेश के अनुसार, राजस्व विभाग ने उन के रहने के लिए अस्थायी झोंपड़ी की व्यवस्था कर दी थी. राजस्व विभाग के अधिकारी अपनी फटफटी में बैठ कर वहां आते थे. निर्वासितों का काम होता जंगलों को काट कर कृषियोग्य बनाना. अधिकारी उन्हें जंगल के भीतर ले जाते. कभी मील दो मील पैदल भी चलना पड़ता. अधिकारी उन्हें 15 बीघा या लगभग 30 बीघा (10 एकड़) जमीन नाप कर देते जाते. निशानी के तौर पर वहां लकड़ी की बनी एक खूंटी भी गड़वा देते, यही क्रम होता. आज विश्वासनाथ और सौदामिनी को भी अपनी जमीन मिल गई थी. उन के साथ उन का छोटा भाई लक्ष्मण भी था. उन के जीवन का स्वर्ण अध्याय शुरू हो चुका था. राजस्व अधिकारी के कारिंदे ने एक कुल्हाड़ी और 2 तेज धार वाली दाव विश्वासनाथ को दीं और कहा, ‘लो भई, विश्वासनाथ, शुरू हो जाओ.’ विश्वासनाथ ने कुल्हाड़ी अपनी मजबूत हाथों में ली, कमर में गमछे को कस कर बांधा और अपनी जमीन पर खड़े पहले के पेड़ों पर कुल्हाड़ी से वार करने लगे. धम…धम…कुल्हाड़ी चलने की आवाज से जंगल गूंजने लगा. विश्वासनाथ का छोटा भाई उन का साथ देने लगा. सौदामिनी झाडि़यों, बेलों को साफ करने में जुट गई.

पसीने की शक्ल में खून शरीर से बहता रहा. दिन सप्ताहों में, सप्ताह महीनों में बदलते रहे. लगभग एकतिहाई जंगल गायब हो गए थे और उन सब की जगह उभर आए थे नई मिट्टी की सुवास लिए, छोटेछोटे तालाबपोखरों, नालों को समेटे छोटेछोटे गांव. मानचित्र पर विजयनगर, श्यामनगर, राधानगर जैसे गांव उभर आए. अपने नए गांव विजयनगर में विश्वासनाथ और सौदामिनी बहुत खुशी से जिंदगी बिता रहे थे. बांस की चटाई से बनी दीवारें व टिन के छप्पर से बने उन के घर आरामदायक थे. सौदामिनी यहीं पर पहली बार मां बनी थी. उस ने बेटे को जन्म दिया था. नाम रखा गया-हीरेन. वह हीरा ही तो था जिस के आने के बाद सौदामिनी का जीवन चमक उठा था. 5 एकड़ जमीन में उन के धान के खेत लहलहा उठे थे, शेष 5 एकड़ में सुपारी, केले, नारियल इत्यादि के वृक्ष खड़े थे. सब्जियों की भी क्यारियां लगा रखी थीं उन्होंने.

अगले 5 वर्षों में उन के और 2 संतानें हुईं, बेटा नरेन और बेटी दीपशिखा. खेतखलिहानों में कूदतेफांदते वे बड़े हुए थे. चूंकि गांव में ही प्राइमरी स्कूल खुल गए थे, सभी बच्चे वहीं सरकारी स्कूल में पढ़ने लगे. विश्वासनाथ को मछली मारने का बहुत शौक था. उन्हें जेटी के मछुआरों की तरफ से एक छोटी लकड़ी की बनी नाव मिल गई थी जिस में बैठ कर वे विजयनगर के सागर में जा कर मछलियां पकड़ा करते थे. बड़ा बेटा हीरेन अकसर अपने बापू के साथ मछली पकड़ने जाया करता. विश्वासनाथ को यों लगा जैसे पूर्वी पाकिस्तान में खो गए सुनहरे दिन यहां विजयनगर की जमीन पर वापस लौट आए हैं, खेत से धान, मछलियों, सब्जियों की आय…एक औसत दरजे का जीवन वे जी रहे थे.

‘‘दादा, अभी तक यहां बैठे हो…’’ अचानक अभिलाष की आवाज से अतीत की यादों का वह रेला एकाएक गुम हो गया, ‘‘नाश्ता कर लीजिए,’’ उस ने कहा.

अभिलाष ही वह व्यक्ति था जिस ने विश्वासनाथ के जीवन की धारा को मोड़ने में मदद की थी. उस दिन के बाद से विश्वासनाथ और दूसरे कुछेक विस्थापितों के जीवन की परिभाषाएं बदलती जा रही थीं. पंचसितारा होटल और रेस्तरां के मालिक विजयनगर के सागर किनारे की भूमि का मोलतोल करने आ पहुंचे थे जो विस्थापितों की मिल्कियत थी. होटल के एक प्रतिनिधि के साथ अभिलाष ही इस व्यापार की सूचना देने आया था. अभिलाष वैसे कृष्णानगर के उन के एक ममेरे भाई हरिपाद सरकार का बेटा था. विश्वास दा पुन: अतीत की यादों में खो गए. उन्होंने जब यह सुना कि उन की 15 बीघे जमीन के बदले उन्हें लगभग 2 करोड़ या उस से ज्यादा रुपए मिलेंगे तो उन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उन की आंखें कुछ क्षण के लिए अपलक बड़ी हो गईं. जब बच्चों ने यह सुना, वे भी अचंभे में पड़ गए परंतु सौदामिनी को विश्वास नहीं हो रहा था.

‘2 करोड़ रुपए तो बहुत होते हैं न. इतने पैसों का हम क्या करेंगे. यह कोई सपना तो नहीं है न,’ विश्वास दा की पत्नी ने जैसे रोंआसी हो कर कहा.

‘सौदामिनी, तुम फिक्र न करो. हमारे दिन फिर गए हैं. सब ठीक हो जाएगा. मैं शहर जा रहा हूं इन लोगों के साथ.’

विश्वास दा ने पत्नी को जैसे सांत्वना दी. और अगले दिन ही स्टीमर द्वारा वे पोर्टब्लेयर चले गए जहां पर सारी कागजी कार्यवाही होनी थी. तीसरे दिन स्टीमर द्वारा अभिलाष लौट आए थे. विजयनगर के अन्य 5-6 व्यक्तियों को भी शहर बुलाया गया था. उन की भी जमीनों की पेशगी लाखों रुपयों के रूप में उन्हें मिल गई थी. विश्वासनाथ के हाथों में एक बड़ी अटैची थी. जब बच्चों के सामने उन्होंने अटैची को खोला तो सब के मुंह से चीखें निकल गईं. अभिलाष ने उन्हें बताया, ‘ये पेशगी के तौर पर 20 लाख रुपए हैं, बाकी के रुपए डिमांड ड्राफ्ट के तौर पर जल्दी ही मिल जाएंगे.’

सबकुछ समझा कर अभिलाष चला गया था. वह रात उन सबों पर बहुत भारी गुजरी थी. विश्वासनाथ और सौदामिनी को नींद नहीं आ रही थी. बगल के कमरे में बेटे हीरेन और नरेन अपनी स्कीमों पर चर्चा करते रहे. किसी तरह से सुबह हुई. रातोंरात विश्वासनाथ का परिवार करोड़पति बन गया था. दिन, महीने गुजरते गए. अगले 2 बरसों में विश्वासनाथ का परिवार बहुत खुशहाल परिवार कहलाने लगा. जमीन की बकाया राशि में से उन्हें अब 90 लाख रुपए मिल गए थे. पूर्वी किनारे की 15 बीघे (5 एकड़) जमीन का सौदा हो चुका था. रेस्तरां मालिक विश्वासनाथ की पश्चिमी छोर की भूमि की भी मांग कर बैठे, तभी बाकी रकम की अदाएगी करेंगे. विश्वासनाथ ने वह जमीन अपने परिवारों की जरूरत के लिए रख छोड़ी थी.

आखिर काफी सोचविचार के बाद उस में से आधी जमीन फिर बेच दी. 50 लाख रुपए में उन की डील हुई थी. इसी जमीन में ही उन के नारियल, केले एवं सब्जियों के बागान थे. खैर, आधी बची जमीन में उन्होंने एक पक्का मकान बनाने को सोची. अगले एक महीने के भीतर विश्वास दा को पिछली बकाया राशि के 20 लाख और नई जमीन के सौदे के 10 लाख रुपए पेशगी मिले. ये रकम उन के बैंक खाते में आ गई थी. घरपरिवार का बोझ उठातेउठाते अब सौदामिनी भी कमजोर हो चुकी थी. वह भी चाहती थी कि उस के काम में कोई हाथ बंटाए. उसे बीच में खांसी के दौरे भी पड़ते रहते. उस की उम्र भी अब 60 बरस होने को आई थी. एक बहू लाने की चाह थी उसे. हालांकि खेतों में काम करने वह अब न जाती थी, देवर ने उसे सख्त मनाही कर दी थी. एक आज्ञाकारी भाई की तरह लक्ष्मण सरकार विश्वास दा का सदा ही हाथ बंटाता.

एक दिन लक्ष्मण ने अपने भाई से कहा था, ‘दादा, अब इतने पैसे मिल गए हैं, भाभी भी अब पहले जैसा कामकाज नहीं संभाल सकतीं…’

‘हां, सो तो है,’ विश्वासनाथ ने सिर हिलाया, ‘तुम कहना क्या चाहते थे?’

‘दादा, घरपरिवार तो अब बढ़ेगा ही. हीरेन की भी शादी करानी है. एक आलीशान मकान बन जाए तो अच्छा है न, रुपए का क्या भरोसा?’

‘हां लक्ष्मण, तुम ने मुंह की बात छीन ली. मुझे यह काम जल्दी करना होगा,’ और उन्हें थोड़ी खांसी सी आई, मुंह में रखी अधजली बीड़ी उन्होंने दूर फेंक दी.

अगले 6 महीनों के भीतर उन के जीवन का कायापलट हो चुका था. पश्चिमी किनारे की बची जमीन पर एक आलीशान पक्का मकान बन कर तैयार हो चुका था. अब मांबापू ने मई महीने में बड़े हीरेन और दीपशिखा के ब्याह की बात चलाई क्योंकि छोटा नरेन अभी ब्याह नहीं करना चाहता था. ‘लिटिल’ अंडमान द्वीप का एक इंजीनियर वर दीपशिखा को देखने आया. दीपशिखा को देखते ही वह उसे पसंद कर बैठा. गोरी, छरहरी देह की दीपशिखा भला किसे न भाती.

गांव के कुछ दूसरे लोगों ने विश्वासनाथ को समझाया था कि अभी समय अच्छा है, दीपशिखा को अच्छा वर मिल रहा है, जहां तक पढ़ाई की बात है वह शादी के बाद भी पढ़ सकेगी. हीरेन की बात दूसरी थी, वह अब पढ़ना नहीं चाहता था. उसे अब बिजनैस की सूझी थी. मांजी के कारण वह भी शादी के लिए राजी हो चुका था. मई महीने में दोनों का ब्याह होना तय हो चुका था. यही फैसला किया गया कि पहले बहू घर आएगी, अगले महीने बेटी की विदाई होगी. ऐसा हुआ भी.

विश्वास दा का नया आलीशान मकान रोशनी से जगमगा रहा था. मकान से लगे पंडाल और शामियाने पड़ोसी गांव के मेहमानों और बरातियों से भरे हुए थे. खानेपीने का प्रबंध एकदम शहर के ढर्रे पर किया गया था. पैसा पानी की तरह बह रहा था. सुंदर एवं सुशील बहू को पा कर सौदामिनी फूली न समाई. चूल्हे में लड़कियां फूंकफूंक कर जलाते हुए उसे 35 बरस होने को आए हैं. अब उसे अकसर खांसी की शिकायत रहती. डाक्टरों को भी दिखाया पर आराम कहां. बीचबीच में उसे खांसी के दौरे पड़ने लगे थे. नई बहू अनुराधा पढ़ीलिखी थी. उस ने आते ही सबकुछ बढि़या संभाल लिया था. अगले महीने दीपशिखा की विदाई धूमधाम से हो गई. बेटी ही से घर भरापूरा होता है. दीपशिखा के जाने के बाद घर जैसे खालीखाली हो गया, यह एहसास विश्वासनाथ और उस की पत्नी को तब हुआ. सबकुछ ठीक चल रहा था. ऐसे सुंदर दिन जीवन में आएंगे, दोनों पतिपत्नी ने भला कब सोचा था.

एक शाम जब विश्वासनाथ आरामकुरसी में सुस्ता रहे थे, तभी पास बैठी सौदामिनी बोल उठी, ‘देखिए जी, अब मकान बन गया है. दोनों बच्चों की शादी भी हो गई है. नरेन कहता है कि वह अभी ब्याह नहीं करेगा. वह व्यापार करना चाहता है.’

‘व्यापार? माने किस चीज का व्यापार?’ विश्वास दा ने पूछा.

‘वह ड्राइविंग सीख रहा है न. उसे सैलानियों को घुमाने के लिए टूरिस्ट गाड़ी चाहिए. वह कहता है कि 5 लाख रुपए तो चाहिए ही होंगे.’

‘हूं,’ उन्होंने सिर हिलाया.

‘तो क्यों न बचे हुए रुपए हम बच्चों में बांट दें. इतने रुपयों का हम क्या करेंगे. पता नहीं, कब ऊपर से बुलावा आ जाए,’ उस ने एक लंबी सांस खींची. तभी खांसी का एक दौरा उठा जो उसे निढाल कर गया.

‘ऐसे नहीं बोलो सौदामिनी, चलो, भीतर जा कर लेट जाओ,’ विश्वास दा ने कहा. तभी बहू ने मांजी की अलमारी से ‘इन्हेलर’ मशीन ला कर दी जो सौदामिनी के शहर के एक डाक्टर ने दी थी. थोड़ी दवा लेने के बाद वह अब पलंग पर लेट गई थी.

अगले सप्ताह पत्नी के कहने पर हीरेन, नरेन के अकाउंट खुलवा कर विश्वासनाथ ने 30 लाख रुपए हर एक के खाते में डलवा दिए. दामाद को भी 30 लाख रुपए नकदी देने का फैसला किया गया.

बड़े बेटे की बहू चूंकि शहर की थी, उस ने धीरेधीरे हीरेन को शहर जाने के लिए मना लिया था. दोनों ने शहर जा कर एक नया बनाबनाया मकान ले लिया था. छोटे बेटे नरेन ने 2 टूरिस्ट गाडि़यां और्डर दे कर मंगवा ली थीं, जो देशीविदेशी टूरिस्टों को पूरे हैवलौक द्वीप में घुमाती थीं. गाडि़यों से अच्छी आय होने लगी थी. लेकिन सैलानियों को घुमातेघुमाते उस की आदतें अब कुछ बिगड़ने लगी थीं.

कुछ यारदोस्तों की संगति में उसे शराब की बुरी लत लग गई थी. कुछ विदेशी लोग भी उसे शराब की बोतलें बतौर तोहफे दे जाते थे.

इस बीच, अभिलाष को बेंगलुरु में होटल मैनेजमैंट की पढ़ाई के लिए सीट मिल गई थी. कृष्णानगर में सब्जियों की पैदावार से उन्हें कोई अच्छी आय नहीं हो रही थी. उस के पिता ने उस की पढ़ाई के खर्चे के लिए विश्वासनाथ से कुछ रुपए मांगे थे. सौदामिनी के मन में भी उस लड़के के लिए जगह थी. उस ने ही तो उन्हें ये दिन दिखलाए थे. सौदामिनी की सहमति से विश्वासनाथ ने उसे 3 लाख रुपए दिए थे. अभिलाष सब का सहयोग पा कर अपनी पढ़ाई करने चला गया इस बीच, होली के एक दिन राधानगर सागरतट से नरेन अपनी मोटरसाइकिल से दोस्तों की टोलियों के साथ वापस लौट रहा था. उस की मोटरसाइकिल एक पेड़ से टकरा कर दुर्घटनाग्रस्त हो गई. दुर्घटनास्थल पर ही नरेन की मृत्यु हो गई. दोस्त उस के शव को घर लाए. सौदामिनी ने ज्यों ही अपने मृत बेटे का शव देखा, दहाड़ मार कर रोने लगी. विश्वासनाथ का भी बुरा हाल था. शव को शाम तक घर में रखा गया. शाम तक सभी रिश्तेदार पहुंच गए थे. विजयनगर के समुद्रतट के पास उस के शव का अंतिम संस्कार किया गया.

नरेन की मृत्यु के बाद सौदामिनी की तबीयत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी. विश्वासनाथ उसे शहर के डाक्टर को दिखाने ले गए. हीरेन भी साथ था. डाक्टर ने विश्वासनाथ को अलग से बताया कि मांजी को फेफड़ों का रोग है. विश्वासनाथ के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई. डाक्टर ने कुछ महंगी दवाएं दीं. दवा ले कर वे लौट आए. अब बहू अनुराधा अपनी सासू मां को ज्यादा कामकाज न करने देती थी. वह उन का खयाल रखती थी. मांजी का खानापीना, दवा, बिस्तर, सब सही ढंग से करती थी. जैसे फिर उसे यह मौका मिले, न मिले. सौदामिनी को जबतब खांसी का दौरा पड़ता रहता.

दिसंबर के उमस भरे दिन आ गए थे और रातें थीं कि कड़ाकेदार ठंडी. सौदामिनी की सेहत इन्हीं दिनों डांवांडोल होने लगी. एक रात अचानक उस को जोर की खांसी उठी. सांसें उल्टी चलने लगीं. और पलभर में उस की सांसें रुक गई थीं. उस रात सभी उस के पास थे. ‘हम को अकेला छोड़ कर चली गई रे, अब मैं कैसे जिऊंगा…’ विश्वासनाथ पत्नी को सीने में समेट कर रोने लगे. पता नहीं नियति ने वश्वासनाथ के साथ कैसी लीला रची है, पहले बेटा गया अब पत्नी. दीपशिखा और जमाई को फोन द्वारा सूचित कर दिया गया. गांव के लोग भी आ जुटे थे.

दोपहर के बाद दीपशिखा और दामाद आ गए थे. दीपशिखा के ब्याह को अभी बरसभर ही तो हुआ था, अपनी मां के शव पर वह दहाड़ मार कर रो रही थी. शाम होतेहोते उसी जगह, जहां पर 10 महीने पहले बेटे के शव को जलाया गया था, बड़े बेटे हीरेन ने अपनी मां को वहीं विदाई दी. अब किसी को भी उस गांव में अच्छा नहीं लग रहा था, जैसे कोई शापित गांव हो. 1 महीने के बाद हीरेन और बहू अनुराधा ने बाबूजी को पोर्टब्लेयर शहर आने को कहा, जहां पर उन्होंने मकान ले लिया था. दीपशिखा और जमाई ने भी उन्हें न्योता दिया था उन के साथ आ कर रहने के लिए. विश्वासनाथ ने उन से माफी मांगी और कहा, ‘बच्चो, इसी गांव में हमारी जिंदगी बदली. यहीं हम ने सबकुछ पाया और यहीं हम ने अपना सबकुछ खोया. मेरे बेटे की यादें यहीं बसी हैं. तुम्हारी मां की यादें भी इस जगह बसी हुई हैं. हम कहीं नहीं जाएंगे, बेटे,’ फिर लक्ष्मण से कहा, ‘भाई, तेरे लिए मैं कुछ नहीं कर सका.’

‘नहीं दादा, मैं कुछ नहीं चाहता. बस, आप के साथ रहना चाहता हूं,’ कहते हुए वह रोने लगा.

इतने बड़े मकान में विश्वासनाथ कैसे अकेले रह सकते थे. सो, बहूबेटे, दामाद के कहने पर उन्होंने वह मकान भी बेच दिया. किसी रिसोर्ट के मालिक ने उसे खरीद लिया जहां गोताखोरी की ट्रेनिंग का केंद्र बनाया गया. वहां से सागर तट बहुत नजदीक पड़ता था. इस से मिली रकम को बड़े बेटे और बेटी के नाम बैंक में उन्होंने डलवा दिए. लक्ष्मण को भी उस ने जेटी में एक बढि़या ढाबा खुलवा दिया. वह अब अपना जीवन सुधार ही लेगा, इस विश्वास से. हीरेन ने आखिरी बार अपने बापू को अपने साथ चलने को कहा था लेकिन उन की प्रतिज्ञा को अब कोई भी तोड़ नहीं सकता था. एक वह दिन था, एक यह दिन है. यही है वह अभिलाष जो रिसोर्ट का मैनेजर बन गया है, जिस पर विश्वासनाथ के कितने एहसान हैं. अभिलाष ही उस के एकाकी दिनों में उन का अभयदाता बना हुआ है.

फरवरी महीने का एक सुहाना दिन था. हर दिन की तरह विश्वासनाथ होटल के लौन में फूलों के पौधों को सींच रहे थे. वे अलबत्ता कुछ खांस भी रहे थे, ‘‘दादा, मैं जरा इन्हें राधानगर बीच दिखा लाऊं,’’ यह अभिलाष की आवाज थी.

दादा ने घूम कर देखा, एक युवा जोड़ा सामने खड़ा था.

‘‘बेटा, शाम तक आ जाओगे न?’’ दादा ने पूछा.

‘‘हां, हां, जल्दी आ जाऊंगा,’’ अभिलाष ने कहा.

वे अब जीप में बैठ चुके थे. वास्तव में अभिलाष ने ही उन दोनों को ‘हैवलौक’ देखने के लिए न्योता दिया था. युवक का नाम समीर था. बेंगलुरु में कालेज के दिनों में उन की दोस्ती हुई थी. साथ में उस की पत्नी नेहा थी.

शाम 6 बजे तक वे होटल लौट आए थे. तभी अभिलाष से किसी ने कहा कि विश्वासनाथ की तबीयत कुछ ठीक नहीं है. उन्हें चक्कर आए हैं और शारीरिक कमजोरी भी है. अभिलाष तुरंत उन के आउटहाउस वाले कमरे में पहुंचा. उस ने देखा, दादा एकदम निढाल पड़े हैं. उस ने सोचा कि मित्रों को ले कर वह राधानगर गया ही क्यों. पर अब क्या किया जाए, तुरंत उस ने गांव के डाक्टर को दिखाने का फैसला किया. उस ने होटल के ड्राइवर को शीघ्र बुलवाया. गाड़ी निकाली और डाक्टर को दिखला लाया. डाक्टर ने जांच कर बताया कि उन्हें बेहद कमजोरी थी, रक्तचाप भी बढ़ चुका था. डाक्टर ने उन्हें शहर ले जाने के लिए कहा, साथ ही ताकत की कुछ दवा दे दी थी. विश्वासनाथ को कुछ खाने का मन ही नहीं था. अभिलाष के कहने पर बड़ी मुश्किल से उन्होंने 2 निवाले पेट में डाले. अभिलाष ने उन्हें डाक्टर की दी हुई गोली खिलाई. उन्होंने तुरंत अभिलाष के हाथों को अपने बूढ़े हाथों में लिया. आंसू का एक गरम कतरा अभिलाष के हाथों पर गिर पड़ा.

‘‘दादा, आप फिक्र न करें. मैं हूं न. सुबह हम शहर चलेंगे. आप आराम कीजिए, ठीक है?’’ अभिलाष ने उन्हें सांत्वना दी. उस ने दादा को चादर ओढ़ा दी और कमरे से बाहर चला गया.

वह रात अभिलाष पर भारी गुजरी. अगली सुबह जागते ही वह विश्वासनाथ के कमरे की ओर बढ़ा. ज्यों ही कमरे में पहुंचा, वह अवाक् रह गया. बिस्तर पर विश्वासनाथ का सिर एक ओर लुढ़का हुआ था. उन के शरीर को हाथों से हिलाया, ‘‘दादा, दादा, उठिए, शहर नहीं जाना है क्या?’’ अभिलाष ने जोर से पुकारा, पर वे कहां उठते.

तभी उस ने बाहर जा कर होटल के एक कारिंदे को बुलाया जिस ने आ कर अपनी हथेली उन की नाक पर रखी. उन के प्राण पखेरू उड़ चुके थे. कारिंदे ने उन की पलकों को बंद किया फिर उन के शरीर को पलंग पर सीधे लिटा दिया और अभिलाष को इशारे से बताया.

अभिलाष के आंसू निकल आए. वह सिसकसिसक कर रोने लगा जैसे वह उन का सगा बेटा हो. होटल में हड़बड़ी मच गई. सभी कर्मचारी और अन्य लोग आ जुटे. समीर और नेहा भी आ गए. वे रोते हुए अभिलाष को ढाढ़स देने लगे. एक घंटे बाद विश्वासनाथ का भाई लक्ष्मण भी जेटी से आ पहुंचा. अपने भैया के सिरहाने बैठ कर वह फूटफूट कर रोने लगा. किसी तरह से सब लोगों को खबर दी गई. शाम होने से पहले शव का क्रियाकर्म किया जाना था. सभी आखिरी स्टीमर के आने तक राह देखते रहे, शायद शहर से बेटा आ जाए या दूर द्वीप से जंवाई बेटी आ जाएं. पर तब तक कोई नहीं पहुंच पाया, पता नहीं क्यों.

तब लक्ष्मण ने अभिलाष से कहा, ‘‘अब हम प्रतीक्षा नहीं कर सकते.’’

कभी करोड़पति रहे विश्वासनाथ का पूरे हैवलौक में कहां ठिकाना था. अभिलाष ने सारा इंतजाम कर लिया था. शव को राधानगर ले जाया गया. सागरतट से दूर बादाम और महुए के पेड़ों के झुरमुट में एक खाली जगह पर उन के शव को ले जाया गया. शव जलाने की लकडि़यां रखी थीं. उन का छोटा भाई लक्ष्मण के चेहरे पर अकथनीय दुख की छाया थी. अभिलाष भी लक्ष्मण की तरह धोती पहने शव के पास खड़ा था चेहरे पर कर्तव्यनिष्ठ भाव लिए. हैवलौक के पश्चिमी किनारे पर सूर्य डूब रहा था पर आज के सूर्य की 0किरणें सिंदूरी आभा लिए नहीं थीं, उन का रंग शायद खूनी लाल था. लक्ष्मण जैसा छोटा भाई शायद कहीं भी न हो, अभिलाष जैसा बेटा इस युग में ढूंढ़े से भी न मिले पर विश्वासनाथ जैसे विस्थापित जिंदगी जीने वाले और भी होंगे, शायद.

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