8 मई को नई दिल्ली में नक्सल प्रभावित 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सुर पहले के मुकाबले काफी बदले हुए थे. उन की बातों में छिपा विरोधाभास साफसाफ चुगली कर रहा था कि सरकार नक्सली समस्या को सिर्फ एक निरर्थक हिंसा के रूप में देखती है जिस से निबटने के लिए वह बंदूक की कार्यवाही के नाम पर छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में, तैनात अर्धसैनिक बलों का आधुनिकीकरण करेगी.

राजनाथ सिंह के अनुसार, अब जवानों को बायोमीट्रिक और ट्रैकिंग सिस्टम युक्त स्मार्टगन मुहैया कराई जाएंगी, जवानों के जूतों और बुलैटप्रूफ जैकेट्स में भी बुलैटप्रूफ जीपीएस युक्त ट्रैकर लगाने की बात उन्होंने कही. इस से होगा यह कि नक्सली उन्मूलन अभियान का हिस्सा बने सैनिकों की लोकेशंस के पलपल की जानकारी सरकार को मिलती रहेगी. राजनाथ सिंह ने यह भी माना है कि आमतौर पर माओवादी संगठन सुरक्षा बलों से लूटे हथियारों का ही इस्तेमाल करते हैं.

यही तकनीक माओवादी क्यों न हथिया लेंगे, इस का जवाब शायद राजनाथ सिंह के पास न होगा. गृहमंत्री की बात विरोधाभासी और हास्यास्पद है. इस से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि माओवादियों को सुरक्षाबलों से हथियार छीनने से रोका कैसे जाएगा.

अब होगा यह कि सुरक्षाबलों को जो स्मार्ट गनें दी जाएंगी वे भी नक्सलियों के काम आएंगी. रही बात ट्रैकर या जीपीएस ट्रैकर की, तो नक्सली इतने बेवकूफ नहीं है कि इन्हें निष्क्रिय या नष्ट करना न जानते हों.  इस से होगा सिर्फ इतना कि जवान कहां लुटे या मारे गए, यह जल्द पता चल जाएगा.  लेकिन नक्सलियों तक पहुंचना पहले की तरह ही दुष्कर काम रहेगा. माओवादियों को आम जनता का बड़ा समर्थन है और उन्हें सेना व पुलिस के पलपल की खबर रहती है.

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