आज मनोज बहुत खुश था और पहुंच गया यादों में. 4 साल पहले वह नौकरी की तलाश में मुंबई आया था. पढ़लिख कर गांव में रहने का कोई फायदा नहीं था. वहां तो कोई छोटीमोटी नौकरी मिलती या अपनी छोटी सी दुकान खोल कर बैठना पड़ता. इस के अलावा वहां और कुछ था भी नहीं, जिस पर अपनी गुजरबसर की जा सके. यही सोच कर मनोज ने मुंबई जाने वाली ट्रेन पकड़ ली थी. पहले कुछ दिन तो मनोज को एक लौज में रहना पड़ा, फिर धीरेधीरे उसे उस के गांव के लोग मिल गए, जो 3-4 के समूह में साथसाथ रहते थे. मनोज भी उन्हीं के साथ चाल में रहने लगा था.

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