लेखिका-शबनम शंकर

भाग्यश्री अपने नाम के विपरीत थी. कुछ भी नहीं था उस के पास अपने नाम जैसा. बचपन से ले कर अब तक मातापिता की उपेक्षा ही सही, लेकिन फिर भी मायके में प्यार पाने की उम्मीद उस ने कभी नहीं छोड़ी.

ब तबीयत कैसी है मां?’’ दयनीय दृष्टि से देखती भाग्यश्री ने पूछा.

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