इस एक किताब ने 70 सालों में उलट-पलट दी है भारतीय महिलाओं की दुनिया... क्या आपको मालूम है ?

  • महिलाओं को माता-पिता और ससुराल दोनों ही तरफ के संयुक्त परिवार की संपत्तियों में हिस्सेदारी का अधिकार है.
  • तलाक के बाद या तलाक की प्रक्रिया के दौरान कोई आदमी अपनी औरत को घर से निकाल नहीं सकता उसे खुद निकलना पड़ेगा.
  • बिना किसी महिला कांस्टेबल के कोई पुरुष पुलिस अधिकारी महिला को गिरफ्तार नहीं कर सकता.
  • सूर्यास्त के बाद हिंदुस्तान में किसी महिला को कोई पुलिसवाला गिरफ्तार नहीं कर सकता.
  • किसी महिला की जांच य तलाशी पुलिस उसके निवास पर ही कर सकती है.
  • एक बलात्कार पीड़िता अपनी पसंद के स्थान पर ही अपना बयान रिकौर्ड कर सकती है.
  • सभी महिलाएं मुफ्त कानूनी सहायता का लाभ लेने की हकदार हैं.

जी हां,ये सब सच है और यह उस किताब के जरिये संभव हुआ है जिसे भारत का संविधान कहते हैं.देश की आजादी के पहले तक आजादी पर पुरुषों का विशेषाधिकार था. लेकिन 26 जनवरी 1950 को जब भारत ने नया संविधान स्वीकार किया तो एक झटके में चीजें बदल गयीं.  भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14-18 में सभी को बराबर का नागरिक अधिकार दिया गया.इसलिए अगर कहा जाय कि भारतीय संविधान नामक एक किताब ने भारतीय महिलाओं की दुनिया को पिछले 70 सालों में बदल कर रख दिया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.

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साल 2017 में  सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक की कुप्रथा को अवैध घोषित किया तो उसके पीछे भी संविधान की ताकत थी और 2019 में इस पर भारत की संसद की मुहर लगी तो यह भी संविधान की ताकत से ही संभव हुआ.इसी क्रम में हाल के सालों में महिलाओं को शनि शिंगणापुर (महाराष्ट्र), सबरीमाला (केरल) व हाजी अली (मुंबई) जैसे मंदिरों व मजारों के गर्भगृहों तक जाने की आजादी मिली है तो उसमें भी निर्णायक भूमिका संविधान की ही रही है.क्योंकि भारतीय संविधान अनुच्छेद 15 व 25 बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं.

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